आपातकाल की आपबीती

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आपातकाल का मास्टरमाइंड सिद्धार्थ शंकर रे (बांए से दूसरे) ही वो व्यक्ति थे, जिन्होंने इंदिरा गांधी को आपातकाल लागू करने की सलाह दी थी

प्रेस सेंसरशिप और मीडिया की भूमिका

इंदिरा गांधी मीडिया को खामोश कर देना चाहती थीं और इसीलिए प्रेस सेंसरशिप और बिना किसी जांच के लोगों को नजरबंद और हिरासत में लेना शुरू हुआ. मुझे याद है कि मैं उस वक्त प्रेस काउंसिल का सदस्य था और अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज थे. मैंने उनसे कहा कि वो एक मीटिंग बुलाएं और इस सेंसरशिप के विरोध में निंदा प्रस्ताव पारित करें. इस पर उन्होंने कहा, ‘इसका क्या फायदा होगा? कोई भी इसे (निंदा प्रस्ताव) नहीं छापेगा.’ मैंने कहा इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई इसे छापे या न छापे, कम से कम ये बात इतिहास में दर्ज तो होगी कि इस ज्यादती के खिलाफ कोई स्टैंड तो लिया गया था. तब उन्होंने कहा, ‘मैं कुछ स्थानीय सदस्यों से बात कर के देखता हूं.’ आपको ये जानकार बहुत आश्चर्य होगा कि प्रेस काउंसिल के एक भी स्थानीय सदस्य ने मेरा साथ नहीं दिया. जब भी मैं वो सब याद करता हूं, मुझे बस डर का माहौल ही याद आता है… पत्रकार डरे हुए थे. और श्रीमती गांधी तो आपातकाल के निर्णय पर कह भी चुकी थीं कि एक कुत्ता भी नहीं भौंका (नॉट अ सिंगल डॉग बार्क्ड). उनसे मिलने के बाद कुछ व्यक्तियों ने मुझे बताया कि उस वाक्य में वो मुझे संबोधित कर रहीं थीं.. ‘वो संपादक जो हेडलाइंस लगाता था, लिखता था, देखो उसका क्या हाल हुआ!’

‘उस नोट में एक ऐसी व्यवस्था का जिक्र था जो संसदीय नहीं बल्कि अध्यक्षीय थी यानी समग्र शक्तियां एक व्यक्ति पर ही केंद्रित थीं. यहां चुनाव प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष थे’

मैं आपातकाल हटाने (क्योंकि ये लोकतंत्र के खिलाफ थी) और सेंसरशिप के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव बनाकर उस पर पत्रकारों के दस्तखत लेने के लिए अखबारों के दफ्तरों में घूमता था. विद्याचरण शुक्ल, जो आपातकाल के दौरान सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे, मेरे मित्र थे. उन्होंने मुझसे पूछा, ‘वो दस्तखत किया हुआ प्रेमपत्र कहां हैं? मैं उन पत्रकारों को ठीक करता हूं.’ मैंने कहा, ‘मुझे माफ करें, मैं वो आपको नहीं दे सकता.’ वो बोले, ‘अच्छा ठीक है, पर कम से कम आ कर मुझसे मिल तो लो.’ फिर मैं उनसे मिलने गया. उन्होंने मुझे ये कहकर धमकाया कि हो सकता है मुझे गिरफ्तार कर लिया जाए. मैंने कहा, ‘क्या होगा यदि मुझे गिरफ्तार कर भी लिया गया? मैंने तो यही सुना है कि सभी नेता कभी न कभी गिरफ्तार हुए थे और गिरफ्तारी के बाद उनका राजनीतिक कद बढ़ा ही था.’ मैंने श्रीमती गांधी को एक पत्र (बॉक्स देखें) लिखा था जिसमें मैंने नेहरू की बात दोहराई थी, ‘मैं एक दबे या सुनियंत्रित प्रेस की तुलना में एक पूरी तरह से स्वतंत्र प्रेस को तरजीह दूंगा भले ही उसमें इस स्वतंत्रता के दुरुपयोग का खतरा ही क्यों न शामिल हो.’ हिरासत में तीन महीने रहने के बाद जब मैंने दोबारा शुरुआत करने की कोशिश शुरू की तब भी किसी पत्रकार ने मेरा साथ नहीं दिया. हर कोई अपनी नौकरी खोने या जेल जाने के डर से भयभीत था. गिरिलाल जैन, जो तब टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ थे, ने तो मुझसे तो पूछा भी था कि जेल में शुष्क शौचालय होते हैं या फ्लश शौचालय! मैंने कहा, ‘शुष्क.’ वो बोले, ‘ये तो समस्या है.’ बात को न बढ़ाकर अगर मोटे तौर पर समझें तो हां पत्रकारों पर दबाव था, पर जैसा लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है कि जब उन्हें झुकने को कहा गया तब वो रेंगने लगे. समय बदल रहा था. अब मालिक ताकतवर हो गए थे क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि वो पत्रकार जो बड़े-बड़े लेख लिखते हैं, कितनी आसानी से सरकार के काबू में आ गए. तो यहां दबाव सरकार का नहीं बल्कि मालिकों का था. सरकार मालिकों से संपर्क साधती और उनके माध्यम से प्रेस को संचालित करती.

