सुर अविनाशी: लता मंगेशकर

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lataनाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा
मेरी आवाज ही पहचान है—गर याद रहे
(फिल्म : किनारा, गीतकार : गुलजार)

असीम श्रद्धा और भावुकता के साथ ही लता मंगेशकर के बारे में कोई बात शुरू की जा सकती है. पिछली कई सदियों से संगीत की जो महान परंपरा हम मीराबाई, बैजू बावरा, स्वामी हरिदास और तानसेन के माध्यम से सुनते-गुनते आ रहे हैं, उसमें लता मंगेशकर का नाम बिना किसी हीला-हवाली के जोड़ा जा सकता है. कहा जा सकता है कि इस देश में चारों ओर रहने वाले सवा अरब लोग जिस समानता की डोर से कहीं न कहीं जुड़े दिखाई देते हैं वह लता मंगेशकर की आवाज के रेशमी धागे के कारण भी संभव हुआ है.

‘महल’ फिल्म के इतिहास बन चुके गीत ‘आएगा आने वाला’ से लता जी का हिंदी फिल्म संगीत में कुछ-कुछ वैसा ही प्रादुर्भाव हुआ जैसा इस फिल्म का सनसनीखेज कथानक था. इस गीत के मुखड़े की शुरुआती पंक्तियां हैं – ‘खामोश है जमाना चुपचाप हैं सितारे/आराम से है दुनिया बेकल हैं दिल के मारे/ऐसे में कोई आहट इस तरह आ रही है/जैसे कि चल रहा हो मन में कोई हमारे /या दिल धड़क रहा है इस आस के सहारे…’ आज जब उन्हें एक किंवदंती बने लगभग सत्तर साल बीत चुके हैं तो लगता है कि जैसे ये पंक्तियां फिल्म संगीत के आंगन में उनके लिए बिछाया गया लाल गलीचा हों. जैसे सबको उनके आने की आहट सुनाई दे रही थी और उनके आने से पहले सारा जमाना खामोश था.

लता जी मात्र छह साल की रही होंगी जब उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर ने उनकी संगीत शिक्षा का विधिवत आरंभ उन्हें पूरिया धनाश्री राग सिखाते हुए किया था. उन्होंने उस समय नन्ही लता से कहा था – ‘जिस तरह कविता में शब्दों का अर्थ होता है, वैसे ही गीत में सुरों का भी अर्थ होता है. गाते समय दोनों अर्थ उभरने चाहिए.’ इसे आज तक अपने सुर संसार में जस का तस निभाते हुए लता मंगेशकर पिता को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि दिए जा रही हैं. आज के दौर के युवाओं से लेकर तीन पीढ़ी ऊपर तक के बुजुर्गों में लता मंगेशकर की आवाज का साम्राज्य कुछ इस कदर पसरा हुआ है कि उसके प्रभाव का आकलन पूरी तरह कर पाना शायद किसी के लिए संभव नहीं है. कई बार ऐसा लगता है कि वे एक ऐसी जीवंत उपस्थिति हैं जिनके लिये कहा जा सकता है कि वे पुराणों व मिथकीय अवधारणाओं के किसी गंधर्व लोक से निकलकर आई हैं. एक ऐसी स्वप्निल और जादुई दुनिया से जिसमें सिर्फ देवदूतों और गंधर्वों को आने-जाने की आजादी है. लता मंगेशकर जैसी अदम्य उपस्थिति के लिए प्रख्यात गीतकार जावेद अख्तर का यह कथन बहुत दुरुस्त लगता है – ‘हमारे पास एक चांद है, एक सूरज है, तो एक लता मंगेशकर भी हैं.’

