सोच के सांचे बदलने का सबक

उत्तर प्रदेश में बहुमत से दूर रहने की जिस समस्या के कारण बसपा ने दूसरे वर्गों को खुद से जोड़ने की शुरुआत की, ठीक उसी प्रकार की समस्या से पीड़ित रहने के कारण पंजाब में भी शिरोमनि अकाली दल (बादल) ने हिंदुओं और शहरी मतदाताओं की तरफ अपना हाथ बढ़ाया. भारत की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी (1920 में स्थापना) होने का गौरव होने के बावजूद  सिख पार्टी (विशेष रुप से जाट सिख) तथा किसानों की पार्टी के रूप में ही उसकी पहचान रही. यही कारण है कि आंदोलन से उपजी इस पार्टी के लिए अपने दम पर राज्य में सरकार बनाना हमेशा मुश्किल रहा है. इसी को देखते हुए उसने भाजपा से हाथ मिलाया. भाजपा को हिंदुओं और शहरी मतदाताओं का वोट मिल जाता और शिरोमनि अकाली दल के पास अपना एक वोट बैंक था ही. दोनों मिलकर सरकार बना लेते. लेकिन पिछले सालों में पार्टी की कमान धीरे-धीरे जूनियर बादल अर्थात सुखबीर बादल के हाथों में आ गई है. अब सुखबीर की तैयारी शिरोमणी अकाली दल को अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में लाने की थी. यही कारण है कि इस बार पार्टी ने 11 हिंदुओं को टिकट दिया. पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्रों, घोषणाओं तथा बयानों से बार-बार शहरी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की. शहरी मतदाताओं को ध्यान में रखकर उसने चुनाव में तमाम वादे किए. इस तरह हिंदू और शहरी मतदाताओं को पार्टी से जोड़ने के लिए पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग जारी है. वैसे इसके नतीजे भी दिखाई देने लगे हैं. जिन 11 हिंदुओं को पार्टी ने टिकट दिया था उसमें से 10 जीत कर आ गए हैं साथ में ही शहरी क्षेत्र में पार्टी को पूर्व के चुनावों की तुलना में बहुत अधिक समर्थन मिला है. इसी सोशल इंजीनियरिंग का कमाल है कि पार्टी पिछले चुनावों से सात सीटें अधिक जीतने में सफल रही है और अपने दम पर सरकार बनाने से केवल तीन सीट दूर है. यह संभव है कि अगले चुनाव में पार्टी इस कमी को भी पूरा कर ले और उसे बीजेपी की बैसाखी की जरूरत पड़े ही नहीं.

चुनावी वैतरणी अपने दम पर पार करने के लिए वोट बैंक में इजाफा करने की रणनीति पर काम करने के साथ ही हम देखते हैं कि यूपी में समाजवादी पार्टी हो, बिहार में जेडीयू या फिर पंजाब में शिरोमनि अकाली दल, इन दलों ने पिछले कुछ सालों में अपनी राजनीति में क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं.

शिरोमनि अकाली दल सिख आंदोलन की उपज है. इसके लिए सिख पंथ की रक्षा हमेशा से चुनावी मुद्दा रहा है. इतिहास में पार्टी ने इसी पहचान के आधार पर चुनाव लड़ा. लगभग एक धार्मिक दल के रूप में राजनीति करने वाले इस दल की राजनीति में पिछले कुछ सालों में बहुत तेजी से बदलाव आया. जानकार मानते हैं कि पहले यह पार्टी हर चुनाव में धार्मिक एवं भावनात्मक मुद्दों को उठाने के लिए जानी जाती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. पंजाब विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, ‘अकाली दल जो पिछले सालों में लगभग हर चुनाव में पंथिक मामलों को उठाता था, लोगों के बीच 1984 में सिखों के कत्लेआम का मुद्दा जोर-शोर से उठाकर कांग्रेस को घेरता था, उसने अब इन मुद्दों से काफी हद तक दूरी बना ली है.’ 2012 के विधानसभा चुनाव ने अकाली दल की राजनीति में आए क्रांतिकारी बदलाव से लोगों को परिचित कराया.

