उपन्यास अंश: और सिर्फ तितली

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Titli

वह शायद तितली ही थी. तितली जैसी खूबसूरत. तितली की ही तरह उड़ती थी. कभी इधर फुदक कर बैठती तो कभी उधर. रंग-बिरंगी तितलियों जैसे ही उसके सपने रंग-बिरंगें थे. सपने थे कि उससे कई बार रूठे, लेकिन उसने तितली जैसी अपनी सोच नहीं बदली. तितली तो ऊंची उड़ान भर नहीं सकती थी. लेकिन उसके सपनों में ऊंची उड़ाने आती थीं. उड़ने के लिए वह कई बार तितली से चील बन जाती थी. घोसले से अपना निवाला खींच लाने वाली शिकारी निगाहों के साथ. असल में वह चील बनना नहीं चाहती थी. वह तितली ही रहना चाहती थी. दमकते और महकते रंग-बिरंगे फूलों के बगीचों को ही अपना रैन बसेरा बनाना चाहती थी. लेकिन उसे तितली नहीं रहने दिया गया और वह चील बन गई. दिलचस्प यह था कि उसने चील के गुणों को अपनाया दुर्गणों को नहीं. चील की तरह कभी उसने अपने भाई-बंधुओं को अपना निवाला नहीं बनाया. कई बार उसे इस बात पर असमंजस भी होता था कि आखिर वह चील है या कि तितली. इस द्वंद्व के बावजूद वह चील में तितली बनी रही. तितली. सिर्फ तितली.

उस दिन की सुबह कुछ अजीब सी थी. सोफिया स्कूल की हवा में उदासी भी थी और खुशी का आलम भी. जनवरी के दिन थे. सूरज तो पूरब से निकला था. लेकिन कोहरे के बीच में उसकी चमक धुंधला सी गई थी. किरणें तो उससे फूटी थीं लेकिन बादलों को चीरने का उनमें शायद माद्दा नहीं था. घंटी बज चुकी थी. एसेम्बली के लिए बच्चे मैदान में एकत्रित हो गए थे. अधिकांश बच्चों ने अपने वजन से अधिक ऊनी कपडे़ पहन रखे थे. कुछेक बच्चों के पास ठंड से लड़ने वाले पर्याप्त स्वेटर और जैकेट नहीं थे. ऐसे बच्चों के गालों पर गुलाबी चमक साफ दिख रही थी. शायद ठंड से उनके गाल जल गए थे. वे दांत किटकिटाकर ठंड से लड़ने की अधूरी लड़ाई लड़ रहे थे. कहने को तो सोफिया स्कूल इंटरनेशनल स्कूल था. लेकिन गरीब बच्चों को यहां दलितों की ही तरह देखा जाता था. स्कूल में ये बच्चे कोढ़ में खाज की तरह थे. स्कूल मैनेजमेंट को गरीब बच्चों को लेना अनिवार्य था, क्योंकि वे सरकारी जमीनों में बने थे और तमाम अनाप-सनाप सुविधाएं लेते थे. लेकिन मैनेजमेंट गरीब कोटे से आने वाले छात्रों के साथ वह हर बदसलूकी करता था, जिससे वह अपनानित हों और खीज कर घर बैठ जाएं. कई बच्चे तो घर बैठ भी जाते थे. लेकिन कुछ बच्चे पूरी ढिठाई के साथ जमे रहते थे. वे यह मान लेते थे कि अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए यदि वे पैसे नहीं दे सकते हैं तो उन्हें अपमान से उसकी कीमत चुकानी ही होगी. ऐसे ही बच्चों में एक था उदय प्रकाश.

बात छूट न जाए खुशी और उदासी की. असल में उस दिन बच्चों को अपने मन का ब्रेकफास्ट लाने की उनकी तान्या मैम ने छूट दी थी. वजह थी उनका क्लास में आखिरी दिन होना. स्कूल में घर से खाने-पीने का सामान लाने की मनाही थी. स्कूल में ही उन्हें कांटीनेंटल से लेकर देसी हर तरह का खाना-नाश्ता मिलता था. खाने के नाम पर मैनेजमेंट मोटी फीस वसूलता था. उस दिन सैंडविचेस, चिप्स, चाकलेट, केक्स, पास्ता वगैरह-वगैरह सब कुछ मेनू में था. सबकी अपनी-अपनी पसंद का. यहां बात जरूर बता देना चाहिए कि गरीब बच्चों के हिस्से स्कूल से मिलने वाले खाने का एक टुकड़ा भी नहीं आता था. वे अपनी रूखी-सूखी घर से लाते थे. बच्चों के लिए दुख की बात यह थी कि अब अगली क्लास में उनकी तान्या मैम उनके साथ नहीं रहेंगी. इसलिए बच्चों के चेहरों में एक अजब सी उदासी थी. पहली कक्षा के इतने छोटे बच्चे भी सामूहिक रूप से उदास हो सकते हैं किसी के लिए, यह यहां देखने की बात थी. उदासी और खुशी के बीच क्लास रूम में जबर्दस्त पार्टी हुई. सबने मिलकर खाया-पीया. नो लड़ाई-झगड़ा. पार्टी के बाद सभी बच्चे स्कूल बस में बैठ कर स्पोर्ट कामप्लेक्स गए. वहां फोटो सेशन होना था. बस में सभी बच्चे तान्या मैम के साथ सीट साझा करना चाहते थे. लेकिन तान्या मैम तो अकेली थी सबके साथ बैठ नहीं सकती थीं. बच्चे आपस में तान्या मैम के साथ बैठने के लिए बस में गुत्थम-गुत्था हो गए. तभी तान्या मैम जोर से चीखीं- ‘तुम सब इस तरह से करोगे तो मैं बस से उतर जाऊंगी और फोटो भी नहीं खिचवाऊंगी.’