लता मंगेशकर ने अपनी आवाज की चिरदैवीय उपस्थिति से पिछले करीब छह दशकों को इतने खुशनुमा ढंग से रोशन किया है कि हम आज अंदाजा तक नहीं लगा सकते कि यदि उनकी 1947 में आमद न होती तो भारतीय फिल्म संगीत कैसा होता. संगीत जगत में लता मंगेशकर के आगमन का समय भारतीय राजनीतिक इतिहास के भी नवजागरण का काल था. स्वाधीनता के बाद जैसे-जैसे भारतीय जनमानस अपनी नयी सोच और उत्साह के साथ आगे बढ़ता जा रहा था, लता जी की मौजूदगी में हिंदी फिल्म संगीत भी आनंद और स्फूर्ति के साथ उसी रास्ते जा रहा था. यह अकारण नहीं है कि 1948 में गुलाम हैदर के संगीत से सजी मजबूर फिल्म का लता-मुकेश का गाया हुआ गीत ‘अब डरने की बात नहीं अंग्रेजी छोरा चला गया’ उस वक्त जैसे हर भारतीय की सबसे मनचाही अभिव्यक्ति बन गया था. उन्हीं मास्टर गुलाम हैदर ने भारत में अपने संगीत कॅरियर का अंतिम गाना (‘बेदर्द तेरे दर्द को सीने से लगा के’) 1948 में लता से पद्मिनी में गवाया. वे उसी दिन भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए. लता जी के संगीत जीवन के साथ इस तरह की न जाने कितनी ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में बदल चुकी तिथियां भी जुड़ी हुई हैं, जो आज भारतीय समाज में अपना कुछ दूसरा ही मुकाम रखती हैं.

उनके संगीत के दृश्यपटल पर आने वाले साल में ही केएल सहगल का इंतकाल हो चुका था और मलका-ए-तरन्नुम नूरजहां विभाजन के बाद पाकिस्तान जा चुकी थीं. यह एक प्रकार से फिल्म इतिहास का ऐसा नाजुक दौर था जिसमें इन दो मूर्धन्यों की भरपाई का अकेला जिम्मा जिन लोगों के कंधे पर आया उनमें से सबसे प्रमुख लता मंगेशकर हैं. जाहिर है, संक्रमण के इस काल में लता के भीतर छिपी हुई किसी बड़ी प्रतिभा की पहचान खेमचंद प्रकाश, हुस्नलाल-भगतराम, नौशाद और शंकर-जयकिशन जैसे दिग्गज संगीत निर्देशकों ने की और 1948-49 के दौरान ही उनकी चार बेहद महत्वपूर्ण फिल्में हिंदी सिनेमा के संगीत परिदृश्य को एकाएक बदलने के लिए आ गईं. ये फिल्में थीं महल, बड़ी बहन, अंदाज और बरसात.

इसके बाद पुरानी मान्यताओं, स्थापित शीर्षस्थ गायिकाओं एवं संगीतप्रधान फिल्मों के स्टीरियोटाइप में बड़ा परिवर्तन दिखने लगता है. लता खुशनुमा आजादी की तरह ही एक नये ढंग की ऊर्जा, आवाज के नये-नये प्रयोग एवं शास्त्रीय संगीत की सूक्ष्म पकड़ के साथ हिंदी फिल्म संगीत के लिए सबसे प्रभावी व असरकारी उपस्थिति बनने लगती हैं. ‘हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का’ (बरसात) जैसा गीत उसी बहाव, दिशा और नये क्षितिज की ओर फिल्म संगीत को उड़ा ले जाता है, जो अभी तक भारी-भरकम आवाजों के घूंघट में पल रहा था.

लता मंगेशकर आवाज की दुनिया की एक ऐसी घटना हैं जिसके घटने से इस धारणा को प्रतिष्ठा मिली कि गायन का क्षेत्र सिर्फ मठ-मंदिरों, हवेलियों और नाचघरों तक सीमित न रहकर एक चायवाले या बाल काटने वाले की दुकान में भी अपने सबसे उज्जवल अर्थों में अपने पंख फैला सकता है. उनके आने के बाद से ही लोगों की बेपनाह प्रतिक्रियाओं से तंग आकर रिकॉर्ड कंपनियों ने पहली बार फिल्मों के तवों पर पार्श्वगायकों एवं गायिकाओं के नाम देना शुरू किया. वे भारत में फिल्म संगीत का उसी तरह कायाकल्प करती दिखाई देती हैं, जिस तरह पारंपरिक नृत्य-कलाओं में क्रांतिकारी बदलाव ढूंढ़ने का काम रुक्मिणी देवी अरुंडेल, बालासरस्वती एवं इंद्राणी रहमान जैसी नर्तकियों ने अपने समय में किया. स्वाधीनता के बाद उनकी आवाज संघर्षशील तबके से आने वाली उस स्त्री की आवाज बन गई जिसे तब का समाज बिल्कुल नए संदर्भों में देख-परख रहा था.

