समय से पहले ही 2018 में होंगे आम चुनाव? | Tehelka Hindi

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समय से पहले ही 2018 में होंगे आम चुनाव?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह इस हुनर में माहिर हैं कि हमेशा वे विपक्ष को नींद से जगाते रहे हैं। ऐसी संभावना है कि लोकसभा चुनाव जो 2019 मेेेें होने हैं उन्हें 2018 समाप्त होने के पहले ही कराने का संदेश ये दोनों महारथी दे दें। इसी की गहरी छानबीन कर रहे हंै चरणजीत आहुजा और रिद्धिमा मल्होत्रा।

तहलका ब्यूरो 2017-10-31 , Issue 20 Volume 9

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह इस हुनर में माहिर हैं कि हमेशा वे विपक्ष को नींद से जगाते रहे हैं। ऐसी संभावना है कि लोकसभा चुनाव जो 2019 मेेेें होने हैं उन्हें 2018 समाप्त होने के पहले ही कराने का संदेश ये दोनों महारथी दे दें। इसी की गहरी छानबीन कर रहे हंै चरणजीत आहुजा और रिद्धिमा मल्होत्रा

 

सत्ता के गलियारों में यह फुसफुसाहट अब तेज हो गई है कि भाजपा लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करा ले। पार्टी को फिर विधानसभा चुनावों में और ज़्यादा कामयाबी मिलेगी। पार्टी के नेताओं की राय है कि यदि विधानसभा और आम सभा के चुनाव एक साथ होते हैं तो राज्य के मुद्दों पर राष्ट्रीय मुद्दों का दबाव पड़ेगा और पार्टी चुनावों में अच्छे नतीजे ला सकेगी। लोगों पर यह नज़रिया प्रभावी पड़ रहा है कि इससे एंटी-इन्कंबैंसी पर भी असर पड़ेगा जो कई राज्यों में दिख भी रहा है। भाजपा के लिए यह सबसे अच्छी बात है कि विपक्ष के पास कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है जिसके चलते यह भाजपा पर हावी हो सके। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभाओं में चुनाव नवंबर-दिसंबर 2018 में होने भी हैं और ये राज्य आम चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव कराने की सिफारिश कर सकते हैं। यदि आम चुनाव समय से पूर्व यानी 2018 में करने पर सहमति बन जाती है।

मुख्यमंत्री मिले मोदी और शाह से

भाजपा सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार भाजपा शासित राज्यों के तेरह मुख्यमंत्री और छह उप-मुख्यमंत्रियों ने अभी हाल में मोदी और अमित शाह से मुलाकात की थी। इस बैठक में यह बात ज़रूर निर्विवाद तौर पर साफ हुई कि मोदी के मुकाबले में पार्टी में कोई नेता नहीं है और उनकी लोकप्रियता बदस्तूर कायम है। दूसरा नज़रिया जो इस बैठक में साफ हुआ कि पार्टी को निर्धारित तारीख तक यानी 2019 तक दस-बारह महीनों तक बने रहने का मोह त्यागना चाहिए और पांच साल के नए दौर को हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। इसी संदर्भ में यह भी देखा जा रहा है कि अमित शाह पार्टी को ज़मीनी स्तर पर जोडऩे में जुटे दिखाई दे रहे हैं। इससे भी यह साफ होता है कि आम चुनाव जल्दी ही होंगे।

आयकर शून्य

राजनीतिक टिप्पणीकार यह मानते है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा के जीतने की वजह विमुद्रीकरण है। इस नीति को पार्टी ने बड़ी खूबी से पूरे राज्य में फैलाया जिसके चलते राज्य में पार्टी को जीत हासिल हुई। पार्टी को अस्सी में से 73 सीटें मिली। इस बार पार्टी को उम्मीद है कि विपक्ष को और ज़्यादा झटका लगेगा। सूत्रों का मानना है कि भाजपा इस प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है कि आयकर खत्म कर दिया जाए। उसकी बजाए बैंकिंग ट्रांजैक्शन टैक्स (बीटीटी) लगाया जाए।

भले ही लोगों को यह आश्चर्यजनक लगे लेकिन यह सच है कि ऐसे कई देश इस दुनिया में हैं जहां आयकर नहीं लगता। इन देशों में हैं युनाइटेड अरब अमीरात, कतर, ओमान, कुवैत, के मैन द्वीप समूह, बाहरेन, बरमुडा, बहामा, ब्रुनेई दारस्सलम आदि। यही नहीं, इन देशों की संख्या 114 की है। इनमें से कई देशों में सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था भी है। इन देशों में कई ने तो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके सरकारी खर्च अदा करने की व्यवस्था की है।

आयकर का शून्य होना भले ही चमत्कृत करे लेकिन इससे भाजपा को चुनाव में गजब की कामयाबी मिल सकती है। यह वैसी ही कामयाबी है जो उत्तरप्रदेश में पार्टी को विमुद्रीकरण के चलते हासिल हुई। इसकी बजाए सरकार खपत कर या खर्चकर लगा सकती है। यह भी आयकर जैसा ही होगा। अंतर सिर्फ यही होगा कि टैक्स तो खर्च पर लगता है आमदनी पर नहीं। इस पर नज़रिया यह है कि इससे खपत बढ़ती है।

हमारे देश में आयकर वह टैक्स है जो खर्च पर लगता है आमदनी पर नहीं। इसका नजरिया है कि इससे खपत को बढ़ावा मिलता है। फिर यह मध्यम वर्ग के वेतन पर लगता है। गरीब लोग तो आय कर देते ही नहीं। वित्तमंत्री अरूण जेटली ने अपने पिछले बजट भाषण में कहा था कि महज 42,800 लोगों ने ही अपनी सालाना आमदनी यानी रुपए एक करोड़ मात्र से ज़्यादा मानी। यह बात इसलिए अचंभे में डालती है कि देश की कुल आबादी तो 120 करोड़ लोगों की है लेकिन आयकर देने वालों की संख्या बहुत कम है। इसी कारण देश की अफसरशाही और पार्टी के नेताओं को यह एक मजबूत मामला बनता नज़र आ रहा है जिससे आयकर से निजात देशवासियों को दिलाई जा सकती है। आखिर कुछ ही लोगों को आयकर देने के लिए क्यों दबाव डाला जाए? भाजपा के नीति-निर्माताओं का भी यही मानना है और पार्टी इस प्रस्ताव पर गंभीरता से सोच रही है।

यूबीआई से आएगा बदलाव

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 9 Issue 20, Dated 31 October 2017)

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