देशद्रोही जेएनयू बनाम राष्ट्रवादी सरकार

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जेएनयू में देशविरोधी नारा लगाने का मसला उसी तरह गड्ड-मड्ड हो गया है जैसे आजकल की देशभक्ति. एक टीवी चैनल और फिर सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में दिखाया गया था कि नौ फरवरी को जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाए जा रहे हैं. उसी आधार पर कुछ छात्रों को पुलिस ने उठा लिया और जांच शुरू हो गई. केंद्र सरकार ने इसका कड़ाई से संज्ञान लिया और इसमें हाफिज सईद और लश्कर-ए-तैयबा की संलिप्तता बता दी. जब तक हम यह सोचते कि हाफिज सईद और लश्कर का पाकिस्तान से जेएनयू पहुंचना इतना आसान कैसे हो गया, हमारी सुरक्षा एजेंसियां क्या कर रही थीं, तब तक दूसरा वीडियो सामने आ गया जिसमें नारा लगा रहे छात्रों की पहचान एबीवीपी कार्यकर्ताओं के रूप में कर ली गई.

अब आरोप है कि पहले वीडियो में जो छात्र नारा लगा रहे हैं, वही छात्र एबीवीपी के कार्यक्रम में भी देखे गए हैं. यह दोनों वीडियो अभी प्रामाणिक नहीं हैं, लेकिन एक के आधार पर धरपकड़ हो गई है, दूसरे पर सिर्फ सोशल मीडिया की जनता बहस कर रही है. इस बीच एक तीसरा वीडियो भी सोशल मीडिया पर नुमाया हो गया, जो देश विरोधी नारों से गुंजायमान था.

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यह पूरा मसला समझ पाना अब उतना आसान नहीं है. जब देश के गृहमंत्री ने देश को आगाह किया कि आप सब लश्कर-ए-तैयबा की संलिप्तता को समझें, तभी बीएचयू में दलित चिंतक प्रो. बद्रीनारायण और कई लेखकों-कवियों की देशभक्ति का परीक्षण हो रहा था. बद्रीनारायण वहां पर ‘हाशिये पर समाज और आधुनिकता’ विषय पर व्याख्यान देने गए थे. इसके बाद कविता पाठ होना था. माथे पर भगवा पट्टी बांधे 100 के करीब एबीवीपी के कार्यकर्ता अचानक कार्यक्रम में घुसकर ‘देश के गद्दारों को गोली मारने के’ नारे लगाने लगे. हालांकि, उस अराजक भीड़ की फंडिंग किस आतंकी संगठन ने की है, इस पर न तो गृहमंत्री जी ने अब तक कुछ कहा है, न ही उस पर बहस शुरू हुई है. इस बीच पहला वीडियो जारी होने के बाद पुलिस रिमांड पर लिए गए जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की रिमांड अदालत दोबारा बढ़ा देती है तो बीएस बस्सी ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान को खारिज कर दिया कि जेएनयू के छात्रों का लश्कर-ए-तैयबा से कनेक्शन है. जेएनयू के छात्रों के समर्थन में हाफिज सईद के ट्वीट को भी फर्जी बताया जा चुका है. अब यह आपकी धार्मिक या राजनीतिक या जातीय आस्था पर निर्भर है कि आप किसकी बात को सच मानेंगे!

राजधानी दिल्ली के किसी संस्थान में भारत विरोधी नारे लगाना एक गंभीर घटना है. ऐसे किसी नारे का बचाव करना कानून की नजर में भी अपराध हो सकता है. कानून में ऐसा करने वाले को दंडित करने का प्रावधान है. लेकिन देशविरोधी नारे लगे थे या नहीं, लगे तो किसने लगाए, यह कैसे तय हो? बिना जांच के, बिना सबूत के अगर एक छात्र को गिरफ्तार करके रिमांड पर जेल भेज दिया गया, तब यह उम्मीद बेमानी है कि असल मामला क्या है. क्या यह समझने का कोई अवसर हमारे सामने पेश होगा? एक वीडियो गंभीर था तो दूसरा अगंभीर कैसे हो गया, जबकि दोनों की प्रामाणिकता संदिग्ध ही है!

किसी संस्थान में भारत विरोधी नारे लगाना एक गंभीर घटना है. ऐसे किसी नारे का बचाव करना अपराध हो सकता है. लेकिन देशविरोधी नारे लगे थे या नहीं, लगे तो किसने लगाए, यह कैसे तय हो?

जेएनयू में अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर आयोजित हुए कार्यक्रम ने देशभक्ति और देशविरोध के बहाने भारतीय राजनीति को अखाड़ा मुहैया करा दिया. जेएनयू के इस अखाड़े में सीताराम येचुरी, राहुल गांधी से लेकर साध्वी प्राची तक कूद गईं. मामला अब सुलझने की जगह तूल पकड़ता जा रहा है. सरकार, पुलिस और विपक्षी दलों के बीच बयानबाजी का दौर जारी है. दोनों पक्षों से मामले के इतने पहलू सामने रख दिए गए हैं कि आम आदमी के लिए सही और गलत का फैसला कर पाना मुश्किल है. नौ फरवरी को आयोजित हुए इस कार्यक्रम को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, वे हैदराबाद, दादरी आदि घटनाओं की तरह गंभीर सवाल खड़े करती हैं कि क्या हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह अराजक भीड़ के हवाले कर दी गई है?