जेपी आंदोलन

जेपी आंदोलन ने एक अलग ही तरह का माहौल तैयार कर दिया था, जो बहुत जरूरी भी था. उस समय राजनीति में भ्रष्टाचार को लेकर कोई संदेह ही नहीं रह गया था क्योंकि ओडिशा में नंदिनी सतपथी पर अपने चुनावी अभियान में भ्रष्टाचार करने के आरोप लग चुके थे. जेपी ने इंदिरा गांधी से शिकायत भी की थी कि एक चुनावी अभियान पर इतना धन क्यों बर्बाद किया जा रहा है. हालांकि श्रीमती गांधी ने इस बात से साफ इंकार किया कि चुनावों में अधिक धन खर्चा गया है.

पीएन हक्सर

पीएन हक्सर (जो इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव थे) का सिर्फ ये कहना था कि अब समय आ गया है कि अपने समाजवाद के उस सपने को वास्तविकता में बदला जाए जिसके बारे में उन्होंने स्कूल-कॉलेज में पढ़ा था. उन्होंने मुझसे कहा कि अब ये काम करने का समय है. हालांकि सच ये है कि हक्सर ने कुछ समय तक इस उम्मीद में संजय गांधी का साथ दिया था कि शायद ये कोई नई तरह की व्यवस्था है, एक नया निजाम है पर वामपंथी होने की वजह से संजय ने उन्हें सचिव के पद से हटा दिया. इस पद से हटा कर उन्हें योजना आयोग भेज दिया गया. ये बिलकुल वैसा ही था जैसा उनसे पहले इंदर कुमार गुजराल के साथ हुआ था. गुजराल को भी तब योजना आयोग का रास्ता दिखा दिया गया था जब उन्होंने संजय गांधी से कहा था कि वो उनकी मां की कैबिनेट के मंत्री हैं और संजय उन्हें आदेश नहीं दे सकते.

गुजराल को तब योजना आयोग का रास्ता दिखाया गया जब उन्होंने संजय गांधी से कहा कि वो प्रधानमंत्री के कैबिनेट मंत्री हैं, संजय उन्हें आदेश नहीं दे सकते

प्रणब मुखर्जी

प्रणब मुखर्जी भी इन सब का हिस्सा थे. भले ही आज वे अपने संस्मरण में कुछ भी कहें, वो इस बात से हट नहीं सकते क्योंकि उस दौर में वो संजय गांधी के दाएं हाथ जैसे थे, उनके खासमखास थे. वस्तुतः तो उन्हें उस उच्च संवैधानिक दफ्तर का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए जहां बैठकर वो अपने संस्मरण लिखते हैं. हम उस कार्यालय का सम्मान करते हैं पर अब उस कार्यालय को चुनौती देना सही नहीं होगा.

मेरी गिरफ्तारी

मेरे गिरफ्तार होने के एक दिन पहले ‘मेनस्ट्रीम’ के निखिल चक्रवर्ती ने मुझसे कहा था कि अपना घर साफ कर लो. उसी दोपहर रामनाथ गोयनका ने मुझसे कहा, ‘मुझे नहीं पता वो तुम्हारे साथ क्या करने वाले हैं पर आजकल मैं जहां भी जाता हूं बस तुम्हारा ही नाम सुन रहा हूं… कि कैसे इस व्यक्ति ने लेख लिख-लिखकर इंदिरा गांधी के खिलाफ एक माहौल तैयार कर दिया है. वो सब तुम्हारे खिलाफ हैं.’  तो अगले दिन सुबह जब पुलिस मेरे घर आई तो मैंने उनसे कहा कि वो मेरे पूरे घर की तलाशी ले सकते हैं, पर वो बोले, ‘हम आपके घर की तलाशी लेने नहीं बल्कि आपको गिरफ्तार करने आए हैं!’ ये मेरे लिए अप्रत्याशित था क्योंकि इस बारे में तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था. इससे पहले मैं कभी जेल नहीं गया था तो जब मैं वहां पहुंचा तो मैंने देखा कि मेरे वार्ड में 28 और लोग भी थे. उनमें से अधिकतर जनसंघ के लोग थे. हालांकि मैं उनके खिलाफ लिखता था पर वे मेरा सम्मान करते थे. मेरी सुनते भी थे. जब उन्होंने मुझसे कहा कि वे लोग आने वाले स्वतंत्रता दिवस का बहिष्कार करने की सोच रहे हैं, तब मैंने कहा, ‘क्यों? हम क्यों स्वतंत्रता दिवस का बहिष्कार करें? हमें इंदिरा गांधी ने आजादी नहीं दिलाई! ये हमारे पूर्वजों ने एक लंबी लड़ाई लड़ कर हासिल की है, इसलिए हमें झंडा फहराना चाहिए और वो सहमत भी हुए.’ मुझे तब ही हिरासत में लिया गया था जब मैंने इंदिरा गांधी को वो पत्र लिखा था. पर मेरी पत्नी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के बिना, इंदिरा में मुझे छोड़ा न होता. मेरा केस सुनने वाले जजों को बाद में ट्रांसफर या पद अवनति (डिमोशन) के रूप में सजा मिली. एक समय पर ओम मेहता (जो इंदिरा गांधी सरकार में गृह राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार थे) ने मुझसे पूछा था कि क्या मुझे जेल खराब लगी. ‘बहुत ज्यादा’, मैंने जवाब दिया. तो उस पर उन्होंने मुझे मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहा कि आपको अशोका होटल थोड़े न भेजा था.

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