सोच के सांचे बदलने का सबक

पिछले कुछ सालों में देश की राजनीति जिस तेजी से बदली है उसने नेताओं से लेकर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों तक को चौंका दिया है. जाहिर सी बात है, जनता की रग-रग से वाकिफ होने का दावा करने वाले नेता, समाजशास्त्री और विश्लेषक इस बदलाव को भांपने में पीछे रह गए. सतह के नीचे बहुत कुछ बहुत तेजी से बदल रहा था, लेकिन लोग इसे पकड़ पाने, महसूस कर पाने में असफल रहे. यही कारण है कि आजकल आने वाले चुनाव परिणाम सभी को चौंका देते हैं. जिस पार्टी को बहुमत मिलता है वह भी हैरान रह जाती है क्योंकि उसने भी इस प्रचंड बहुमत की कल्पना नहीं की होती और जिसकी जमानत जब्त हो जाती है वह भी अवाक और हैरान रह जाता है.

हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ही देखें तो 224 सीटों के साथ भले ही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने खुद को सबसे बड़े दल के रूप में स्थापित किया है लेकिन पार्टी के किसी नेता को इतने बड़े बहुमत की उम्मीद नहीं थी. उसी प्रकार कांग्रेस को भी इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि इतना बेआबरू होकर कूचे से निकलना पड़ेगा.

पंजाब में तो 46 साल से चला आ रहा इतिहास ही बदल गया. यहां राज्य बनने के बाद से लेकर अब तक कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं आई थी. यानी जो पार्टी सत्ता में होती थी उसे अगले चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ता था. लेकिन इस बार एक नया इतिहास रचा गया. शिरोमनि अकाली दल (बादल)-भाजपा गठबंधन न सिर्फ दोबारा सत्ता में आने में सफल रहा बल्कि शिरोमनि अकाली दल तो पिछले चुनाव के मुकाबले अपनी सीटें बढ़ाने में भी कामयाब रहा. उसे पिछले चुनाव के मुकाबले सात सीटें अधिक मिलीं. इससे पहले राज्य में आलम यह था कि सत्तासीन पार्टी इस बात के लिए तैयार रहती थी कि अगली बार उसे विपक्ष में बैठना है. खैर, इस ऐतिहासिक क्षण ने सत्ता विरोधी लहर यानी एंटी इनकमबेंसी को इतिहास की बात बना दिया. अब का समय प्रो इनकमबेंसी का है. यानी जो जनता की उम्मीदों पर खरा उतरेगा वह दोबारा सत्ता में आएगा.

एंटी इनकमबेंसी युग के सबसे बड़े उदाहरण रहे पंजाब ने भले ही 46 साल से यहां की राजनीति का स्थायी भाव रही एंटी इनकमबेंसी को प्रो इनकमबेंसी में बदला है लेकिन अन्य राज्यों में एंटी इनकमबेंसी नामक कारक के अप्रभावी होने की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी. पिछले कुछ समय के चुनाव परिणामों को अगर हम देखें तो देश की बदली राजनीति और जनता के बदले मानस को समझना आसान हो जाएगा. बिहार, हरियाणा, दिल्ली तथा गुजरात जैसे राज्यों से एक नई राजनीति की शुरुआत हुई है. इन राज्यों में सरकारें एंटी इनकमबेंसी को प्रो इनकमबेंसी में बदलते हुए दोबारा चुनकर सत्ता में आईं. अलग-अलग कारणों से यहां की सरकारें भले ही विवादों में रही हों लेकिन लोगों ने उस पर ध्यान न देकर उन सरकारों के विकास और गवर्नेंस पर अपनी मोहर लगाई. अब पूरे देश में उसी विकास और गवर्नेंस की बयार है. चारों तरफ विकास और सुशासन की चर्चा है. जनता के मन में विकास और सुशासन के प्रति इसी आग्रह ने वर्तमान राजनीतिक दलों को अपने चाल, चरित्र, चेहरे, नारे और रणनीति में बदलाव करने पर मजबूर किया. जो बदल गए हैं या बदल रहे हैं वे रेस जीत रहे हैं या रेस में बने हैं. जो नहीं बदला वह अखाड़े में चित पड़ा हुआ है.

