सवाल पूछने का नहीं जवाब देने का समय

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लोकसभा चुनाव 2019 के पहले जो परिदृश्य राष्ट्रीय स्तर पर उभर कर आ रहा है वह केंद्र में भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार के लिए खतरे की घंटी है। असम, उत्तरपूर्वी राज्यों, बंगाल, आंध्रप्रदेश में जबरदस्त नाराजग़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अभी हाल ही में असम और आंध्र प्रदेश में विरोध का सामना करना पड़ा।
‘गो-बैक’ के नारे लगे, काले झंडे दिखाए गए। पुतले फंूके गए।
उधर राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी। कंाग्रेस ने भाजपा के गढ़ में न सिर्फ चुनौती दी बल्कि सत्ता से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया। इन तीनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में कंाग्रेस ने यह जता दिया है कि चुनावी जंग में भाजपा को न सिर्फ पराजित किया जा सकता है बल्कि उसे सत्ता से हटाया भी जा
सकता है।
पूरे देश में किसान आंदोलन संगठित स्तर पर उभर कर सामने आया है। एनडीए सरकार में सहयोगी बने दल भी अब आंखे तरेर रहे हैं। इन में उत्तर प्रदेश में अपना दल और भासपा (ओमप्रकाश राजभर) जैसे सहयोगी हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में जद(यू), पंजाब में अकाली दल भी खासे खफा हैं। राजनीतिक समीकरण की दृष्टि से इसे हल्के से नहीं लिया जा सकता।
नागरिकता के कानून पर उत्तरपूर्व राज्यों की पार्टियां जो भाजपा के साथ थीं अब खासी सशंक्ति हैं। असम में असम गण परिषद, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी, आंध्र में टीडीपी, बिहार में उपेंद्र कुशवाहा भाजपा से अलग-थलग हैं। नोटबंदी और जीएसटी से देश में आर्थिक संकट गहराया है। बेरोजग़ारी बेइंतहा बढ़ी है। छोटी, मझोली फैक्टरियां बंद हो गई हैं। देश और प्रदेश में आर्थिक परेशानी गहराती जा रही है।
उत्तरप्रदेश में अद्र्ध कुंभ को पूर्ण कुंभ जैसा प्रसारित करने के बाद भी जनता अभी कमल की ओर जाती नहीं दिख रही है। खुद मुख्यमंत्री के अपने ही गढ़ में हुए उपचुनाव में हुई पराजय खासी महत्वपूर्ण है जिसकी जनता को याद है। उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी फूलपुर लोकसभा सीट नहीं बचा पाए। इसी तरह कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी भाजपा हारती ही रही। सपा बसपा गठबंधन से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा नेता व प्रधानमंत्री की बेचैनी अलबत्ता बढ़ी है।
कांग्रेस की ओर से पूर्वी उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी के सचिव पद पर आने और ज्योतिरादित्य सिंधिया के पश्चिमी उत्तरप्रदेश में सचिव बनने से भाजपा को तिकोने मुकाबले में सांस लेने का मौका ज़रूर मिला है। लेकिन राजनीति किस ओर करवट लेगी इसे दावे के साथ बता पाना कठिन है। लखनऊ में कांग्रेस के नए महारथी अपने रोड शो से जैसे उभरे हैं उससे यह संभावना है कि पूर्वांचल की 27 सीटों पर हवा का रूख बदल सकता है। तिकोने संघर्ष में भी सबसे अधिक खमियाजा भाजपा को ही उठाना पड़ेगा क्योंकि कांग्रेस, सपा और बसपा के पास खोने के लिए यहां कुछ नहीं है।
मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का व्यापक व्यापम घोटाला जिस तरह उनके 15 साल के राजकाज छिनने की वजह बना, वैसी ही शुरूआत उत्तरप्रदेश में अपने राज के दो ही साल में भाजपा ने कर दी है। 68,500 शिक्षकों की भर्ती के मामले में व्यापक धांधली पर पहले जो जांच बिठाई गई उसमें शिक्षा विभाग के अधिकारी भी रखे गए। हाईकोर्ट ने तब राज्य की योगी सरकार को फटकार लगातेे हुए टिप्पणी की थी कि जो विभाग घोटाले में शामिल है वह अपने ही ‘भ्रष्टाचार’ की जांच कैसे कर सकता है। कोर्ट ने शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच का निर्देश सीबीआई से कराने का आदेश दिया। हालांकि हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार की विशेष अपील को स्वीकार करके एकल पीठ के सीबीआई जांच के आदेश को रद्द कर दिया है।
राज्य सरकार को ज़रूर राहत मिली लेकिन शिक्षक भर्ती की परीक्षा में बैठे लाखों छात्रों के मन में आशंकाएं तो हंै ही, क्योंकि व्यापक पैमाने पर इस शिक्षक भर्ती में धांधली तो जबरदस्त हुई जिसके कारण बेरोजग़ार युवाओं का भविष्य चौपट हो गया।
अब बनारस की गंगा का प्रदूषण और स्मार्ट सिटी बनारस के पुननिर्माण के मुद्दे भी इसी साल 2019 के आम चुनाव में प्रमुख मुद्दे तो रहेंगे ही। आज बनारस और आसपास वह माहौल नहीं है जो 2014 में था। अब ‘हर हर और घर घर’ के मंत्र घोष की हवा निकल चुकी है। लोग सच्चाई से वाकिफ हैं।
बनारस के पक्का महाल में विश्वनाथ मंदिर कारिडोर और गंगा पाथवे के निर्माण के बहाने 200 से भी अधिक घर, मंदिर और गलियां ध्वस्त कर दी गईं। लोकसभा चुनाव के दौरान इस मुद्दे पर जनता ज़रूर अपनी बेचैनी जताएगी। इतिहास को तोडऩे-मरोडऩे, गलत जानकारी देने का मुद्दा भी चुनावी विमर्श का हिस्सा होगा। इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
आज जो माहौल बना है उसके लिए प्रधान सेवक ही जिम्मेदार है। कोई और नहीं। नोटबंदी और जीएसटी से किसको फायदा हुआ है? यह एक बड़ा सवाल है।
अब 2014 की तरह अब की मौका सवाल पूछने का नहीं, बल्कि खुद प्रधानसेवक के जवाब का इंतजार है बनारस की जनता को।
सुरेश प्रताप