समलैंगिकता की विषमता

इस मामले पर अंग्रेजी टीवी चैनलों पर हुई बहस को आपने सुना है? वहां सवाल कुछ ऐसे बनाए जा रहे थे जैसे समलैंगिकों और समलैंगिकता का समर्थन करना प्रगतिशीलता और विकसित होने का सबूत हो और जो लोग सहज प्राकृतिक स्त्री-पुरुष लैंगिकता का आग्रह कर रहे हैं वे पुराणपंथी और पारंपरिक किस्म के घटिया लोग हों. इससे बड़ी मानसिक विकृति कोई हो नहीं सकती. किसी भी सभ्यता-संस्कृति ने समलैंगिकता को प्राकृतिक मान कर उसका उत्सव नहीं मनाया. ईसाइयत ने भी पश्चिमी समाज में व्याप्त मान्यताओं को ही धार्मिक वर्जनाओं में शामिल किया. पश्चिम में भी ईसाइयत ने अगर लैंगिक और मैथुनिक संबंधों पर इतना कट्टर रवैया नहीं अपनाया होता तो वहां भी समलैंगिकों को ऐसा संघर्ष नहीं करना पड़ता. अब शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान में इतना काम हो जाने के बाद भी यही फर्क आया है कि समलैंगिकता को व्यक्त करने का एक तरीका है भले ही यह प्रजनन की सहज स्वाभाविक प्रक्रिया से जुड़ी न हो. कोई भी समाज इसे सहज-स्वस्थ प्रक्रिया मान कर मान्यता और सम्मान नहीं देता. यह बीमारी नहीं तो विचलन तो है ही.

लेकिन हमारा अंग्रेजी मीडिया इसे कुछ ऐसे पेश करता है जैसे समलैंगिकता को स्वीकार करना विकसित होना है. पश्चिम में यूरोप के विकसित समाज ने इसे मंजूर किया है तो यह निश्चित ही तरक्की की निशानी है. ये बेचारे नहीं समझते कि ईसाइयत ने जो कि यूरोपीय समाज का धर्म है वहां के लोगों के मन में समलैंगिकता पर कैसी वितृष्णा भर रखी है और वहां इस वर्जना से मुक्त हो पाना कैसी स्वतंत्रता है. भारत में पहले तो धर्म ही संगठित नहीं है फिर स्थानीयता और व्यक्तिमत्तता को बहुलता और विविधता ने खूब अच्छी तरह समो रखा है. महाभारत के महावीर अर्जुन को जब पांडवों के वनवास में छद्म रूप में रहना था तो वे बृहन्नला बन कर रहे. हिजड़ों को हमारे समाज में जो एक सांस्थानिकता दी गई है वह इसीलिए कि उन्हें भी समाज में उपयोगिता की एक भूमिका मिले. वे आम स्त्री-पुरुष से भिन्न और विचल तो माने गए लेकिन उन्हें भी जगह दी गई.

लेकिन हमारा अंग्रेजी मीडिया भारतीयता को भी पश्चिमी और अंग्रेजी रास्ते से ही स्वीकार करता है. हमारा यह दृष्टि दोष ही हमें यूरोप के सेकुलरज्म और भारत की सर्वधर्म समानता का अंतर नहीं समझने देता. ऊपर मैंने कहा है कि समलैंगिक समानता की भारतीय लड़ाई की प्रेरणा यूरोप में है तो इसीलिए कि अंग्रेजी मीडिया में भारतीय समलैंगिकता-नपुंसकलिंगता की समझ नहीं है. इसीलिए दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ऐसे वाक्य लिखे गए कि भारत का भूमंडलीकरण हो गया और हम उन विकसित देशों की सूची में आ गए जो समलैंगिकता को अपराध नहीं मानते.

समलैंगिकता के रुझान पर किसी से भेद करना तो अन्याय है ही. लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं कि ब्रिटेन के विक्टोरियन युग की ईसाई नैतिकता भारतीय समाज की नैतिकता नहीं है. यह कहने का मतलब यह भी नहीं कि भारतीय समाज तो शुरू से ही बहुत उदार है और समलैंगिकता को स्वीकार करता है. भारतीय समाज में भी इसका सहज निषेध है. इसलिए वह ‘गे लोगों’ के प्रदर्शन को सहज आक्रोश की अभिव्यक्ति नहीं मानता. अंग्रेजी मीडिया ने भारत के मध्य और उच्च मध्यवर्ग के कुछ लोगों की लड़ाई को भारत में न्याय की लड़ाई बना कर पेश करने की कोशिश की है.

यह एक अल्पसंख्यक – बहुत ही अल्पसंख्यक – वर्ग की लड़ाई को एक अल्पसंख्यक मीडिया का प्रोजेक्शन है. हमारा अंग्रेजी मीडिया भारत के अल्पसंख्यक अंग्रेजी समुदाय की राय बताने वाला मीडिया है.

और भारत के लोगों की न्याय की लड़ाई कहीं बड़ी और व्यापक है. समझे कि नहीं?

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