अम्मा के जाने के बाद

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यही तथ्य उनके और उनकी पार्टी के लिए मुश्किल पैदा करने वाला भी है. किदवई कहते हैं, ‘जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी जैसी नेत्रियों की पार्टी में पहले तो दूसरे नंबर का कोई घोषित नेता नहीं है साथ ही एक और तथ्य यह भी है कि अविवाहित होने की स्थिति में इनके पास लालू, मुलायम और चौटाला जैसा वंशवादी राजनीतिक विकल्प भी नहीं है. ऐसे में इन पर संकट आने से पूरी पार्टी पर संकट आना स्वाभाविक है. नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘जयललिता को दोषी ठहराए जाने का यह अदालती फैसला यदि ऊपरी अदालतों में भी बरकरार रहता है तो ऐसे में मजबूत उत्तराधिकारी न होने के चलते दूसरे राजनीतिक दल राज्य में अपने लिए संभावनाएं तलाश सकते हैं. ऐसे में अब दूसरे दलों की गतिविधियों को देखा जाना भी महत्वपूर्ण होगा कि जयललिता की अनुपस्थिति को वे किस तरह अपने पक्ष में कर सकते हैं.’

तमिलनाडु की राजनीति में अन्नाद्रमुक के अलावा दूसरा सबसे प्रमुख दल डीएमके है. दूसरे शब्दों में कहें तो ये दोनों दल ही तमिल राजनीति की धुरी रहे हैं. 1967 में एम भक्तवत्सलम के नेतृत्व में आखिरी बार तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी की सरकार रही. तब से अब तक लगभग आधी सदी के दौरान तमिलनाडु की सत्ता इन्ही दो पार्टियों के बीच बंटती रही है. ऐसे में यह सवाल उठना वाजिब लगता है कि क्या जयललिता के जेल चले जाने के बाद विपक्षी दल डीएमके के पास कोई मौका हो सकता है?

कई राजनीतिक जानकार इसका जवाब ‘ना’ में देते हैं. उनका मानना है कि बेशक जयललिता को सजा हो जाने के बाद द्रमुक के नेतृत्व और उसके कैडर का उत्साह बढ़ेगा लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इससे उसकी स्थिति में सुधार होगा ही. 2014 के लोकसभा चुनावों में सूपड़ा साफ होने के साथ ही द्रमुक सुप्रीमो करुणानिधि के कुनबे में चल रही पारिवारिक कलह को इसकी बड़ी वजह के रूप में देखा जा रहा है. किदवई कहते हैं, ‘बेशक पिछले कई दशकों से तमिलनाडु की राजनीति अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच ही घूमती रही है. लेकिन जयललिता के कमजोर पड़ जाने के बाद भी द्रमुक के लिए यह उतना अच्छा अवसर शायद ही साबित हो. क्योंकि करुणानिधि के परिवार में आपसी झगड़े और उसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी पार्टी को हाल के समय में काफी कमजोर कर दिया है.’ वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं, ‘वे कहते हैं, पिछले कुछ सालों से डीएमके की हालत राज्य में लगातार खस्ता हुई है. पहले विधानसभा चुनावों में उसे करारी हार मिली और फिर लोकसभा चुनाव में उसका सफाया हो गया. ऐसे में राज्य में उसका काडर पूरी तरह बिखरा हुआ है. इसके अलावा करुणानिधि की बढ़ती उम्र के साथ ही उनके बेटों स्टालिन और अलागिरी के बीच सत्ता संघर्ष ने भी पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया है. ऐसे में जलयलिता का जेल जाना शायद ही डीएमके के लिए फायदा पहुंचा सकेगा.’

डीएमके की खस्ता हालत को लेकर राजनीतिक पंडितों की इस राय को यदि सही मान लिया जाए तब भी यह सवाल तो उठता ही है कि तमिलनाडु की राजनीतिक तस्वीर में किस तरह के बदलाव आ सकते हैं. सवाल यह भी उठता है कि क्या इन स्थितियों में भाजपा तथा कांग्रेस के लिए राज्य में कोई संभावना पैदा हो सकती है?

जयललिता को सजा हो जाने के बाद द्रमुक के नेतृत्व और उसके कैडर का उत्साह बढ़ेगा लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इससे उसकी स्थिति में सुधार हो ही जाए

