उत्तराखंड त्रासदी: सबब तो है सबक नहीं

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फोटोः विजय पांडे
फोटोः विजय पांडे

केदारघाटी समेत उत्तराखंड के तमाम पर्वतीय इलाकों में बीते साल जो प्राकृतिक आपदा आई थी उसके असर की भयावहता के लिए आपदा प्रबंधन तंत्र को भी काफी हद तक जिम्मेदार माना गया था. इसने संकट को भांपने में शुरुआती चूक तो की ही, बचाव और राहत के मोर्चे पर भी यह बुरी तरह पस्त पड़ गया था. इस भयानक आपदा को हुए अब साल भर होने को है. केदारनाथ सहित उत्तराखंड के चारों धामों की यात्रा शुरू होने वाली है. इसलिए सरकार और खास तौर पर उसके आपदा प्रबंधन तंत्र की तैयारियों की तरफ निगाहें टिकना स्वाभाविक है. उम्मीद की जा रही है कि इतनी बड़ी आपदा से सबक सीखकर प्रदेश सरकार का आपदा प्रबंधन विभाग अब पहले से बेहतर तरीके से तैयार होगा.

लेकिन सरकार ने जो कदम उठाए हैं उन्हें देखते हुए यह उम्मीद धुंधली पड़ने लगती है. बेशक अब तक सरकार ने आपदा से निपटने को लेकर फौरी तौर पर बहुत सारी अस्थाई व्यवस्थाएं बना ली हैं, लेकिन जिन स्थाई और दूरगामी उपायों की सबसे अधिक जरूरत पिछली आपदा से भी पहले से बताई जा रही थी, उनको लेकर न तो अभी कोई शुरुआत ही हो सकी है और न ही निकट भविष्य में ऐसी कोई संभावना नजर आती है. जानकारों का मानना है कि पिछली आपदा से सबक लेने की बात कहते हुए अब तक जितने भी नए कदम उठाए गए हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे हैं जिनसे यात्रा की कामचलाऊ व्यवस्था तो हो सकती है, लेकिन दूरगामी नजरिए से उनकी सफलता को लेकर ठोस दावे नहीं किए जा सकते.

इस निष्कर्ष के विस्तार में जाने से पहले यह जानना जरूरी है कि आपदा प्रबंधन की संभावित चुनौतियों से निपटने को लेकर राज्य सरकार ने अब तक क्या-क्या कदम उठाए हैं.

पिछले साल केदारनाथ समेत सभी चार धामों में आपदा से प्रभावित लोगों की सटीक संख्या का अनुमान नहीं लग पाया था. इसकी एक मात्र वजह यात्रियों का पंजीकरण नहीं होना था. लेकिन इस बार सरकार ने पंजीकरण व्यवस्था शुरू करके यह गलती सुधार ली है. आपात स्थितियों में पुलिस विभाग तथा सेना के साथ तालमेल स्थापित करने की दिशा में भी आपदा प्रबंधन विभाग ने चहलकदमी शुरू कर दी है. सरकार के मुताबिक अकेले चारधाम यात्रा मार्गों पर ही 61 अस्थायी पुलिस चौकियों के साथ 83 आपदा प्रबंधन केंद्र भी खोले जा रहे हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में सिविल पुलिस और पीएसी की चार कंपनियों को भी यात्रा मार्गों पर तैनात किया जा रहा है. जल पुलिस और गोताखोरों के अलावा पर्यटन पुलिस की तैनाती भी विभिन्न स्थानों पर की जा रही है. अलग-अलग विभागों में की गई ये तैनातियां पिछले साल के मुकाबले इस बार कहीं अधिक बताई जा रही हैं. अपर पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था रामसिंह मीणा के मुताबिक आपदा से निपटने के लिए पुलिस की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हुए इस बार गौरीकुंड से केदारनाथ तक छह जगहों पर अस्थाई चौकियां भी बनाई गई हैं. इनमें से एक तो पिछले साल आए जलजले के स्रोत यानी चौराबीड़ी तालाब के पास ही बनाई गई है जो किसी भी तरह के संभावित खतरे की जानकारी निचले इलाकों तक पहुंचाने का काम करेगी. इसके साथ ही यात्रा मार्गों पर किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार ने इस बार राज्य आपदा बल का गठन भी किया है. इस दल की प्रमुख भूमिका भी आपदा प्रबंधन के इर्दगिर्द ही बुनी गई है. एनडीआरएफ की तर्ज पर प्रदेश में एसडीआरएफ (स्टेट डिजास्टर रिलीफ फोर्स ) का गठन भी किया गया है. इस फोर्स के जवानों को यात्रा मार्गों पर यात्रियों की मदद के लिए लगाया गया है. इसके अलावा गौरीकुंड से केदारनाथ तक के पैदल रास्ते को ठीक करने के लिए पुलिस के साथ उत्तरकाशी स्थित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (एनआईएम) की एक संयुक्त टास्क फोर्स गठित की गई है. हवाई सेवाओं को विस्तार देने के क्रम में भी इस बार गौरीकुंड से केदारनाथ तक पांच जगहों पर हेलीपैड बनाए जाने की बात भी कही गई. इन हेलीपैडों के निर्माण का काम भी लगातार जारी है. सरकारी दावों के मुताबिक केदारनाथ धाम में 500 लोगों के रहने के लिए टेंट की व्यवस्था भी की जा चुकी है. तीर्थ यात्रियों व पर्यटकों के लिए राज्य पर्यटन विकास परिषद के देहरादून स्थित मुख्यालय में कंट्रोल रूम स्थापित किए जाने के साथ ही केदारनाथ में संचार सेवा दुरुस्त रखने के लिए आवश्यक काम भी शुरू किए जा रहे हैं. सरकार ने आपात स्थितियों को देखते हुए गौरीकुंड, लिंचौली और केदारनाथ में डाक्टरों की तैनाती की बात भी कही है. इस सबके अलावा बहुत से दूसरे कामों को भी वह आपदा प्रबंधन की दिशा में अपनी उपलब्धि बता रही है. मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है कि राज्य सरकार केदारनाथ और बद्रीनाथ में पुननिर्माण कार्यों पर अब तक लगभग 500 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है. कुछ ही दिन पहले केदार घाटी का दौरा कर चुके मुख्य सचिव सुभाष कुमार भी यात्रा तैयारियों को लेकर संतोष जता चुके हैं.

