हरेक बात पे कहते हो तुम कि…

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फोटोः गरिमा जैन
फोटोः गरिमा जैन

बात 1967 की है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एक छात्र एलएलबी के अंतिम वर्ष की परीक्षा दे रहा था. इस छात्र का परिवार शहर के सबसे प्रभावशाली घरानों में से था. दादा श्री कैलाश नाथ काटजू मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और दो विभिन्न राज्यों के राज्यपाल रह चुके थे. केंद्र सरकार में भी वे पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में कानून मंत्री का पद संभालने के साथ-साथ केंद्रीय गृहमंत्री एवं रक्षामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके थे. इस छात्र के पिता उस वक्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे. अब इस छात्र को अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी का वकील बनना था. अंतिम वर्ष की परीक्षाओं में इस छात्र ने पूरे विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक हासिल करके वकालत की डिग्री हासिल की. अपनी पारिवारिक विरासत संभालने की योग्यता अब यह युवा हासिल कर चुका था. लेकिन इसकी इच्छा वकालत करने की नहीं बल्कि समाज के लिए कुछ सार्थक करने की थी. अपनी इसी इच्छा के चलते इस युवक ने एक शिक्षक बनने की सोची और मामूली-से वेतन पर एक गांव में जाकर बच्चों को पढ़ाने लगा. एक इतने प्रभावशाली परिवार के इस युवा ने जब अपनी विरासत को छोड़ कर शिक्षक बनने का फैसला लिया होगा तो शायद खुद उसने भी नहीं सोचा होगा कि भविष्य में उसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनना है.

जस्टिस मार्कंडेय काटजू के जीवन का यह पहलू शायद आपके लिए नया हो लेकिन उनका नाम तो आप निश्चित ही कई बार और शायद रोज ही सुनते होंगे. आज यदि टीवी, अखबार, रेडियो, इंटरनेट या किसी भी अन्य माध्यम से सूचनाएं आप तक पहुंच रही हैं तो जस्टिस काटजू भी जरूर आप तक लगातार पहुंच रहे होंगे. वैसे तो सर्वोच्च न्यायालय से अब तक सैकड़ों न्यायाधीश रिटायर हो चुके हैं और उनमें से कुछ भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष भी रह चुके हैं लेकिन आपने शायद उनका नाम भी न सुना हो. लेकिन देश में रहते हुए भी यदि आपने जस्टिस काटजू का नाम नहीं सुना तो यकीन मानिए आप सूचनाओं के इस दौर में कहीं बहुत पीछे छूट चुके हैं.

जस्टिस काटजू आज एक ऐसा नाम बन चुके हैं जिनके पास हर मुद्दे पर बोलने को बहुत कुछ है. कभी आप उनके बयानों से सहमत हो सकते हैं तो कभी वे आपको नाराज भी कर सकते हैं. लेकिन किसी भी मुद्दे पर उनके बयानों से आप अछूते नहीं रह सकते. उनके बारे में अलग-अलग लोगों की राय भी अलग-अलग ही है. काफी हद तक यह भी संभव है कि आप उनके बारे में एक राय कभी बना भी न पाएं क्योंकि जब तक आप उनके एक बयान का विश्लेषण करके उसको समझने की कोशिश करें, उनका कोई और बयान आपकी अब तक की समझ को बिल्कुल पलट कर रख सकता है. वैसे जस्टिस काटजू खुद भी इस बात को जानते हैं कि लोग उनको समझ नहीं पा रहे हैं और उनके बारे में अलग-अलग राय रखते हैं. इसलिए गुजरे साल के अंत में उन्होंने खुद ही अपने बारे में समझाते हुए अपने ब्लॉग पर लिखा, ‘मुझे कई तरीकों से वर्णित किया गया है जैसे कि एक सनकी, पागल, आवारा, जंगली, प्रचार का भूखा और यहां तक कि एक कुत्ता (एक मुख्यमंत्री द्वारा) जो दुनिया के हर मुद्दे पर टिप्पणी करता है. लेकिन मैं सच में कौन हूं? मैं किसके लिए बोलता हूं? चूंकि नया साल आ रहा है इसलिए मुझे लगता है कि मेरे विचारों के स्पष्टीकरण का भी यह सही समय है… मैं बताना चाहता हूं कि मेरे विचार तर्कसंगत, स्पष्ट और एकमात्र उद्देश्य के प्रति केंद्रित हैं और वह उद्देश्य है मेरे देश की समृद्धि और उसके नागरिकों को एक सभ्य जीवन देने में मदद करना.’