इस बार पार्टी ने किसी प्रकार की भावनात्मक या पंथ से जुड़ी राजनीति करने की कोशिश नहीं की, जबकि पहले चुनावों में भावनात्मक मुद्दों के आधार पर ही वह चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश करती थी. यहां तक कि कई बार 84 के दंगों में मारे गए लोगों के परिवार वालों को सामने लाकर यह कहते हुए कि इन लोगों को आज तक न्याय नहीं मिला, पार्टी पुराने जख्मों के सहारे राजनीतिक युद्ध में अपना कद बढ़ाने की कोशिश करती थी. अभी तक सिखों में भी जाट सिखों की ही पार्टी समझे जाने वाले शिरोमनि अकाली दल ने राज्य में अन्य तबकों से खुद से जुड़ने की शुरुआत की है.
वोट बेस में इजाफा करने और अन्य वर्गों को पार्टी से जोड़ने के साथ ही पार्टी ने बदलती राजनीति के तौर-तरीकों से भी खुद को अपडेट कर लिया. पार्टी ने विकास और सुशासन को अपना नारा बनाया. इस बार का चुनाव पार्टी ने विकास और सुशासन के इसी मुद्दे पर लड़ा. यहां तक अपनी सरकार के दौरान भी पार्टी ने ऐसी तमाम योजनाएं शुरु कीं जिन्होंने राज्य के हाशिये पर खड़े अंतिम व्यक्ति को न सिर्फ प्रभावित किया बल्कि उसे पार्टी से जोड़ा भी. आटा-दाल जैसी स्कीम ने राज्य के लगभग 17 लाख गरीबों को दो जून की रोटी दिलाई.

इसी तरह साइकिल बांटने से लेकर शगुन (शादी के लिए दिए जाने वाले पैसे) तथा बाकी तमाम कल्याणकारी स्कीमों ने पार्टी को दुबारा सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई है. चुनाव अभियान में विकास और सुशासन के अलावा पार्टी ने चुनाव घोषणापत्र में भी तमाम तरह की कल्याणकारी योजनाएं शुरू करने या फिर उनका विस्तार करने की बात की. पूरे चुनाव में पार्टी ने पहचान की राजनीति को हाशिये पर रखते हुए विकास की राजनीति को अपना नया नारा बनाया. जानकारों का कहना है कि इस बार शिरोमनि अकाली दल का चुनावी घोषणापत्र जितना लोकलुभावन था उतना शायद ही कभी रहा हो. लैपटॉप बांटने, किसानों को फ्री में बिजली देने, पेंशन देने, बेरोजगारी भत्ता देने, विभिन्न चीजों पर मिलने वाली रियायतों को और बढ़ाने के अलावा पार्टी ने इस बार राज्य का सर्वांगीण विकास करने जैसे वादों को तरजीह दी.

ऐसा ही उदाहरण हमें यूपी के चुनाव में देखने को मिलता है. समाजवादी पार्टी जो पिछले चुनाव में कंप्यूटर और अंग्रेजी का विरोध कर रही थी वह इस चुनाव में जीतने पर 12वीं पास छात्रों को लैपटॉप बांटने का वादा करती नजर आई. यही नहीं जिस पार्टी की छवि पिछले कुछ समय में गुंडों और बदमाशों की शरणस्थली के रूप में बन गई थी वही पार्टी प्रदेश को साफ-सुथरा, भयमुक्त और गुंडागर्दी मुक्त शासन देने का वादा कर रही थी. पूरे चुनाव अभियान में सपा विकास और सुशासन की बात करती नजर आई.

इस चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में सपा की तरफ से एक और बड़ा बदलाव टिकट बंटवारे में देखने को मिला. अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने कई ऐसे लोगों को टिकट दिया जो पारंपरिक रूप से न तो किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से थे और न उनका धनबल या बाहुबल से कोई लेना-देना था.

कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने अपने संगठन, कार्यक्रम और विचारधारा के स्तर पर कई क्रांतिकारी बदलाव किए हैं. वे न सिर्फ अपनी सोच तथा राजनीतिक कार्यक्रमों को समावेशी बनाने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि उसमें कामयाब भी हो रहे हैं. संदेश साफ है कि जब तक आप खुद को समाज के हर तबके से नहीं जोड़ते और बदलते समय के साथ जनता के बदलते मानस के हिसाब से तैयारी नहीं करते, तब तक आपकी नैय्या पार लगना मुश्किल है.

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