भगत सिंह वही न जो भारतीय फिल्मों में एक्टिंग करता है ! | Tehelka Hindi

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भगत सिंह वही न जो भारतीय फिल्मों में एक्टिंग करता है !

हमारे देश की विडंबना यही है कि हम अपने असली नायकों को भूल चुके हैं और अपनी आने वाली पीढ़ी को ऐसे लोगों के बारे में बता रहे हैं जिनका इस धरती से कोई संबंध ही नहीं है.

2016-04-15 , Issue 7 Volume 8

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अगर आप पाकिस्तान में किसी से शहीद भगत सिंह के बारे में पूछेंगे तो बड़े अजीबोगरीब जवाब मिलेंगे. शायद आटे में नमक के बराबर लोग भगत सिंह को जानते हैं या यह कि वे क्यों, कब और कैसे शहीद हुए. भगत सिंह को न जानने की सबसे बड़ी वजह यह है कि वे मुसलमान नहीं थे. उनका जन्म एक सिख परिवार में हुआ था इसलिए उनसे दूरी बनाना यहां का सामाजिक मसला है. पाकिस्तान में कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने इस मुल्क के लिए बलिदान दिया और इसकी तरक्की में अपनी भूमिका अदा की है. वे इस मुल्क के हीरो या रोल मॉडल इसलिए नहीं हैं कि उनका संबंध अल्पसंख्यक समुदाय से है.

पाकिस्तान में किसी को पता नहीं है कि एसपी सिंघा कौन थे. विभाजन से पहले पंजाब प्रांत की विधानसभा में केवल एसपी सिंघा थे जिन्होंने नए मुल्क पाकिस्तान को बनाने के पक्ष में मत दिया था. बदकिस्मती से उनको इस मुल्क में पहचान इसलिए नहीं मिल सकी है कि उनका संबंध अल्पसंख्यक समुदाय से था. सेसिल चौधरी पाकिस्तानी वायुसेना में फाइटर पायलट थे और बड़ी बहादुरी के साथ हर कदम पर देश की रक्षा की लेकिन वे भी हमारे हीरो  नहीं हैं क्योंकि उनका संबंध भी अल्पसंख्यक समुदाय से है.

इस तरह के बेशुमार लोग हैं जो इस मुल्क की तरक्की और खुशहाली के लिए अपनी भूमिका निभा रहे हैं. डॉ. अब्दुस सलाम को फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार मिला और यह पाकिस्तान के लिए सबसे बड़े गर्व की बात होनी चाहिए लेकिन उनका यहां तो कोई नाम लेना भी पसंद नहीं करता है क्योंकि वे अहमदी समुदाय से थे. तो शहीद भगत सिंह को भी इसी दर्जे में रखा गया है और उनका दोष यही है कि उनका जन्म एक सिख परिवार में हुआ था.

भगत सिंह इस धरती के बेटे थे और उनका जन्म फैसलाबाद के करीब स्थित बंगा नाम के गांव में हुआ था. उन्होंने इस धरती और इसके लोगों के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी. दो साल पहले लाहौर में एक बहादुर सरकारी अफसर नूर उल अमीन मेंगल ने उस चौक को भगत सिंह का नाम दिया जहां अंग्रेजों ने उनको फांसी दी थी. सरकारी तौर पर नोटिफिकेशन भी जारी हुआ लेकिन रातोंरात सरकार को वह फैसला वापस लेना पड़ा क्योंकि कुछ धार्मिक गुटों ने सरकार के उस फैसले का कड़ा विरोध किया. पिछले साल कुछ उदारवादी लोगों ने शहीद भगत सिंह की पुण्यतिथि पर उसी चौक पर दीये जलाने और भगत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित करने की कोशिश की थी लेकिन कुछ धार्मिक गुटों ने उन लोगों से मारपीट की. इस दफा भी 23 मार्च को कुछ लोगों ने हिम्मत कर ऐसी कोशिश की और उस चौक पर जाकर भगत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की.

लाहौर के एक वकील इम्तियाज रशीद कुरैशी ने अदालत में एक ऐतिहासिक याचिका दायर की है जिसमें उन्होंने कहा है कि भगत सिंह निर्दोष थे और उनको अंग्रेज सरकार ने गैरकानूनी तौर पर फांसी दी थी. खुशी की बात यह है कि लाहौर हाई कोर्ट ने इस याचिका को सुनने की हिम्मत की और अभी इस याचिका पर सुनवाई चल रही है.

यही नहीं, पाकिस्तान में वामदलों की सबसे बड़ी पार्टी अवामी वर्कर्स पार्टी ने फैसलाबाद के करीब भगत सिंह के घर पर एक सभा का आयोजन किया. उस सभा का उद्देश्य शहीद-ए-आजम भगत सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित करना था और आम लोगों को यह भी बताना था कि भगत सिंह ने इस देश के लिए बलिदान दिया था. अवामी वर्कर्स पार्टी के कार्यकर्ता इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए जब भगत सिंह के घर पहुंचे तो माहौल काफी भावुक था. पार्टी कार्यकर्ताओं ने गांववालों के साथ मिलकर उस कमरे की चौखट पर दीये जलाए जिस कमरे में उनका जन्म हुआ था. मैं भी उस कार्यक्रम में शामिल था.

एक बार भगत सिंह पर एक रिपोर्ट तैयार करने के सिलसिले में कायदे-आजम यूनिवर्सिटी जाना हुआ और वहां विद्यार्थियों से पूछा कि आपको पता है कि भगत सिंह कौन थे. तो एक छात्र ने जवाब दिया कि भगत सिंह वही न जो भारतीय फिल्मों में एक्टिंग करता है. यही हमारे देश की विडंबना है. हम अपने असली नायकों को भूल चुके हैं और अपनी आने वाली पीढ़ी को ऐसे लोगों के बारे में बता रहे हैं जिनका इस धरती से कोई संबंध ही नहीं है.

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 7, Dated 15 April 2016)

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