लता जी से पहले स्थापित गायिकाओं कानन देवी, अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अंबालेवाली, सुरैया, राजकुमारी, शमशाद बेगम के विपरीत लता मंगेशकर का स्वर एक ऐसे उन्मुक्त माहौल को रचने में सफल होता दिखाई पड़ा जिसकी हिंदी फिल्म जगत को भी बरसों से दरकार थी. उनके गायन की विविधता में स्त्री किरदारों के बहुत-से ऐसे प्रसंगों को पहली बार अभिव्यक्ति मिली जो शायद सुरैया या जोहराबाई जैसी आवाज में संभव नहीं थी. उस दौर की अनगिनत फिल्मों में एकाएक उभर आए औरत के प्रगतिशील चेहरे के पीछे लता जी की आवाज ही प्रमुखता से सुनाई पड़ती है. 1952 में आई जिया सरहदी की ‘हम लोग’ का ‘चली जा चली जा छोड़ के दुनिया, आहों की दुनिया’ से लेकर ‘मिट्टी से खेलते हो बार-बार किसलिए’ (पतिता), ‘औरत ने जनम दिया मरदों को’ (साधना), ‘सुनो छोटी-सी गुडि़या की लंबी कहानी’ (सीमा), ‘वंदे मातरम्’ (आनंद मठ), ‘फैली हुई है सपनों की बांहें’ (हाउस नं- 44), ‘जागो मोहन प्यारे’ (जागते रहो), ‘सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला’ (दो आंखें बारह हाथ), ‘तेरे सब गम मिलें मुझको’ (हमदर्द), ‘हमारे बाद महफिल में अफसाने बयां होंगे’ (बागी) ऐसे ही कुछ गीत हैं.

यह स्थिति दिनोंदिन सुदृढ़ ही होती गई. साठ के दशक तक आते-आते तो इस बात की होड़-सी मच गई कि किस फिल्म का स्त्री किरदार दूसरी फिल्मों की तुलना में कितना मजबूत, केंद्रीय और भावप्रवण है. जिन फिल्मों में सीधे ही औरत की कोई ऐसी भूमिका नहीं थी, वहां ऐसी गुंजाइश गीतों के बहाने निकाली जाने लगी. ऐसे में लता मंगेशकर एक जरूरत या जरूरी तत्व की तरह भारतीय सिनेमा जगत पर छा गईं. शायद इसी वजह से साठ का दशक सिनेमा के अधिकांश अध्येताओं को लता जी का स्वर्णिम दौर लगता है. इस दौर की कुछ फिल्में इस संदर्भ में भी याद करने लायक हैं कि इनमें लता मंगेशकर की मौजूदगी अकेले ही इतिहास रचने में सक्षम नजर आती है. ऐसे में आसानी से हम गजरे, परख, अनुपमा, छाया, ममता, बंदिनी, दिल एक मंदिर, मधुमती, गाइड, माया, चित्रलेखा, डॉ. विद्या, अनुराधा, आरती, मान, अनारकली, यास्मीन, दुल्हन एक रात की, अदालत, गंगा-जमुना, सरस्वतीचंद्र, वो कौन थी, आजाद, संजोग, घूंघट, भीगी रात, बेनजीर, कठपुतली, पटरानी, काली टोपी लाल रुमाल एवं मदर इंडिया जैसी फिल्मों के नाम ले सकते हैं. इस दौर में बहुत सारे संगीतकारों के साथ बनने वाली उनकी कला की ज्यामिति ने जैसे कीर्तिमानों का एक अध्याय ही रच डाला. आज भी उनका नाम मदन मोहन के साथ अमर गजलों, नौशाद के साथ विशुद्ध लोक-संगीत, एसडी बर्मन के साथ राग आश्रित नृत्यपरक गीतों, सी रामचंद्र के साथ बेहतर आर्केस्ट्रेशन पर आधुनिक ढंग की मेलोडी, सलिल चौधरी के साथ बांग्ला एवं असमिया लोक संगीत और विदेशी सिंफनीज पर आधारित कुछ मौलिक प्रयोगों, रोशन के साथ शास्त्रीयता एवं रागदारी, खय्याम के साथ प्रयोगधर्मी धुनों तथा लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ सदाबहार लोकप्रिय एकल गीतों के लिए असाधारण ढंग से याद किया जाता है.