बदलाव की इस बयार में सबसे अधिक परिवर्तन उन क्षेत्रीय दलों में आया है जो पिछले कुछ समय तक संकीर्णता के दायरे में जी रहे थे. किसी खास धर्म, पंथ, जाति, मुद्दे या पहचान के आधार पर राजनीति करने वाले इन दलों के राजनीतिक दृष्टिकोण में सबसे अधिक विस्तार आया है. बहुत तेजी से इन क्षेत्रीय दलों ने अपनी राजनीति से समाज के बाकी तबकों को जोड़ने की कोशिश की है या फिर यह कह सकते हैं कि अपनी राजनीति को उन्होंने कुछ इस ढंग से विस्तार दिया है कि उसमें अब अपने परंपरागत आधार के अलावा बाकी के लिए भी स्थान है. इन दलों ने अपने आप को सर्वग्राही बनाते हुए समाज के सभी वर्गों में अपनी स्वीकार्यता बनाने की कोशिश की है. बीते कुछ समय में इन क्षेत्रीय दलों ने जहां अपनी राजनीति करने के तौर-तरीकों में बदलाव लाया है वहीं अपनी क्षेत्रीय पहचान और दृष्टि को राष्ट्रीय तथा सर्वसमावेशी बनाने की कोशिश की है. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जिस तेजी से इन क्षेत्रीय दलों ने खुद को राष्ट्रीय बनाने की शुरुआत की है शायद उस गति से राष्ट्रीय दल अपना क्षेत्रीयकरण नहीं कर पाए हैं.
विभिन्न राज्यों के चुनाव परिणामों ने साबित किया है कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूत हैं वहां जनता की नब्ज पर जिस तरह की पकड़ उनकी है उससे राष्ट्रीय दल बहुत दूर हैं. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में राष्ट्रीय दलों की स्थिति इतनी दयनीय है. इन राज्यों में जनता ने पिछले सालों में क्षेत्रीय दलों पर अपना विश्वास दिखाते हुए राष्ट्रीय दलों को लगातार नकारा है. उत्तर प्रदेश का चुनाव परिणाम इसका ताजा उदाहरण है.

क्षेत्रीय दलों में खुद को समाज के सभी वर्गों से जोड़ने की जो बेचैनी दिखाई दे रही है उसके पीछे बड़ा कारण उनके भीतर अपने जनाधार का विस्तार करने की इच्छा है. चाहे उत्तर प्रदेश हो या बिहार या फिर पंजाब. अभी तक स्थिति यह थी कि पार्टियां अपने सीमित वोट बैंक को ही लेकर आगे चलती थीं. उनके सीमित लेकिन समर्पित वोटर थे. इससे बड़ी समस्या इन दलों को यह हुई कि ये कभी भी अपने दम पर सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाए, इन्हें हमेशा दूसरे दलों या अधिकांश परिस्थितियों में राष्ट्रीय दलों का सहयोग लेना पड़ता था.

समय की मांग है कि राजनीतिक दल चाल, चरित्र, चेहरे, नारे और रणनीति बदलें. जो बदल गए हैं वे रेस जीत रहे हैं या रेस में बने हैं. जो नहीं बदला वह चित पड़ा है

उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) ने सिर्फ दलितों की राजनीति की. दलित आंदोलन से उपजी इस पार्टी ने न सिर्फ दलित हितों की बात की वरन दलितों के मन में इस बात को अच्छी तरह बैठा दिया कि वही उनकी एकमात्र हितैषी पार्टी है. अगर वे सुखी, सुरक्षित तथा सवर्णों के अत्याचार से मुक्त रहते हुए एक सम्मानजनक जीवन जीना चाहते हैं तो उन्हें उसका साथ देना होगा.

सदियों से सवर्णों के हाथों प्रताड़ित दलित बड़ी संख्या में बसपा के साथ जुड़े. सवर्णों को ललकारने एवं गरियाने की बसपा की रणनीति ने उसे दलितों के हृदय में स्थापित कर दिया. लेकिन दलितों के इस अपार और स्थायी समर्थन के बावजूद भी पार्टी कभी अपने दम पर सत्ता में आने में सफल नहीं हो पाई. हर बार उसे किसी न किसी दल से गठबंधन करना पड़ता. यही कारण है कि पार्टी ने अपनी रणनीति बदली. उसने सोचा कि अगर अपने दम पर यूपी में सत्ता में आना है तो उसे दलितों के साथ ही अन्य वर्गों का समर्थन भी प्राप्त करना होगा. इसी के तहत पार्टी ने दूसरी जातियों को लुभाना शुरू किया. उसने बहुजन की जगह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का नारा दिया. जो पार्टी ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ सरीखे नारे दिया करती थी उसका नारा बदल गया. अब वह ‘पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ सरीखे जुमलों का सहारा लेती दिखने लगी. पार्टी ने चुनावों में न सिर्फ बड़ी संख्या में सवर्णों को टिकट दिया बल्कि बड़ी संख्या में उन्हें मंत्री भी बनाया. पार्टी ने दूसरे वर्गों को अपनी राजनीतिक मजबूरी के चलते खुद से जोड़ने को सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया.