ऐसा नहीं है कि प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनने के बाद ही जस्टिस काटजू ने अपनी बेबाक राय देना शुरू किया हो. एक न्यायाधीश रहते हुए भी वे कई ऐसे ऐतिहासिक फैसले दे चुके हैं जो सारे देश में चर्चा का विषय बने. जैसा कि जस्टिस काटजू ने अपने ब्लॉग में लिखा है, ‘कई लोग कहते हैं कि जस्टिस काटजू को चर्चाओं में बने रहना आता है और वे कई सालों से ऐसा करते आ रहे हैं. लेकिन उनको नजदीक से जानने वाले सभी लोग यह मानते हैं कि वे चर्चा में रहने के लिए कुछ भी नहीं करते बल्कि उनमें कई ऐसी बातें हैं जो उन्हें बाकी सबसे अलग करती हैं.,  जस्टिस काटजू के साथ वकालत की पढ़ाई करने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता टीपी सिंह बताते हैं, ‘जस्टिस काटजू छात्र जीवन से ही सामाजिक मुद्दों को लेकर बेहद संवेदनशील थे. वकालत करने के बाद, इतने संपन्न परिवार से होने के बावजूद वे गांव में बच्चों को पढ़ाते थे. वे एक छोटे-से कमरे में अकेले रहते थे और अपना खाना खुद ही बनाते थे. यह बात अधिकतर लोगों को मालूम भी नहीं है. तो ऐसा नहीं है कि वे चर्चा में रहने के लिए ही सबकुछ करते हों.’ जस्टिस काटजू के साथ वकालत कर चुके एक अन्य अधिवक्ता बताते हैं कि वे हमेशा ही समाज के लिए कुछ करना चाहते थे और इसका रास्ता भी वे खुद ही तैयार करना चाहते थे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष वीएस सिंह बताते हैं, ‘उनका मानना था कि मुझे अपने पिता जी के रास्ते पर नहीं चलना बल्कि एक शिक्षक के तौर पर सामाजिक हितों के लिए काम करना है. कुछ समय बाद उन्होंने महसूस किया कि वकालत के माध्यम से समाज की ज्यादा बेहतर सेवा की जा सकती है तो उन्होंने वकालत शुरू कर दी. वकील रहते हुए भी वे अक्सर कहते थे कि मुझे जब भी मौका मिलेगा मैं अपने स्तर से लोगों के लिए काम करूंगा. जज बनने के बाद उन्होंने कई ऐतिहासिक फैसले देकर अपनी बात को साबित भी किया.’

‘वे अक्सर सड़क किनारे आम लोगों के साथ आग तापने बैठ जाया करते थे और लोगों को पता भी नहीं चलता था कि ये आदमी हाई कोर्ट के जज हैं’

