‘मन की पहली परत वही थी कि कम उमर में शादी ठीक होवे है’

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लड़की ने मां के कान में कुछ बुदबुदाया. मां और बेटी उठकर शायद वॉशरूम की ओर चले गए. उस व्यक्ति ने अचानक से कहा कि कल सुबह ही नागपुर से फोन आया कि आ जाओ, सब लोग देख लें तो फिर शादी कर देंगे. ‘अच्छा-अच्छा’ कहकर मैं दिमाग पर थोड़ा जोर देने लगी कि पिछली मुलाकात में क्या बात हुई थी. बस ध्यान में यह आया कि पिछली यात्रा में किसी रिश्तेदारी की बात इन्होंने कही तो थी. उसके चेहरे पर उतावलेपन को साफ पढ़ा जा सकता था. मुझे भी लगा कि थोड़ी जिज्ञासा दिखा देनी चाहिए और इस लिहाज से मैंने पूछ लिया कि कितनी बेटियां हैं? इस बीच मां और बेटी भी आ गईं. पिता ने सफेद पायजामे से ढंके पैर को मोड़ा और खिड़की से टिककर बैठ गए. यही है, रजनी नाम है.

मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पूछ ही लिया कि किस क्लास में पढ़ती हो? उसके बदले में मां ने जवाब दिया ‘5वीं में…’ पिता ने बीच में टोकते हुए कहा इसकी ही शादी की बात करने नागपुर गया था.

मैं इतना ही कह पाई कि इसकी! फिर नजर बचाते हुए मैं तीनों को देख रही थी. मां को, पिता को, बेटी को, जिसे शहरी बनने की पूरी इच्छा थी, कोशिश भी की थी लेकिन मन की पहली परत वही थी कि कम उमर में शादी ठीक होवे है.

(लेखिका पत्रकार हैं और वर्धा में रहती हैं)

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