लेकिन लाख दावों के बावजूद कई जगहों पर जमीनी वास्तविकता कुछ और ही तस्वीर दिखा रही है. जानकारों का मानना है कि इसके लिए आपदा प्रबंधन विभाग को फौरी इंतजामों की बजाय स्थाई उपायों पर जोर देना चाहिए था क्योंकि सरकार द्वारा किए गए अधिकतर काम मौसम के रहमोकरम पर ही रहने वाले हैं. जिन स्थाई उपायों की बात यहां की जा रही है उनमें यात्रा मार्गों पर चेतावनी प्रणाली विकसित करने, आपदा राहत संबंधित प्रशिक्षण के कार्यक्रम चलाने तथा पुनर्वास की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

पिछले साल केदारनाथ में आई आपदा के बाद बड़े पैमाने पर हुई जन हानि का एक अहम कारण आपदा प्रबंधन विभाग तथा मौसम विभाग के बीच तालमेल की कमी न होना बताया गया था. मौसम विभाग द्वारा दी गई भारी बारिश की चेतावनी तथा यात्रा को कुछ दिन के लिए रोक देने के सुझाव को तब सरकार ने कोई भाव नहीं दिया था. बाद में प्रदेश सरकार ने इस बात को स्वीकार भी किया. सामंजस्य की कमी की बात केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी साफ तौर पर मानी थी. बहरहाल इसके बाद भी मौसम विभाग ने प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर मौसम संबंधी जानकारियां देने के लिए रडार लगाने का सुझाव सरकार को सौंपा. विजय बहगुणा के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताते हुए इन रडारों को लगाने की बात भी कही. पिछले साल अगस्त में तहलका से बात करते हुए बहुगुणा का कहना था कि दो महीने के भीतर इस दिशा में काम शुरू कर दिया जाएगा. आठ महीने बीत चुके हैं. बहुगुणा की विदाई के बाद उत्तराखंड में एक और मुख्यमंत्री की ताजपोशी हो चुकी है. लेकिन रडारों का कोई अतापता नहीं है. इस बारे में पूछे जाने पर आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र के निदेषक पीयूष रौतेला का कहना था कि यह मामला मौसम विभाग और केंद्र के बीच का है लिहाजा वे इस पर कुछ भी नहीं कह सकते. हालांकि उन्होंने माना कि ये रडार अभी तक नहीं लगाए गए हैं. प्रदेश के मौसम विभाग के निदेशक आनंद शर्मा का इस बारे में कहना था कि उनके विभाग द्वारा बहुत पहले ही यह प्रस्ताव भेजा जा चुका था और इसके आगे वे कुछ नहीं कर सकते.

दावे और हकीकत


दावा– चारधाम यात्रा क्षेत्रों के साथ ही आपदा संभावित इलाकों में चेतावनी प्रणाली को  तेज बनाने के लिए रडार लगाए जाएंगे.

हकीकत– इस तरह के रडारों की अभी तक प्रतीक्षा है

दावा– सरकार  मशीनरी का पूरा जोर चारधाम यात्रा मार्गों की मरम्मत पर. 30 अप्रैल तक सारी व्यवस्थाएं दुरुस्त होने का दावा.

हकीकत– रुद्रप्रयाग से सोनप्रयाग तक केदारनाथ राजमार्ग कई स्थानों पर जोखिम भरा. मलबा साफ करने और डामरीकरण का काम जारी. ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग में कई जगहों पर भूस्खलन और हिमखंड टूटने के चलते यातायात लगातार प्रभावित.

दावा– सोनप्रयाग में 2000 वाहनों की पार्किंग, यात्रा पड़ावों पर श्रद्धालुओं के लिए भोजन -आवास, सुरक्षा और किसी भी स्थिति से निबटने के उपाय.

हकीकत– सोनप्रयाग में नदी और सड़क के बीच बेहद कम फासला. बारिश बढ़ने की स्थिति में सड़क टूटने और मलबा बढ़ने से वाहनों के फंसने की आशंका

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