जस्टिस काटजू के बारे में एक सवाल जो शायद सभी के मन में आता होगा वह है कि आखिर वे चाहते क्या हैं. काटजू 40 साल से ज्यादा लबें समय से कानून के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं और यदि उनके न्यायिक कार्यकाल में दिए गए फैसलों और बयानों के आधार पर आप उनको समझना चाहें तो उनके कई रूप आपके सामने आएंगे. कभी वे आपको प्रगतिशील लग सकते हैं, तो कभी रूढ़िवादी, कभी शांत और सौम्य तो कभी जोशीले और मुंहफट. वरिष्ठ अधिवक्ता वीएस सिंह जस्टिस काटजू द्वारा दिए गए एक फैसले के बारे में बताते हैं, ‘आज से लगभग 20-22 साल पहले मेरा एक मुकदमा जस्टिस काटजू की कोर्ट में लगा था. मामला प्रेम विवाह का था. एक लड़का और लड़की घर से भाग गए थे और शादी करना चाहते थे. उस दौरान घर से भागकर शादी करना बहुत ही असामान्य बात थी. हमारा समाज बिल्कुल भी इस बात की इजाजत नहीं देता था. लड़के वाले भी दहेज के लालच में ऐसा नहीं होने देते थे. लेकिन जस्टिस काटजू ने मेरे मुवक्किलों को पूरा संरक्षण देते हुए कहा कि यदि दोनों बालिग हैं तो कोई उन्हें शादी करने से नहीं रोक सकता.’ अधिवक्ता सिंह आगे बताते हैं, ‘महिला अधिकारों और मानवाधिकारों पर आज तो कई कार्यक्रम हो रहे हैं लेकिन जस्टिस काटजू इन बातों को कई साल पहले से करते आ रहे हैं. वे हमेशा से ही दूरदर्शी रहे हैं और उन्होंने समय से आगे की बात कही है.’ इन बातों से आप जस्टिस काटजू में प्रगतिशील व्यक्ति की छवि देख सकते हैं.

एक जज रहते हुए उनके व्यवहार से भी यदि आप उनको समझना चाहें तो उनके साथी टीपी सिंह की बातें आपके लिए काफी दिलचस्प साबित हो सकती हैं. वे बताते हैं, ‘जस्टिस काटजू हमेशा से ही आम आदमी के जज रहे हैं. जज रहते हुए वे जब सुबह टहलने निकलते थे तो सड़क पर बैठे लोगों की बात सुनते थे. कभी सड़क किनारे आग ताप रहे लोगों के साथ ही बैठ जाया करते थे. लोगों को पता भी नहीं होता था कि वे एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं. इस तरह से वे अपने देश के हालात एक आम आदमी की नजरों से देखने को हमेशा तैयार रहते थे.’

जस्टिस काटजू को यदि आप उनके हाल के दिनों में दिए गए साक्षात्कारों से समझने की कोशिश करें तो आपको लगेगा कि वे अक्सर सामने वाले को डांट दिया करते हैं. पिछले दिनों जाने-माने टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया पर जिस तरह से वे बिफरे और साक्षात्कार बीच में रोककर जिस तरह उन्होंने चौरसिया को गेट आउट  तक कह डाला, यह देखकर किसी को भी लग सकता है कि गुस्सा शायद हर वक्त जस्टिस काटजू की नाक पर सवार रहता है. वैसे उनकी यह आदत काफी पुरानी है और शायद आज भी वे अपने न्यायाधीश वाले रोब से बाहर नहीं आ पा रहे हैं. उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के उपाध्यक्ष इंद्र कुमार चतुर्वेदी बताते हैं, ‘सुनवाई के दौरान वे कई बार वकीलों को यह तक कह डालते थे कि वकालत नहीं होती तो जाकर पकोड़ियां बेचो. लेकिन उनका गुस्सा बेवजह नहीं होता था. वे पूरी तैयारी से अपनी अदालत में आते थे. कानून पर उनकी समझ और ज्ञान का भी कोई मुकाबला नहीं है. ऐसे में अगर कोई वकील बिना तैयारी के उनके सामने पहुंच जाए और उनके सवालों का सही जवाब न दे पाए तभी वे गुस्सा करते थे.’ चतुर्वेदी जी आगे बताते हैं, ‘लेकिन वे दिल के बहुत ही भले हैं. कोर्ट के बाद वकीलों को अपने पास बुलाकर माफी भी मांग लिया करते थे. इलाहाबाद के वकील तो उनकी इस आदत से परिचित थे, इसलिए उनके डांटने का कोई बुरा भी नहीं मानता था. सभी वकील उनका बहुत सम्मान करते हैं.’