उत्तर प्रदेश में बहुमत से दूर रहने की जिस समस्या के कारण बसपा ने दूसरे वर्गों को खुद से जोड़ने की शुरुआत की, ठीक उसी प्रकार की समस्या से पीड़ित रहने के कारण पंजाब में भी शिरोमनि अकाली दल (बादल) ने हिंदुओं और शहरी मतदाताओं की तरफ अपना हाथ बढ़ाया. भारत की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी (1920 में स्थापना) होने का गौरव होने के बावजूद  सिख पार्टी (विशेष रुप से जाट सिख) तथा किसानों की पार्टी के रूप में ही उसकी पहचान रही. यही कारण है कि आंदोलन से उपजी इस पार्टी के लिए अपने दम पर राज्य में सरकार बनाना हमेशा मुश्किल रहा है. इसी को देखते हुए उसने भाजपा से हाथ मिलाया. भाजपा को हिंदुओं और शहरी मतदाताओं का वोट मिल जाता और शिरोमनि अकाली दल के पास अपना एक वोट बैंक था ही. दोनों मिलकर सरकार बना लेते. लेकिन पिछले सालों में पार्टी की कमान धीरे-धीरे जूनियर बादल अर्थात सुखबीर बादल के हाथों में आ गई है. अब सुखबीर की तैयारी शिरोमणी अकाली दल को अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में लाने की थी. यही कारण है कि इस बार पार्टी ने 11 हिंदुओं को टिकट दिया. पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्रों, घोषणाओं तथा बयानों से बार-बार शहरी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की. शहरी मतदाताओं को ध्यान में रखकर उसने चुनाव में तमाम वादे किए. इस तरह हिंदू और शहरी मतदाताओं को पार्टी से जोड़ने के लिए पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग जारी है. वैसे इसके नतीजे भी दिखाई देने लगे हैं. जिन 11 हिंदुओं को पार्टी ने टिकट दिया था उसमें से 10 जीत कर आ गए हैं साथ में ही शहरी क्षेत्र में पार्टी को पूर्व के चुनावों की तुलना में बहुत अधिक समर्थन मिला है. इसी सोशल इंजीनियरिंग का कमाल है कि पार्टी पिछले चुनावों से सात सीटें अधिक जीतने में सफल रही है और अपने दम पर सरकार बनाने से केवल तीन सीट दूर है. यह संभव है कि अगले चुनाव में पार्टी इस कमी को भी पूरा कर ले और उसे बीजेपी की बैसाखी की जरूरत पड़े ही नहीं.

चुनावी वैतरणी अपने दम पर पार करने के लिए वोट बैंक में इजाफा करने की रणनीति पर काम करने के साथ ही हम देखते हैं कि यूपी में समाजवादी पार्टी हो, बिहार में जेडीयू या फिर पंजाब में शिरोमनि अकाली दल, इन दलों ने पिछले कुछ सालों में अपनी राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं.

शिरोमनि अकाली दल सिख आंदोलन की उपज है. इसके लिए सिख पंथ की रक्षा हमेशा से चुनावी मुद्दा रहा है. इतिहास में पार्टी ने इसी पहचान के आधार पर चुनाव लड़ा. लगभग एक धार्मिक दल के रूप में राजनीति करने वाले इस दल की राजनीति में पिछले कुछ सालों में बहुत तेजी से बदलाव आया. जानकार मानते हैं कि पहले यह पार्टी हर चुनाव में धार्मिक एवं भावनात्मक मुद्दों को उठाने के लिए जानी जाती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. पंजाब विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, ‘अकाली दल जो पिछले सालों में लगभग हर चुनाव में पंथिक मामलों को उठाता था, लोगों के बीच 1984 में सिखों के कत्लेआम का मुद्दा जोर-शोर से उठाकर कांग्रेस को घेरता था, उसने अब इन मुद्दों से काफी हद तक दूरी बना ली है.’ 2012 के विधानसभा चुनाव ने अकाली दल की राजनीति में आए क्रांतिकारी बदलाव से लोगों को परिचित कराया.

