सौदों के बाद शोध में सड़ांध | Tehelka Hindi

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सौदों के बाद शोध में सड़ांध

सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने कुछ दिन पहले एक साक्षात्कार में यह स्वीकार किया कि उन्हें विदेशी कंपनी के साथ होने वाले एक रक्षा सौदे में रिश्वत की पेशकश की गई थी. इसके बाद एक बार फिर से हर तरफ यह चर्चा हो रही है कि किस तरह से रक्षा सौदों में दलाली बदस्तूर जारी है और ज्यादातर रक्षा सौदों को विदेशी कंपनियां अपने ढंग से प्रभावित करने का खेल अब भी खेल रही हैं. इसके बाद सेनाध्यक्ष का प्रधानमंत्री को लिखा वह पत्र लीक हो गया जिसमें बताया गया है कि हथियारों से लेकर तैयारी के मामले तक में सेना की स्थिति ठीक नहीं है. नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट भी सेना की तैयारियों की चिंताजनक तस्वीर सामने रखती है.

रक्षा सौदों में दलाली और तैयारी के मोर्चे पर सेना की बदहाली के बीच एक मामला ऐसा है जो इशारा करता है कि विदेशी कंपनियां अपनी पहुंच और पहचान का इस्तेमाल न सिर्फ रक्षा सौदों के लिए कर रही हैं बल्कि इस क्षेत्र के शोध और विकास की प्रक्रिया को बाधित करने के खेल में भी शामिल हैं ताकि उनके द्वारा बनाए जा रहे रक्षा उपकरणों के लिए भारत एक बड़ा बाजार बना रहे.
यह मामला है 1972 में शुरू हुई उस परियोजना का जिसके तहत मिसाइल में इस्तेमाल होने वाला एक बेहद अहम उपकरण विकसित किया जाना था. इसमें शामिल एक बेहद वरिष्ठ वैज्ञानिक का कहना है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर शुरू हुई यह परियोजना जब अपने लक्ष्य को हासिल करने के करीब पहुंची तो इसे कई तरह के दबावों में जानबूझकर पटरी से उतार दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि आज भी भारत इस तरह के उपकरण बड़ी मात्रा में दूसरे देशों से खरीद रहा है. इंदिरा गांधी के बाद के चार प्रधानमंत्रियों के संज्ञान में इस मामले को लाए जाने और एक प्रधानमंत्री द्वारा जांच का आश्वासन दिए जाने के बावजूद अब तक इस मामले की उचित जांच नहीं हो सकी है.

साठ के दशक में चीन से चोट खाने और फिर 1971 में पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई के बाद यह महसूस किया गया कि रक्षा तैयारियों के मामले में अभी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है. फिर से भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस सपने का जिक्र हो रहा था जिसमें उन्होंने कहा था कि वे रक्षा जरूरतों के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं. तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रक्षा से संबंधित अहम स्वदेशी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उन भारतीय वैज्ञानिकों की सेवा लेने पर जोर दिया जो दूसरे देशों में काम कर रहे थे.इन्हीं कोशिशों के तहत अमेरिका की प्रमुख वैज्ञानिक शोध संस्था नासा में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिक रमेश चंद्र त्यागी को भारत आने का न्योता दिया गया. त्यागी ने देश के लिए काम करने की बात करते हुए नासा से भारत आने के लिए मंजूरी ले ली. इसके बाद भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की एक लैब सॉलिड स्टेट फिजिक्स लैबोरेट्री में उन्हें प्रमुख वैज्ञानिक अधिकारी (प्रिंसिपल साइंटिफिक ऑफिसर) के तौर पर विशेष नियुक्ति दी गई. उन्हें जो नियुक्ति दी गई उसे तकनीकी तौर पर ‘सुपर न्यूमरेरी अपवाइंटमेंट’ कहा जाता है. यह नियुक्ति किसी खास पद या जरूरत को ध्यान में रखकर किसी खास व्यक्ति के लिए होती है और अगर वह व्यक्ति इस पद पर न रहे तो यह पद खत्म हो जाता है.

दुश्मन के जहाज को गिराने के लिए भारत उस समय जिस मिसाइल का इस्तेमाल करता था उसमें एक उपकरण होता था ‘इन्फ्रा रेड डिटेक्टर’. इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे आम बोलचाल की भाषा में ‘मिसाइल की आंख’ कहा जाता है. मिसाइल कैसे अपने लक्ष्य तक पहुंचेगी, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि यह उपकरण कैसे काम कर रहा है. पर इस उपकरण के साथ गड़बड़ी यह है कि इसकी उम्र महज छह महीने होती है. मिसाइल का इस्तेमाल हो या न हो लेकिन हर छह महीने में यह उपकरण बदलना पड़ता है. उन दिनों भारत रूस से यह डिटेक्टर आयात करता था. जानकार बताते हैं कि कई बार रूस समय पर यह डिटेक्टर देता भी नहीं था. इंदिरा गांधी ने इस समस्या को समझा और तय किया कि भारत ऐसा उपकरण खुद विकसित करेगा. नासा में काम करते हुए त्यागी ने दो पेटेंट अर्जित किए थे और वहां वे इसी तरह की एक परियोजना पर काम कर रहे थे. सेमी कंडक्टर टेक्नोलॉजी और इन्फ्रा रेड डिटेक्शन पर त्यागी के काम को अमेरिका में काफी सराहा भी गया था. इसी वजह से उन्हें इस परियोजना का कार्यभार सौंपा गया.