इस चीख के साथ ही बच्चे एक-एक करके अपनी सीटों में चुपचाप जा बैठे. तान्या मैम ने तय किया कि वह सारन्या के साथ बैठेंगी. सारन्या तान्या मैम पर अपना अधिकार समझती थी. तान्या की असल चेप थी सारन्या. जहां-जहां तान्या मैम वहां-वहां सारन्या. अपनी छोटी से छोटी बात वह तान्या मैम को बता देती थी. सारन्या देखने में भी बिल्कुल गुड़िया सी थी. तान्या मैम भी किसी गुड़िया से कम नहीं लगती थीं. छोटे कद की गोल-मटोल. खिला-खिला रंग. गालों में डिंपल. और काटन के रंग-बिरंगे एथनिक कपड़ों की शौकीन. टिच-विच रहने वाली. दिल्ली में यह उनके करियर की पहली नौकरी थी. उनकी उम्र कोई ज्यादा नहीं थी. स्कूल में सभी टीचर उन्हें बच्चा टीचर समझते थे. वजह थी कि अधिकांश टीचरों की उम्र चालीस के आसपास थी या फिर उससे ज्यादा. उपदेश देना तो उनका बनता था. कुछ अधेड़ टीचरें भी थीं, जो शायद टीचिंग को नौकरी से ज्यादा कुछ नहीं समझती थीं. कम उम्र की होने के चलते हर टीचर तान्या मैम को उपदेश दे कर चलते बनता था. वैसे थी वह बेहद होशियार. मौके की नजाकत के चलते ही वह टीचरों के मुंह नहीं लगती थी. वह तर्कों के साथ पलटवार कर सकती थी, लेकिन नौकरी कच्ची होने के चलते वह ऐसा नहीं करती थी. वैसे वह चाह ले तो किसी की भी ऐसी-तैसी करने में पूरी सक्षम थी. अतीत के कारनामे उनके बेहद हैरतंगेज और खतरनाक रहे हैं. उनके कारनामों पर आगे कहीं.

सारन्या को किसी ने कभी चुप बैठे नहीं देखा था. चुलबुली. शैतानों की नानी. उस दिन वह तान्या मैम के पास बस चलने के बाद काफी देर तक चुप बैठी रही. मौका देख कर उसने तान्या मैम के गालों में हाथ फेरते हुए हवा में एक किस उछाल दिया. फिर धीरे से बोली- ‘मैम आप गुस्सा न करो तो मैं एप्पल जूस पी लूं.’

इतनी प्यारी रिक्वेस्ट के आगे तान्या मैम न ना कर सकीं. उन्होंने हां में अपना सिर हिला दिया. तान्या ने अपने बैग से एप्पल जूस निकाला और चोरी-चोरी शिप करने लगी. बस के दूसरी ओर सीट पर बैठी सुप्रिया गुलाटी को यह नागुजार लगा. वह अंदर से सुलग उठी. वैसे तो वह तत्कालिक प्रतिक्रिया दे सकती थी. लेकिन बात को मन में लेकर बैठ गई. ऐसे मामलों में वह किसी की परवाह नहीं करती थी. एक बार तो उसने स्कूल की एकेडमिक हेड इशीता पास्ता को पेपर वेट खींच कर मार दिया था. उस इशीता पास्ता को जिससे पूरा स्कूल थरथराता है. उनका गुनाह सिर्फ इतना था कि उन्होंने अपने ऑफिस में सुप्रिया के गाल प्यार से थपथपा दिए थे.

बस स्पोर्टस कामप्लेक्स पहुंच चुकी थी. मैडम  तान्या सबसे पहले बस से नीचे उतरी और एक-एक कर बच्चों को उतारने लगीं. तभी सारन्या अपने नन्हें हाथों में अपना और मैडम का बैग लिए उतरी. तिरछी नजरों से उसने पहले मैडम को देखा. कुछ-कुछ तुतलाते हुए लाड़ से बोली- ‘आप भी मैम कितनी भुलक्कड़ हो कि अपना बैग ही सीट पर छोड़ आईं. अगर मैं न होती तो बैग कोई चुरा लेता.’

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