इस बार पार्टी ने किसी प्रकार की भावनात्मक या पंथ से जुड़ी राजनीति करने की कोशिश नहीं की, जबकि पहले चुनावों में भावनात्मक मुद्दों के आधार पर ही वह चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश करती थी. यहां तक कि कई बार 84 के दंगों में मारे गए लोगों के परिवार वालों को सामने लाकर यह कहते हुए कि इन लोगों को आज तक न्याय नहीं मिला, पार्टी पुराने जख्मों के सहारे राजनीतिक युद्ध में अपना कद बढ़ाने की कोशिश करती थी. अभी तक सिखों में भी जाट सिखों की ही पार्टी समझे जाने वाले शिरोमनि अकाली दल ने राज्य में अन्य तबकों से खुद से जुड़ने की शुरुआत की है.
वोट बेस में इजाफा करने और अन्य वर्गों को पार्टी से जोड़ने के साथ ही पार्टी ने बदलती राजनीति के तौर-तरीकों से भी खुद को अपडेट कर लिया. पार्टी ने विकास और सुशासन को अपना नारा बनाया. इस बार का चुनाव पार्टी ने विकास और सुशासन के इसी मुद्दे पर लड़ा. यहां तक अपनी सरकार के दौरान भी पार्टी ने ऐसी तमाम योजनाएं शुरु कीं जिन्होंने राज्य के हाशिये पर खड़े अंतिम व्यक्ति को न सिर्फ प्रभावित किया बल्कि उसे पार्टी से जोड़ा भी. आटा-दाल जैसी स्कीम ने राज्य के लगभग 17 लाख गरीबों को दो जून की रोटी दिलाई.

इसी तरह साइकिल बांटने से लेकर शगुन (शादी के लिए दिए जाने वाले पैसे) तथा बाकी तमाम कल्याणकारी स्कीमों ने पार्टी को दुबारा सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई है. चुनाव अभियान में विकास और सुशासन के अलावा पार्टी ने चुनाव घोषणापत्र में भी तमाम तरह की कल्याणकारी योजनाएं शुरू करने या फिर उनका विस्तार करने की बात की. पूरे चुनाव में पार्टी ने पहचान की राजनीति को हाशिये पर रखते हुए विकास की राजनीति को अपना नया नारा बनाया. जानकारों का कहना है कि इस बार शिरोमनि अकाली दल का चुनावी घोषणापत्र जितना लोकलुभावन था उतना शायद ही कभी रहा हो. लैपटॉप बांटने, किसानों को फ्री में बिजली देने, पेंशन देने, बेरोजगारी भत्ता देने, विभिन्न चीजों पर मिलने वाली रियायतों को और बढ़ाने के अलावा पार्टी ने इस बार राज्य का सर्वांगीण विकास करने जैसे वादों को तरजीह दी.

ऐसा ही उदाहरण हमें यूपी के चुनाव में देखने को मिलता है. समाजवादी पार्टी जो पिछले चुनाव में कंप्यूटर और अंग्रेजी का विरोध कर रही थी वह इस चुनाव में जीतने पर 12वीं पास छात्रों को लैपटॉप बांटने का वादा करती नजर आई. यही नहीं जिस पार्टी की छवि पिछले कुछ समय में गुंडों और बदमाशों की शरणस्थली के रूप में बन गई थी वही पार्टी प्रदेश को साफ-सुथरा, भयमुक्त और गुंडागर्दी मुक्त शासन देने का वादा कर रही थी. पूरे चुनाव अभियान में सपा विकास और सुशासन की बात करती नजर आई.

इस चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में सपा की तरफ से एक और बड़ा बदलाव टिकट बंटवारे में देखने को मिला. अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने कई ऐसे लोगों को टिकट दिया जो पारंपरिक रूप से न तो किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से थे और न उनका धनबल या बाहुबल से कोई लेना-देना था.

कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने अपने संगठन, कार्यक्रम और विचारधारा के स्तर पर कई क्रांतिकारी बदलाव किए हैं. वे न सिर्फ अपनी सोच तथा राजनीतिक कार्यक्रमों को समावेशी बनाने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि उसमें कामयाब भी हो रहे हैं. संदेश साफ है कि जब तक आप खुद को समाज के हर तबके से नहीं जोड़ते और बदलते समय के साथ जनता के बदलते मानस के हिसाब से तैयारी नहीं करते, तब तक आपकी नैय्या पार लगना मुश्किल है.

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