1972 में भारत आकर त्यागी ने इस परियोजना पर काम शुरू किया. भारत सरकार ने इस परियोजना को ‘सर्वोच्च प्राथमिकता यानी टॉप प्रायोरिटी’ की श्रेणी में रखा था. औपचारिक तौर पर इसे ‘पीएक्स एसपीएल-47’ नाम दिया गया. त्यागी के सहयोगी के तौर पर अमेरिका के नेब्रास्का विश्वविद्यालय में काम कर रहे वैज्ञानिक एएल जैन को भी भारत लाया गया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद प्रतिष्ठित समझी जाने वाली फुलब्राइट स्कॉलरशिप हासिल कर चुके जैन भी देश के लिए कुछ करने का भाव मन में रखकर यहां आए थे. जैन के पास अमेरिकी सेना की कुछ ऐसी परियोजनाओं में काम करने का अनुभव भी था. इन दोनों वैज्ञानिकों ने मिलकर कुछ ही महीनों के अंदर वह उपकरण विकसित कर लिया और बस उसका परीक्षण बाकी रह गया था. इसी बीच पहले एएल जैन को विभाग के अधिकारियों ने परेशान करना शुरू किया. डीआरडीओ की मैनेजमेंट इन्फार्मेशन रिपोर्ट (एमआईआर) में भी इस बात का जिक्र है कि उन्हें परेशान इसलिए किया जा रहा था कि उन्होंने केमिकल बाथ मेथड से डिटेक्टर विकसित करने की परियोजना को लेकर आपत्ति जताई थी और इस तथ्य को भी उजागर किया था कि इसकी क्षमता को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है. लेकिन जैन की बात को परखने की बजाय उन्हें इस कदर परेशान किया गया कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया. त्यागी बताते हैं कि कुछ समय के बाद जैन अमेरिका वापस चले गए. इसके बाद तरह-तरह से उन्हें भी परेशान किया जाने लगा. इसकी शिकायत उन्होंने उस वक्त के रक्षा मंत्री वीएन गाडगिल से भी की. त्यागी कहते हैं कि गाडगिल ने उपयुक्त कदम उठाने की बात तो कही लेकिन किया कुछ नहीं.

डीआरडीओ ने उपकरण के परीक्षण की दिशा में काम आगे बढ़ाने की बजाय एक दिन त्यागी को बताया कि आपका स्थानांतरण पुणे के सैनिक शिक्षण संस्थान में कर दिया गया है. इस तरह से रहस्यमय ढंग से उस परियोजना को पटरी से उतार दिया गया जिसके लिए इंदिरा गांधी ने विदेश में काम कर रहे दो वरिष्ठ भारतीय वैज्ञानिकों को विशेष आग्रह करके भारत बुलाया था. इसका नतीजा यह हुआ कि आज भी भारत इस तरह के उपकरणों के लिए काफी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर है. जानकारों का कहना है कि इस तरह के जो उपकरण भारत में बाद में विकसित भी हुए उनकी हालत गुणवत्ता के मामले में बहुत अच्छी नहीं है.
त्यागी कहते हैं,  ‘इस परियोजना को तहस-नहस करने का काम उस लॉबी ने किया जो इस उपकरण के सौदों में शामिल थी. इस उपकरण के आयात पर 20 फीसदी दलाली की बात उस वक्त होती थी. इसलिए इन सौदों में शामिल लोगों ने यह सोचा कि अगर स्वदेशी उपकरण विकसित हो गया तो उन्हें मिल रहा कमीशन बंद हो जाएगा. यह बात तो किसी से छिपी हुई है नहीं कि रक्षा सौदों में किस तरह से दलाली का दबदबा है. लेकिन मेरे लिए सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि रक्षा क्षेत्र से संबंधित शोध और विकास कार्यों पर भी किस तरह से विदेशी कंपनियां, कमीशन खाने वाली लॉबी और उनके इशारे पर काम करने वाले अधिकारी असर डाल रहे थे.’ इसके बाद त्यागी ने तय किया कि वे हारकर अमेरिका नहीं लौटेंगे बल्कि भारत में रहकर ही यह लड़ाई लड़ेंगे.