देशद्रोह और देशभक्ति ने ऐसा ताना-बाना बुन दिया है कि संविधान और कानून पनाह मांग रहे हैं. देशहित की सुरक्षा नेताओं के बयानों की तरह उत्श्रृंखल हो गई है. विश्व हिंदू परिषद की नेता साध्वी प्राची ने फरमाया, ‘जेएनयू को हाफिद सईद ने फंडिंग की है और उसी के सहयोग से यूनिवर्सिटी में सम्मेलन हुआ है. राहुल गांधी राष्ट्रवाद की परिभाषा बताएं, देश उनसे जानना चाहता है. डी. राजा आतंकी गतिविधियों में शामिल है, उसे भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए.’ अपनी असंसदीय बयानबाजी के लिए कुख्यात सांसद साक्षी महाराज का फैसला आया, ‘राष्ट्र का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और जेएनयू के ‘देशद्रोह’ के आरोपियों के खिलाफ आजीवन कारवास की जगह फांसी मिलनी चाहिए या गोली मार देनी चाहिए.’ मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सवाल किया, ‘क्या पाकिस्तान जिंदाबाद करने वाले देशद्रोहियों की जबान नहीं काट देनी चाहिए?’ देशभक्ति साबित करने की रेस में आगे निकलते हुए हरियाणा हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के पूर्व ओएसडी जवाहर यादव को जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगा रहीं युवतियों से वेश्याएं बेहतर लगीं. आॅनर किलिंग के चलते युवक-युवतियों की कब्रगाह बने हरियाणा पर उनके विचार जान पाने से यह देश अब तक महरूम है.

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इस बीच दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर जेएनयू के समर्थन में या विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं. 15 फरवरी को कन्हैया की पटियाला हाउस कोर्ट में पेशी के वक्त परिसर के बाहर भाजपा विधायक ओपी शर्मा ने अपने समर्थकों के साथ सीपीआई नेता अमीक को पीटते हुए कैमरे में कैद हुए. इस दौरान कोर्ट के अंदर और बाहर वकीलों ने जमकर हंगामा किया. जेएनयू के छात्रों, कई पत्रकारों, जिसमें महिला पत्रकार भी शामिल हैं, को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया. एक पत्रकार ने बताया, ‘हंगामा कर रहे वकील लोगों से पूछते कि क्या आप जेएनयू से हैं? अगर कोई ‘हां’ कह देता तो उसकी पिटाई कर देते.’ वकीलों ने कोर्ट का घेराव करके कोर्ट को बंद कर दिया और कन्हैया की पेशी नहीं हो सकी. 16 फरवरी को पत्रकारों ने दिल्ली में विरोध मार्च निकाला और इस हमले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की. कन्हैया की गिरफ्तारी का मामला भी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है.

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इस मसले के सामने आने के बाद निशाने पर आए जेएनयू के दर्जनों छात्रों और शिक्षकों से हमने बात की. कोई भी व्यक्ति देशविरोधी नारे का समर्थन करता नहीं दिखा. हर व्यक्ति इस बात का हामी है कि अगर कोई ‘भारत की बर्बादी तक जंग’ जारी रखने का नारा लगाता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन जिस तरह पुलिस और सरकार मामले में कार्रवाई कर रही है, उस पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं.

नौ फरवरी को जेएनयू के कुछ छात्रों ने ‘अ कंट्री विदआउट पोस्ट आॅफिस’ नाम से अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था. ये छात्र डीएसयू नामक संगठन से कुछ समय पहले अलग हो गए थे. चार दिन पहले इस कार्यक्रम को लेकर प्रशासन ने अनुमति दे दी थी. छात्रों के मुताबिक, इस कार्यक्रम में भारत की उस न्याय व्यवस्था पर चर्चा करना था जो ‘देश की सामूहिक चेतना’ के आधार पर किसी को फांसी दे सकती है या फांसी पाने वाले व्यक्ति के परिजनों को ‘चार दिन बाद’ सूचना देती है.