‘अक्सर पत्रकार काटजू की अदालत में आकर बैठ जाते थे कि न जाने कब वे कुछ बोल जाएं और उन्हें अगले दिन की हेडलाइन मिल जाए’

वैसे जस्टिस काटजू के जीवन की कई बातें आपको यह भी आभास कराती हैं कि वे जनता के प्रति बहुत ही नम्र हैं. 2005 में मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए जब उन्होंने न्यायालय की अवमानना से संबंधित एक बयान दिया तो सारे देश में उनकी खूब वाहवाही हुई. उन्होंने एक आयोजन में कहा, ‘गणतंत्र की मूल भावना है कि यहां जनता सर्वोपरि होती है. जज, नेता, मंत्री, अफसर सभी जनता के सेवक हैं. हमें जनता का सेवक होने पर गर्व होना चाहिए. चूंकि जनता हमारी मालिक है, इसलिए उन्हें यह भी अधिकार है कि अगर हम अच्छा काम नहीं करें तो वह हमारी निंदा कर सकती है. हमें ऐसी निंदा से नाराज नहीं होना चाहिए. हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी शक्तियां जनता के विश्वास पर ही टिकी हैं, न्यायालय की अवमानना के दोष में सजा देने के अधिकार पर नहीं.’ जस्टिस काटजू के इस बयान की जमकर प्रशंसा हुई. मशहूर कानूनविद फाली एस नरीमन ने उनके इस बयान के बाद एक लेख लिखा. अपने लेख में उन्होंने लिखा कि जस्टिस काटजू एक ऐसे न्यायाधीश हैं जो अवमानना के दायरों से कहीं ऊपर हैं. उन्होंने यह भी लिखा कि आज यदि शेक्सपियर जिंदा होते तो कहते, ‘एक सच्चा न्यायकर्ता अब न्याय करने आया है. हां, एक सच्चा न्यायकर्ता. ओ ज्ञानी न्यायाधीश, मैं किस तरह से तुम्हारा सत्कार करूं.’

जस्टिस काटजू के बारे में यह जानकर यदि आप उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बना रहे हैं जो जनता के प्रति बहुत ही विनम्र हैं और जिसमें अपने पद को लेकर जरा भी अहंकार नहीं तो आपको उनका दूसरा पक्ष भी जानना जरूरी है. यह बात 2011 की है. जस्टिस काटजू अब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे. किसी व्यक्ति ने सूचना के अधिकार के तहत सर्वोच्च न्यायालय से कुछ सूचना मांगी. सूचना का संबंध जस्टिस काटजू से भी था इसलिए सूचना अधिकारी ने उन्हें इस संबंध में एक पत्र लिखा. जस्टिस काटजू इस पत्र से इतना नाराज हुए कि उन्होंने सूचना के अधिकार पर ही लगाम लगाने की बात कह डाली. इस बारे में जस्टिस काटजू ने कहा, ‘सूचना अधिकारी मुझे पत्र लिखकर कहते हैं कि 24 घंटे के अंदर सूचना दें. मैं सूचना देने से इनकार नहीं कर रहा लेकिन यह कोई तरीका है? यह तो बेहूदापन है. मैं सुप्रीम कोर्ट का एक जज हूं. मुझसे कुछ पूछना है तो मेरे सेक्रेटरी से समय लो और जब मैं फुर्सत में रहूं तो आकर बात करो. मैं कोई चपरासी हूं क्या, जो मुझसे ऐसे पूछा जाए. इस सूचना के अधिकार ने सरकारी कर्मचारियों की नाक में दम कर दिया है. इस अधिकार को संशोधित करके इसे सीमित करने की जरूरत है.’ जो जस्टिस काटजू खुद को जनता का सेवक मानते हैं और इस बात पर गर्व भी करते हैं, वही सिर्फ एक सूचना मांगने पर आपको यह भी याद दिला देते हैं कि वे कोई चपरासी नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हैं.

