‘ये सीट विकलांगों के लिए आरक्षित है’

‘ये मेरी दोस्त है और मैं अपने दोस्त से ये कह रहा हूं’ समूह का वह शख्स अब मेरी ओर मुखातिब था जिसने अभी-अभी उस महिला पर ये असंवेदनशील तंज कसा था. असल में हास्य के नाम पर यह उनकी सोच का नमूना था. यह समूह उस समाज की नुमाइंदगी कर रहा था जो शारीरिक ‘अक्षमता’ को हीन भावना और मजाक समझता है. बहरहाल, मेरी उन बातों से मेट्रो में सवार लोगों को कुछ फर्क पड़ा कि नहीं ये मैं नहीं जानता.

शायद कोच से उतरने पर उन्होंने मुझे भी दूसरों के मामले में टांग अड़ाने वाले की संज्ञा दी हो, इसका भी मुझे इल्म नहीं. मेरा स्टेशन आ चुका था. कोच से उतरने के बाद मेरे लिए एक बात और पक्की हो गई थी कि ऐसे ही सोच के चलते यह वर्ग समाज का हिस्सा होते हुए भी काफी कम सामने आ पाता है. उन्हें हर बार छोटी-छोटी चीजों से इस बात का एहसास दिलाता है कि वे हमारे जैसे नहीं हैं. यहां तक कि कई मर्तबा अपने हास्य का ‘सामान’ बनाने में भी पीछे नहीं रहता. और ऐसी किसी घटना काे अपने आसपास होता देख मुखर होकर कुछ कहने, विरोध करने के बदले चुप रहता है.

-लेखक रेडियो जॉकी हैं और दिल्ली में रहते हैं.

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