समान नागरिक संहिता तो छोड़िए हमने तो आपराधिक संहिता को भी समान नहीं रहने दिया: आरिफ मोहम्मद खान

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Photo : Tehelka Archives

समान नागरिक संहिता लागू किए जाने के बारे में आपकी क्या राय है?

हमारा संविधान अपने अनुच्छेद 44 के द्वारा राज्य के ऊपर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह भारत के समस्त नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा. हम सब संविधान को मानते हैं और जो लोग लोकतंत्र में हिस्सा लेते हैं वे तो केवल चुनाव जीतने के बाद ही नहीं बल्कि चुनाव लड़ते समय भी संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा रखने की शपथ लेते हैं. असल में सवाल यह होना चाहिए कि संविधान लागू होने से लेकर आज तक हमारी सरकारों ने इस दिशा में क्या कदम उठाए हैं.

वास्तविकता यह है कि समान नागरिक संहिता तो छोड़िए हमने तो क्रिमिनल संहिता को भी समान नहीं रहने दिया. शाह बानो केस में क्रिमिनल संहिता के सेक्शन 125 के तहत निर्णय हुआ था. हमने उसको भी संसद के एक कानून द्वारा निरस्त किया और इस तरह भारतीय महिलाओं के एक वर्ग को उस अधिकार से वंचित कर दिया जो उन्हें क्रिमिनल संहिता के द्वारा मिला हुआ था.

समान नागरिक संहिता का सबसे तीखा विरोध मुस्लिम समाज की ओर से होता है. क्या यह कानून वजूद में आने पर शरीयत या इस्लामी कानून से प्रभावित होंगे?

इसका जवाब तो तभी दिया जा सकता है जब विधेयक का प्रारूप हमारे सामने हो. आज दुनिया में मुस्लिम मुल्कों में यह कानून बदला जा चुका है. मिसाल के तौर पर, अप्रतिबंधित तीन तलाक का अधिकार भारत को छोड़कर कहीं भी मुस्लिम पुरुष को हासिल नहीं है. फिर मुसलमानों की एक बड़ी संख्या आज अमरीका और दूसरे पश्चिमी देशों में रहती है जहां पर्सनल लॉ जैसा कोई कानून नहीं है. इन सब तथ्यों को सामने रखकर राज्य इस मामले में पहल कर सकता है.

ज्यादातर जानकार मानते हैं कि सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून होना चाहिए और समान नागरिक संहिता धार्मिक स्वतंत्रता में बाधक नहीं है. फिर भी इस कानून को लेकर तमाम बहसें और पेचीदगियां हैं. अब तक की राजनीति ने इस विषय को किस तरह से हैंडल किया है?

पहली बात तो यह साफ होनी चाहिए कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्तिगत अधिकार है सामुदायिक नहीं. और दूसरी बात यह है कि यह अधिकार लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य तथा संविधान के अन्य उपबंधों से बाधित है. इसी प्रावधान के तहत तीसरी बात यह है कि धर्म की स्वतंत्रता राज्य को ऐसे कानून बनाने से नहीं रोकती जिसका उद्देश्य धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य लौकिक कार्यकलाप का विनियमन या निर्बंधन हो.

हां, एक बात और जोड़ना चाहूंगा कि भारत की संस्कृति बहुलवाद की संस्कृति है. हम अनेकतावाद के मानने वाले हैं. अनेकता में एकता हमारा राजनीतिक नारा नहीं है बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति का शाश्वत सिद्धांत है.

समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विविधता या अनेकता को समाप्त करना नहीं बल्कि सभी भारतीय महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान दिलाना होना चाहिए. समान नागरिक संहिता यह तय नहीं करेगी कि कौन किस तरह विवाह संपन्न करता है, बल्कि यह कानून केवल एक बात सुनिश्चित करेगा कि विवाह से पैदा होने वाले अधिकार और कर्तव्य सभी भारतीयों के लिए समान होंगे.