जेएनयू वह जगह है जहां पर देश-दुनिया के विभिन्न मसलों पर हमेशा कार्यक्रम आयोजित होते हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन हमेशा ही सहमति या असहमति के बावजूद हर कार्यक्रम आयोजित होने देता है. इस कार्यक्रम के आयोजन में कोई छात्र संगठन शामिल नहीं था. लेकिन आयोजन के वक्त अन्य संगठनों के तमाम छात्र मौजूद थे, क्योंकि साबरमती ढाबे के पास शाम को बहुत से छात्र एकत्र होते हैं. कार्यक्रम के वक्त वहां पर मौजूद जेएनयू के छात्र संतोष वर्मा ने बताया, ‘ढाबे पर हमेशा की तरह काफी छात्र जमा थे. इस जगह पर आम तौर पर भीड़ रहने के कारण यहां पर कोई न कोई कार्यक्रम होता रहता है. इस कार्यक्रम के लिए चार दिन पहले पोस्टर लगाए गए थे. एबीवीपी की शिकायत पर प्रशासन ने 15-20 मिनट पहले कार्यक्रम की अनुमति रद्द कर दी. पर छात्र जमा हो गए तो उनका कहना था कि अब तो कार्यक्रम होगा. ये सब यहां आम बात है. एबीवीपी वहां विरोध करने पहुंचा था. टकराव की संभावना देखते हुए वहां पर वाम संगठनों के लोग भी आ गए. हालांकि, वे प्रोग्राम में शामिल नहीं थे. एबीवीपी ने नारेबाजी शुरू कर दी. उसके जवाब में इन लोगों ने नारेबाजी शुरू की.’

नौ फरवरी को जेएनयू के कुछ छात्रों ने ‘अ कंट्री विदआउट पोस्ट आॅफिस’ नाम से अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था. यह किसी छात्र संगठन का कार्यक्रम नहीं था

मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए संतोष कहते हैं, ‘मीडिया में जो नारे दिखाए जा रहे हैं, वे उस प्रोग्राम में लगे ही नहीं. निर्भया कांड के समय एक नारा चला था ‘महिलाएं मांगे आजादी, कश्मीर से लेकर केरल तक’. इस नारे का पिछला हिस्सा दिखाकर कहा गया कि कश्मीर और केरल की आजादी की बात कही जा रही है. जबकि यह नारा इस कैंपस में हमेशा लगता है. हां, ‘हर घर से अफजल निकलेगा’ ये नारा लगा था और यह गलत है. लेकिन यह नारा किसने लगाया? वे कौन लोग थे? जी-न्यूज अचानक वहां पर कहां से पहुंच गया, जबकि यहां मीडिया शायद ही आता है?’

कार्यक्रम में मौजूद रहीं छात्रा अमृता पाठक ने बताया, ‘उस वक्त मैं वहीं पर थी. एक छात्र ने आकर मुझसे पूछा, काॅमरेड कन्हैया कहां हैं. मैंने कहा, आप फोन कर लीजिए. उस छात्र ने कन्हैया को फोन करके कहा कि आप यहां आ जाइए. यहां पर कुछ बवाल हो सकता है. इसके बाद कन्हैया कार्यक्रम में पहुंचे. लेकिन वे न कार्यक्रम में शामिल थे, न ही नारा लगाने में.’

अमृता सवाल उठाती हैं, ‘मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि एबीवीपी को पहले से ये कैसे पता चल गया कि यहां पर कुछ गड़बड़ होगी? उसने कार्यक्रम की अनुमति रद्द करने का दबाव क्यों बनाया? बिना कोई उपद्रव हुए भी वहां पुलिस कैसे पहुंची, जबकि पुलिस बिना कुलपति की अनुमति के अंदर नहीं आ सकती? वहां पर जी-न्यूज का कैमरा और रिपोर्टर कैसे पहुंचे, जबकि जेएनयू में तमाम कार्यक्रम होते रहते हैं और चैनलों के रिपोर्टर कभी नहीं आते? अगर कुछ गड़बड़ है तो जांच कराइए और सजा दीजिए लेकिन बिना सबूत के गिरफ्तारी कैसे हो गई? जो लोग मुंह पर कपड़ा बांध कर नारे लगा रहे थे, वे कौन थे? नारा लगाने वालों की पहचान क्यों नहीं की गई? यह घटनाक्रम बताता है कि सारा मामला पहले से फिक्स था.’

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एबीवीपी और भाजपा समर्थकों ने भी जेएनयू के खिलाफ कई जगह प्रदर्शन किए

शोध छात्र ताराशंकर ने बताया, ‘उस कार्यक्रम के लिए चार दिन पहले से अनुमति ली गई थी. सांस्कृतिक परिचर्चा के नाम पर कार्यक्रम आयोजित किया गया था. प्रशासन ने पहले से मना नहीं किया. ठीक 15 मिनट पहले कार्यक्रम को रद्द किया. पर छात्रों ने कार्यक्रम शुरू कर दिया. बहुत बार बिना अनुमति के भी कार्यक्रम हो जाते हैं. एबीवीपी वालों ने जी-न्यूज चैनल वालों को पहले ही बुला लिया था. कुछ कश्मीर के छात्रों ने वह नारा लगाया. बीच में एबीवीपी वालों ने गाली गलौज शुरू की. इससे कई छात्र भड़क गए. और आरएसएस के खिलाफ नारे लगाए. इसी क्रम में भारत विरोधी नारे भी लगे. यह सब जोश-जोश में हुआ, एबीवीपी के हमले की प्रतिक्रया में. किसी लेफ्ट वाले ने सपोर्ट नहीं किया. कार्यक्रम के बाद मार्च निकला. गंगा ढाबा के पास एबीवीपी ने खुद नारा लगाया.’