एक भूला-बिसरा कानून…

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मध्य प्रदेश ने शुरू किया सबसे पहले अमल

इस कानून को लेकर 2012 तक मध्य प्रदेश की स्थिति भी देश के बाकी राज्यों जैसी थी. लेकिन बीते साल जब मध्य प्रदेश जैव विविधता बोर्ड में भारतीय वन सेवा के आरजी सोनी सदस्य-सचिव बनकर आए तो देश के दूसरे राज्यों तक में जैव विविधता कानून पर चर्चा होने लगी. सोनी ने इस अधिनियम और बोर्ड द्वारा किए जा रहे कामों को देखा तो उनको आश्चर्य हुआ कि बोर्ड के पास एक भी ऐसी कंपनी की जानकारी नहीं थी, जो जैव संसाधनों का व्यावसायिक प्रयोग कर रही हो. कानून के अनुसार यह सारी जानकारी बोर्ड के पास होनी चाहिए थी. उसके बाद उन्होंने देश के दूसरे बोर्डों से संपर्क किया तो वहां भी यही स्थिति थी. इस क्षेत्र की प्रमुख एजेंसी एनबीए में तो स्थिति और भी खराब थी. उन्हें वहां से भी कोई मार्गदर्शन और मदद नहीं मिल पाई. उसके बाद उन्होंने राज्य सरकार को स्थिति से अवगत कराते हुए अपनी कार्रवाई शुरू की और सभी कंपनियों को नोटिस जारी करने शुरू किए. प्रदेश में सोया प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल, डिस्टलरी, चीनी, चॉकलेट, कोयला, जूस, हर्बल उत्पाद बनानेवाली कंपनियों को नोटिस जारी किया कि वे अपने कारोबार संबंधी जानकारी बोर्ड में जमा करवाएं तथा अपने कारोबार का दो फीसदी बेनीफिट शेयरिंग के रूप में जमा करें. इसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज, रिलायंस पावर, वर्धमान समूह, एस्सार पावर तथा हर्शे इंडिया जैसी कंपनियां शामिल हैं. प्रदेश की कंपनियों को जैसे-जैसे नोटिस मिल रहे थे, कंपनियों में वैसे-वैसे इस कानून के बारे में चर्चा तेज होती चली गई. कंपनियों ने इसके बारे में जानकारी ली और बोर्ड से संपर्क किया लेकिन इसके बाद भी बेनीफिट शेयरिंग को कोई तैयार नहीं हुआ. इसी का नतीजा है कि आज मध्य प्रदेश में इस कानून संबंधी करीब 32 केस अलग-अलग स्थानों पर चल रहे है. इसमें नौ मामले तो एनजीटी की मध्य ब्रांच में तथा 12 मामले उच्च न्यायालय में चल रहे हैं. पूरे उद्योग जगत ने बोर्ड की इस कार्यवाही का व्यापक विरोध किया. राज्य सरकार से भी इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की गई. हालांकि राज्य सरकार ने इसके अमल पर कोई रोक नहीं लगाई. दूसरी ओर बोर्ड ने कई बार नोटिस देने के बाद भी जवाब न देने पर आठ कंपनियों पर न्यायालय में आपराधिक मामला भी दर्ज कराया है. कानून का पालन न करनेवाली कंपनियों को तीन वर्ष तथा विदेशी कंपनियों के लिए पांच साल तक सजा का प्रावधान है. आज भी कंपनियां इस कानून को स्वीकार नहीं कर रही हैं  और न्यायालयों में चल रहे मामलों के फैसले के इंतजार में हैं. उद्योग संगठनों की कई आपत्तियां हैं. पहली यही है कि कानून से स्पष्ट नहीं होता कि कौन-कौन सी कंपनियां जैव संसाधन के दायरे में आएंगी और किन पर इसे लागू होना चाहिए. किसी भी कंपनी से यदि उसके कुल कारोबार का दो फीसदी शुल्क के रूप में मांगा जाएगा तो आज के प्रतिस्पर्धी माहौल में यह कैसे संभव है. कंपनियां इसपर भी हैरान हैं कि जब दूसरे राज्यों में इस कानून पर कोई काम नहीं हो रहा है तो मध्य प्रदेश में इसे लागू क्यों किया जा रहा है. उनके मुताबिक इससे राज्य की कंपनियों की प्रतिस्पर्धी क्षमता कम हो जाएगी. उद्योगजगत की दलीलों पर सोनी कहते हैं, ‘ उद्योग जगत की ओर से जो प्रतिक्रिया हो रही है वह स्वाभाविक है. किसी भी नए कानून का पालन शुरू करवाना आसान नहीं होता और उसमें भी जब उसको क्रियान्वित करने वाली एजेंसियां गंभीर न हो. जब एनबीए और केंद्र सरकार इसके अमल को लेकर कोई प्रयास ही नहीं कर रहे हैं तो कंपनियों से उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वे सहर्ष इसको स्वीकार कर लेंगी. सोनी ने जैव विविधता कानून और भारतीय परिदृश्य पर तीन किताबें लिखी हैं. जिसमें एक कितान का शीर्षक ही है ‘भूला हुआ कानून’. सोनी कहते हैं, ‘ इस मामले में सबसे बड़ा अपराधी एनबीए है. विदेशी कंपनियों से बेनीफिट शेयरिंग को लेकर कानून में स्पष्ट प्रावधान है, उसके बाद भी एनबीए कुछ नहीं कर रहा है. बड़ी संख्या में विदेशी कंपनियां भारतीय जैव संसाधनों का व्यावसायिक उपयोग कर अरबों की कमाई कर रही है और देश को कुछ भी नहीं मिल रहा है.’