कांग्रेस पार्टी की बात की जाए तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उसकी दुर्गति किसी के छिपी नहीं है. लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि इस चुनाव से पहले उसे तमिलनाडु में नौ से 15 प्रतिशत के बीच वोट मिलते रहे हैं. ऐसे में बहुत संभव है कि कांग्रेस अपने इस वोट बेंक को फिर से हासिल करने की कोशिश करे. लेकिन क्या यह इतना आसान होगा? किदवई कहते हैं, ‘कांग्रेस पार्टी के लिए इस वक्त पूरे देश में जिस तरह का मोहभंग चल रहा है, उसे देखते हुए पार्टी की डगर यहां भी काफी मुश्किल नजर आती है. इसके अलावा उसकी मुश्किल यह भी है कि उसके पास प्रदेश स्तर पर कोई राजनीतिक चेहरा ऐसा नहीं है जो जयललिता की परछाईं भी साबित हो सके.’ कांग्रेस के बाद यदि भाजपा की बात करें तो तमिलनाडु के छोटे दलों के साथ गठजोड़ करके वह लोकसभा चुनाव में अपना खाता यहां से खोल चुकी है. इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव के सहारे पार्टी देशभर के सभी राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश जारी रखे हुए हैं. ऐसे में तमिलनाडु की राजनीति में आए इस परिवर्तन को अपने पक्ष में भुनाने में शायद ही वह कोई कमी रखे. नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘जिस तरह से भाजपा इन दिनों कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश में लगी है उसे देखते हुए इस बात की बहुत संभावना है कि 2016 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वह यहां के राजनीतिक समीकरणों में खुद को शामिल करने की पूरी कोशिश करेगी. हालांकि महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के नतीजों पर भी भाजपा की रणनीति काफी हद तक निर्भर करेगी.’ लेकिन अजय बोस नीरजा की बातों से असहमति जताते हुए कहते हैं, ‘बेशक भाजपा ने लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में खाता खोल लिया हो लेकिन अंतत: यहां क्षेत्रीय राजनीति की चलेगी. ऐसे में हो सकता है कि कोई नया क्षेत्रीय दल राज्य में आकार लेने की कोशिश करे, लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दिखता.’

इन बातों के साथ ही अजय बोस तमिलनाडु की राजनीति में जया के प्रभाव को कम आंकने को जल्दबाजी भी करार देते है. वे कहते हैं, ‘बेशक अदालत ने जयललिता को सजा सुना दी है लेकिन इससे हाल-फिलहाल में उनकी पार्टी और उनके प्रभाव को कोई नुकसान नहीं दिख रहा है. इसकी प्रमुख वजह तमिलनाडु में कमजोर विपक्ष के साथ ही उनका खुद का मजबूत कद है.’ इसके अलावा जयललिता के पास अभी ऊपरी अदालत का विकल्प मौजूद है, और यदि उन्हें किसी तरह वहां से राहत मिल जाती है तो वे पहले के मुकाबले और भी मजबूत हो जाएंगी. राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मोहन की मानें तो जयललिता के खिलाफ आए फैसले से तमिलनाडु की राजनीति में कुछ बदलाव देखने को भले ही मिल जाएं लेकिन जिस तरह से उन्होंने लगातार पिछले कुछ चुनाव शानदार ढंग से जीते हैं, उन्हें पूरी तरह से खारिज कर देना जल्दबाजी होगी. अपने एक लेख में अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ के मैनेजिंग एडिटर जयंत वासुदेवन लिखते हैं, ‘जयललिता के खिलाफ आए हालिया फैसले से तमिलनाडु में उनकी पार्टी की राजनीति पर फिलहाल बुरा असर पड़ने की कोई आशंका नहीं है. वैसे भी राज्य में विधानसभा चुनाव अभी दो साल दूर हैं. तब तक के लिए जयललिता ने सरकार पर पकड़ बरकरार रखने के लिए ‘रामचरितमानस’ के राम की तरह ‘भरत’ का चयन कर लिया है. हालांकि इस सबके बावजूद इस बात में बहुत दम है कि जयललिता की आगे की राजनीति काफी हद तक अदालत के आदेश से ही तय होगी.’

इन सब तर्कों के आधार पर देखा जाए तो एक बात साफ तौर पर नजर आती है कि तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में जयललिता का कद बाकी सबके मुकाबले कहीं ऊंचा है. उनकी सजा का ऐलान होते ही राज्यभर में लोगों ने जोर-शोर से विरोध प्रदर्शन आयोजित किए. उनके जेल जाने के बाद से कई लोग भारी सदमे में हैं. यहां तक कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों से दर्जनभर से ज्यादा आत्महत्याओं की खबरें अब तक सामने आ चुकी हैं. ऐसे में माना यही जा रहा है कि तमिलनाडु के लोग इस वक्त जयललिता के पक्ष में पूरी तरह लामबंद हैं और जल्द से जल्द उनकी रिहाई चाहते हैं.

लेकिन सच यही है कि यदि उन्हें अदालत से राहत नहीं मिली तो दस साल बाद जब वे फिर से चुनावी राजनीति में उतरेंगी तब तक बहुत कुछ बदल चुका होगा. उनकी खुद की ही बात करें तो हिंदू मान्यताओं के मुताबिक वे तब ‘वानप्रस्थ’ वाली अवस्था (76 साल) को प्राप्त कर चुकी होंगी. उस हालत में फिर से सारी ऊर्जा समेटकर राजनीति के क्षितिज पर पहले की तरह चमकना किसी के लिए आसान नहीं हो सकता. फिर चाहे वह जयललिता ही क्यों न हों.

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