यह देखना भी दिलचस्प है कि पिछले साठ-सत्तर सालों में बनने वाली ढेरों ऐतिहासिक एवं पौराणिक फिल्मों में लता मंगेशकर एक स्थायी तत्व की तरह शामिल रही हैं. उनकी यह उपस्थिति, सामाजिक सरोकारों वाली फिल्मों से अलग, एक दूसरे ही किस्म का मायालोक रचने में सफल साबित हुई है. यह लीक बैजू बावरा, अनारकली, नागिन, रानी रूपमती जैसी फिल्मों से शुरू होकर, मुगले आजम, शबाब, सोहनी महिवाल, कवि कालिदास, झनक-झनक पायल बाजे, संगीत सम्राट तानसेन, ताजमहल से होती हुई बहुत बाद में आम्रपाली, नूरजहां, हरिश्चंद्र तारामती, सती-सावित्री, पाकीजा और अस्सी के दशक तक आते-आते रजिया सुल्तान एवं उत्सव तक फैली हुई है. इन फिल्मों के गीतों का उल्लेख होने भर से तमाम अमर धुनों और लता जी की आवाज का जादू मन-मस्तिष्क में घुलने लगता है. इस तरह की पीरियड फिल्मों के संदर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इनके गीतों को सुनते हुए यह ध्यान ही नहीं आता कि इनकी पृष्ठभूमि में कोई पौराणिक, मिथकीय या ऐतिहासिक कथा आकार ले रही है. वहां सिर्फ गीत की अपनी स्नेहिल मौजूदगी में वही जादू घटता है जो किसी दूसरे और निहायत अलग विषय-वस्तु के सिनेमा में भी महसूस किया जाता रहा है. मसलन, ‘आजा भंवर सूनी डगर’ (रानी रूपमती), ‘शाम भई घनश्याम न आए’ (कवि कालिदास), ‘खुदा निगहबान हो तुम्हारा’ (मुगले आजम), ‘जुर्मे उल्फत पे हमें लोग सजा’ (ताजमहल), ‘तड़प ये दिन रात की’ (आम्रपाली), ‘ऐ दिले नादां’ (रजिया सुल्तान), ‘नीलम के नभ छाई’ (उत्सव) जैसे गाने सिर्फ किरदारों की जद में कैद नहीं रहते. इस तरह की कोई स्थिति या संभावना तक पहुंचने की प्रतिष्ठा शायद किसी कलाकार के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है. यहां प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर की यह उक्ति ध्यान देने योग्य है, ‘लड़की एक रोज गाती है. गाती रहती है अनवरत. यह जगत व्यावहारिकता पर चलता है, तेरे गीतों से किसी का पेट नहीं भरता. फिर भी लोग सुनते जा रहे हैं पागलों की तरह.’

शायद इसीलिए एक से बढ़कर एक कालजयी फिल्में, बड़े नामचीन कलाकार, सिल्वर व गोल्डन जुबलियां, गीतकार, संगीत निर्देशक, सभी लता मंगेशकर के खाते में आने वाली उनकी अचूक प्रसिद्धि की चमक को फीका नहीं कर पाते. उन सफल फिल्मों में शायद लता ही एक ऐसी स्थायी सच्चाई हैं, जिसका कोई दूसरा पर्याय नहीं उभर पाता. अब इतिहास बन चुका राजकपूर के साथ उनका रॉयल्टी का झगड़ा, और बाद में इस सोच के चलते कि लता का रिप्लेसमेंट नहीं हो सकता, उन्हें अपने कैंप में वापस लाना या दादा एसडी बर्मन का यह सोचना कि लता अगर गाएगी, तो हम सेफ हैं; बेहद अनुशासनप्रिय संगीतज्ञ मास्टर गुलाम हैदर का यह कथन ‘अगर उसका दिमाग संतुलित रहा तो वह आसमान को छू जाएगी’ या फिर वायलिन वादक यहूदी मेन्यूहिन की स्वीकारोक्ति ‘शायद मेरी वायलिन आपकी गायिकी की तरह बज सके’ और उस्ताद बड़े गुलाम अली खां की जगप्रसिद्ध सूक्ति ‘कमबख्त, कभी बेसुरी नहीं होती’ आवाज की सत्ता का एहतराम करने जैसे हैं.

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