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‘राजस्व का नुकसान तो ऐसा नुकसान है कि जिसकी भरपाई हो सकती है किन्तु जैव विविधता को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई संभव नहीं है’

इस कानून की व्यापकता को देखते हुए कंपनियों से मिलनेवाले राजस्व का अनुमान लगाया जा सकता है. कुछ उदाहरण देखते हैं :  रुचि सोया लिमिटेड सोयाबीन प्रोसेसिंग करने वाली कंपनी है, जिसका सालाना कारोबार करीब 20,000 करोड़ रुपये से अधिक है. इस तरह से इस कंपनी से बेनीफिट शेयरिंग शुल्क के रूप में 400 करोड़ रुपये मिलने हैं.  ग्लेक्सो स्मित लाइन फार्मा का कारोबार करीब 8,000 करोड़ रुपये का है, जिससे 160 करोड़ रुपये प्राप्त हो सकते हैं. बायोकॉन लिमिटेड एंजाइम का प्रयोग करने वाली बायो टेक्नोलॉजी कंपनी है. उसका सालाना कारोबार करीब 1,600 करोड़ रुपये का है. इन कंपनियों में यदि कोयला और गैस को शामिल कर लिया जाए तो यह आंकड़ा और भी बड़ा हो जाता है. ओएनजीसी का सालाना कारोबार 88,000 करोड़ रुपये से अधिक है. कोल इंडिया का  कारोबार 16,000 करोड़ रुपये है. इस तरह कुछ कंपनियों के आकलन पर ही एनबीए को प्राप्त होने वाले राजस्व का आंकड़ा ही करीब 2,500 करोड़ रुपये हो जाता है. इस तरह जो राजस्व प्राप्त होगा उसका 95 फीसदी हिस्सा उन क्षेत्रों में जैव विविधता के संरक्षण में खर्च किया जाएगा जहां के जैव संसाधनों का उपयोग कंपनियों द्वारा किया जाता है. इस पूरे मामले को सामने लाने वाले और मध्य प्रदेश जैव विविधता बोर्ड के सदस्य सचिव  आरजी सोनी  इसको कोलगेट की तर्ज पर बायोगेट नाम देते हंै और इसको कोलगेट से ज्यादा गंभीर अपराध बताते हंै. उनका अनुमान है कि राजस्व का जो नुकसान है वह आंकड़ा कोलगेट से भी बड़ा है. सोनी कहते हैं, ‘राजस्व का नुकसान तो ऐसा नुकसान है कि उसकी भरपाई हो सकती है किन्तु जैव विविधता को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई संभव नहीं है. इसी कारण यह गंभीर अपराध है.’


‘यह लापरवाही का मामला है’
वन एवं पर्यावरण मामलों के कानूनी विशेषज्ञ शिवेंदु जोशी से बातचीत.

nationआखिर क्या वजह है कि जैव विविधता कानून का पालन पूरी तरह से नहीं हुआ ?
दरअसल जिन एजेंसियों को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई थी यह उनकी लापरवाही है. एनबीए में पेटेंट के मामले में काफी काम हुआ है. इस के अलावा कोई काम नहीं किया गया.

बेनिफिट शेयरिंग के अंतर्गत शुल्क न लेने से हजारों करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही जा रही है.
एक्ट के अनुसार बेनिफिट शेयरिंग की जानी चाहिए थी लेकिन राशि कितनी हो सकती थी इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता. हालांकि रुपयों से महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून का पालन पूरी तरह नहीं किया गया.

आप के अनुसार कहां खामी रह गई.
सबसे बड़ी खामी यह रही कि एजेंसी के पास यह जानकारी नहीं है कि कितनीं विदेशी कंपनियां देश में जैव संसाधनों का व्यायसायिक प्रयोग कर रही हैं.

बेनिफिट शेयरिंग के लिए दस साल बाद भी दिशा निर्देश नहीं बनाए गए.
हां, ऐसा हुआ है. यह बात ठीक है कि देसी कंपनियों के लिए दिशानिर्देश नहीं थे लेकिन विदेशी कंपनियों के लिए सारे नियम बने हुए थे.

नियमों में फेरबदल की तैयारी
इस समय जैव विविधता कानून से जुड़े मामलों की सुनवाई एनजीटी की सेंट्रल ब्रांच में चल रही है. पहले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया था कि कंपनियों से बेनीफिट शेयरिंग पर एनबीए की गाइडलाइन अभी तक नहीं बनी है. इसके बाद एनजीटी ने इसे बनाने और एक सप्ताह में प्रस्तुत करने का आदेश दे दिया. एनबीए ने इसके लिए एक समिति का गठन किया और उसकी सिफारिशों के आधार पर गाइडलाइन का प्रस्ताव तैयार कर हाल ही में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सामने पेश किया है. वहां इन पर विचार विमर्श किया जा रहा है. एनजीटी में पिछली दो सुनवाइयों के दौरान एनबीए को यह गाइडलाइन प्रस्तुत करनी थी किंतु उसने समय पर यह प्रस्तुत न करते हुए अतिरिक्त समय की मांग की थी. सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार एनबीए द्वारा तैयार प्रस्ताव में भारतीय कंपनियों के कारोबार के आकार को आधार पर उनसे लिया जाने वाला शुल्क तय किया गया है. इसमें पचास लाख रुपये तक का कारोबार करने वाली कंपनियों पर 0.1 फीसदी शुल्क तय किया गया है. इसके बाद पचास लाख  से दो करोड़ रुपये तक के कारोबार वाली कंपनियों से 0.2 फीसदी तथा दो से अधिक पर 0.5 फीसदी शुल्क लिया जाए. विदेशी कंपनियों के लिए इसी कारोबार के आधार पर शुल्क की दर 0.2 से एक फीसदी तय की गई है.

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