‘जस्टिस काटजू ने जो लिखा वह तथ्यों के आधार पर ही लिखा. और भारत का नागरिक होने के नाते यह उनका अधिकार है’

जस्टिस काटजू के व्यवहार में ऐसे विरोधाभास आपको कई बार नजर आते हैं. भ्रष्टाचार के विरोध में जब सारा देश अन्ना हजारे के नेतृत्व में सड़कों पर उतर आया था तो जस्टिस काटजू ने इसे सिरे से निरर्थक घोषित कर दिया. उनका मानना था कि अन्ना-अरविंद जैसे लोग सिर्फ मीडिया द्वारा बनाए गए हैं और इनकी कोई वैज्ञानिक सोच नहीं है. जस्टिस काटजू का कहना था, ‘आप सड़कों पर भारत माता की जय और वंदे मातरम जैसे नारों का शोर मचा लीजिए लेकिन इससे भ्रष्टाचार खत्म होने वाला नहीं है. मैंने जन लोकपाल कानून पढ़ा है. यह कानून भ्रष्टाचार को खत्म करने की जगह एक पल में ही दोगुना कर देगा.’ अपने इन बयानों के समर्थन में उन्होंने एक लेख भी लिखा और जन लोकपाल की अपने तरीकों से व्याख्या की. अन्ना आंदोलन की शेक्सपियर के शब्दों में व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा, ‘अ टेल टोल्ड बाई एन ईडियट, फुल ऑफ साउंड ऐंड फ्यूरी, सिग्नीफाइ नथिंग (एक बेवकूफ द्वारा कही गई ऐसी कहानी जिसमें सिर्फ शोर-शराबे के सिवा कुछ नहीं है).’ जो लोग यह मान रहे थे कि अन्ना आंदोलन में शामिल होने वाले लोग सिर्फ क्षणिक आवेश में आकर ऐसा कर रहे हैं, उन्होंने जस्टिस काटजू के इस बयान का समर्थन भी किया. उनके इस बयान से आप भी कुछ देर को यह मान सकते हैं कि जस्टिस काटजू अच्छे से सोच-समझकर चीजों का आकलन करने के बाद ही अपनी राय देते हैं. लेकिन आपकी इस सोच को भी जस्टिस काटजू ज्यादा देर टिकने नहीं देते. कोर्ट में निर्णय देते हुए वे कई बार ऐसे ही क्षणिक आवेश में बहुत कुछ बोल चुके हैं. विशेष तौर पर जब उन्होंने 2007 में एक मामले की सुनवाई के दौरान भ्रष्टाचारियों को सार्वजनिक रूप से फांसी देने को कहा था तो पूरे देश में यह चर्चा का विषय बन गया था. उन्होंने कहा था, ‘हर कोई इस देश को लूटना चाहता है. ऐसे भ्रष्ट लोगों को सार्वजनिक तौर पर बिजली के खंभों पर लटका कर फांसी दी जानी चाहिए. कानून हमें ऐसा करने की अनुमति नहीं देता वरना हम यही पसंद करते कि भ्रष्ट लोगों को फांसी दे दी जाए.’ ऐसे ही उदहारण उनके जीवन से तब भी मिलते हैं जब वे सर्वोच्च न्यायालय में रहते हुए सभी जिला एवं उच्च न्यायालयों को ऑनर किलिंग के मामलों में फांसी देने के निर्देश दे डालते हैं, या जब फर्जी एनकाउंटर में आरोपित पुलिस वालों को फांसी देने की बात करते हैं. जस्टिस काटजू का जोश में आकर ऐसे बयान देना इतना चर्चित हो चुका था कि सर्वोच्च न्यायालय के एक अधिवक्ता बताते हैं, ‘अक्सर पत्रकार उनकी अदालत में आकर बैठ जाते थे कि न जाने कब वे कुछ बोल जाएं और उन्हें अगले दिन की हेडलाइन मिल जाए. इसीलिए वे जज रहते हुए भी इतने चर्चित रहे हैं.’ ऐसे ही जोश में बोलने पर जस्टिस काटजू तब भी विवाद खड़ा कर चुके हैं जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहते हुए वे कोर्ट में बोल पड़े थे, ‘बीवी की हर बात सुना करो. यह समझने की कोशिश मत करो कि वह बात सही है या नहीं. बस उसे चुपचाप सुन लिया करो. हम सब भोगी हैं.’ लेकिन आपको यह भी बता दें कि उनके ऐसे बयानों के बीच भी उनकी बौद्धिकता की तारीफ हमेशा हुई है. इसीलिए उनके कोर्ट के किस्से अगर मनोरंजक हैं तो उनके फैसलों में बौद्धिकता की छौंक भी खूब देखने को मिलती है. भारत के अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती का उनके कोर्ट के बारे में कहना था, ‘जस्टिस काटजू के कोर्ट में एक पल भी सुस्ती भरा या मंद नहीं होता था.’