अब तक इस रहस्य से पर्दा नहीं उठा कि आखिर वह कौन-सी ताकत थी जिसने त्यागी की अगुवाई में शुरू हुई अहम रक्षा परियोजना का बेड़ा गर्क कर दिया

लंबी लड़ाई के पहले कदम के तौर पर त्यागी ने अपने स्थानांतरण के आदेश को मानने से इनकार कर दिया. वे कहते हैं,  ‘मुझे एक परियोजना विशेष के लिए लाया गया था तो फिर स्थानांतरण स्वीकार करने का सवाल ही नहीं उठता था. खुद पुणे के उस संस्थान के निदेशक ने कहा था कि रमेश चंद्र त्यागी के पास जिस क्षेत्र की विशेषज्ञता है उससे संबंधित वहां कोई काम ही नहीं है.’ बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में इस बात को दोहराया. त्यागी को स्थानांतरण का यह आदेश 1977 की फरवरी में मिला था. इसे मानने से इनकार करने पर उन्हें दो साल के लिए आईआईटी में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया. उन्होंने यहां 1978 से 1980 तक काम किया और इसी दौरान उन्हें बेहद प्रतिष्ठित श्री हरिओम प्रेरित एसएस भटनागर पुरस्कार मिला. यह पुरस्कार उन्हें सोलर कंसन्ट्रेटर विकसित करने के लिए मिला था. यह रक्षा मंत्रालय के किसी वैज्ञानिक को मिलने वाला पहला राष्ट्रीय पुरस्कार था. प्रतिनियुक्ति पूरी होने के बाद उन्हें फिर से पुणे जाने के लिए कहा गया. जब उन्होंने ऐसा करने से मना किया तो उन्हें बर्खास्त कर दिया गया. त्यागी कहते हैं, ‘मैं भारत का पहला ऐसा वैज्ञानिक बन गया था जिसे बर्खास्त किया गया था और मैं इस कलंक के साथ मरना नहीं चाहता था. मैं उस नापाक गठजोड़ को भी उजागर करना चाहता था जिसने भारत की एक प्रमुख स्वदेशी रक्षा परियोजना को सफलता के मुहाने पर पहुंचने के बावजूद ध्वस्त कर दिया था.’

उस समय से लेकर अब तक त्यागी इस मामले को विभिन्न सक्षम अदालतों, एजेंसियों और व्यक्तियों के सामने उठाते रहे हैं लेकिन अब तक इस रहस्य से पर्दा नहीं उठा है कि आखिर वह कौन-सी ताकत थी जिसने त्यागी की अगुवाई में शुरू हुई उस परियोजना का बेड़ा गर्क कर दिया. इस बात को सिर्फ यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है कि स्थानांतरण और बाद में बर्खास्तगी की खीझ में त्यागी इस तरह के आरोप लगा रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि डीआरडीओ की एमआईआर में भी यह माना गया है कि इस परियोजना को जानबूझकर बाधित किया गया. त्यागी की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि रमेश चंद्र त्यागी के साथ अन्याय हुआ. दुनिया के प्रमुख रिसर्च जर्नलों ने भी माना कि त्यागी जिस पद्धति से इन्फ्रा रेड डिटेक्टर विकसित कर रहे थे सिर्फ उसी के जरिए उच्च गुणवत्ता वाला यह उपकरण विकसित किया जा सकता है. ये तथ्य इस ओर इशारा कर रहे हैं कि कोई न कोई ऐसी ताकत उस वक्त रक्षा मंत्रालय और खास तौर पर डीआरडीओ में सक्रिय थी जिसके हित त्यागी की परियोजना की सफलता से प्रभावित हो रहे थे. यह ताकत शायद अब भी डीआरडीओ और रक्षा मंत्रालय में सक्रिय है और इसी वजह से अब तक इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो पाया है.
1977 में डीआरडीओ ने जो एमआईआर तैयार की थी उसे सॉलिड फिजिक्स लैबोरेट्री के निदेशक को 17 जनवरी, 1977 को सौंपा गया था. यह रिपोर्ट उस समय के रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार एमजीके मेनन को भी भेजी गई थी लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. सॉलिड फिजिक्स लैबोरेट्री में टेक्नीकल मैनेजमेंट डिविजन के प्रमुख रहे जीके अग्रवाल द्वारा तैयार की गई एमआईआर बताती है, ‘इस परियोजना को बाधित करने के लिए बार-बार डॉ त्यागी और डॉ जैन को परेशान किया गया. परियोजना पर काम करने के लिए त्यागी खुद के द्वारा अमेरिका में विकसित किया गया जो यंत्र नासा की विशेष अनुमति से लेकर आए थे उसका नाम था इपिटैक्सियल रिएक्टर. सर्वोच्च प्राथमिकता वाली परियोजना में लगे रहने के बावजूद इसका स्थान बदलकर परियोजना को बाधित करने की कोशिश की गई. अतः इस निष्कर्ष से बचा नहीं जा सकता कि किसी षड्यंत्र के तहत जानबूझकर डॉ जैन और डॉ त्यागी को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई गई.’ जिस अपरेटस का यहां जिक्र है उसे त्यागी ने अमेरिका में विकसित किया था और भारत में ऐसा अपरेटस नहीं होने की वजह से नासा से विशेष अनुमति लेकर वे उसे अपने खर्चे पर भारत लाए थे.

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