जस्टिस काटजू के बारे में कोई राय बनाना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है कि विरोधाभास उनके जीवन के हर पहलू में आपको नजर आते हैं. जब वे उड़ीसा सरकार को फटकारते हुए कहते हैं, ‘यदि तुम अल्पसंख्यकों को संरक्षण नहीं दे सकते तो त्यागपत्र दे दो’, तो आपको यह महसूस होता है कि वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनके संरक्षण के प्रति बहुत ही समर्पित हैं. यही एहसास वे आपको तब भी करवाते हैं जब हज यात्रा के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को असंवैधानिक घोषित करने की याचिका को वे ठुकरा देते हैं और फैसले में स्पष्ट करते हैं कि कैसे एक विशेष समूह को दी जाने वाली यह रियायत बिल्कुल संवैधानिक है. लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने वाले उनके व्यवहार पर तब आपको कुछ संदेह जरूर होता है जब वे मध्य प्रदेश के छात्र मोहम्मद सलीम की याचिका को खारिज कर देते हैं. मोहम्मद सलीम मध्य प्रदेश के निर्मला कॉन्वेंट हाई स्कूल का एक छात्र था. इस छात्र को स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया था कि उसने अपनी दाढ़ी कटवाने से इनकार कर दिया था. स्कूल के इस फैसले के खिलाफ सलीम जस्टिस काटजू की अदालत में पहुंचा. जस्टिस काटजू ने उसकी याचिका को ठुकराते हुए कहा, ‘मुस्लिम छात्रों को दाढ़ी बढ़ाने की अनुमति हम नहीं दे सकते. ऐसा करने से देश का तालिबानीकरण होगा.’ इस बयान पर देश भर में विवाद हुआ. बाद में जस्टिस काटजू ने अपना यह फैसला वापस लेते हुए कहा कि हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का नहीं था.

2 COMMENTS

  1. Dear Sir

    Thanks for writing such a good article on one of the great judges of our time. But here you missed one aspect of Justice Katju. When I was studying in Law School, BHU (Varanasi), I read one of his articles, and that article is related with the interpretation of statutes. Judges generally follow the tradition of interpreting complex provisions of law in the light of eminent jurist Maxwell, but it is only Justice Katju, who established Mimansa School of Interpretation. In this way, he not only established our heritage of interpretation of complex law, and influenced others to follow Mimansa school of interpretation.

    His grand father Shri Kailashnath Katju was also a great advocate who argued in the case of INA trial. Besides, he was also a great scholar of international law.
    I do not agree with all logics of Justice Markandeya Katju, but his arguments are invincible, and he must be praised for his foresight and brilliance.

    Thanks again for writing such a beautiful article on the most Hon’ble Justice Katju

    Balendu Priyadarshan

    Advocate

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