सनेह को मारग

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नारी तुम केवल श्रद्धा... जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ पर आधारित डॉ उत्तमा दीक्षित की बनाई चित्रावलियों में शामिल एक चित्र.
नारी तुम केवल श्रद्धा… जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ पर आधारित डॉ उत्तमा दीक्षित की बनाई चित्रावलियों में शामिल एक चित्र.

हिंदी की दुनिया में प्रेम की कविता शताब्दियों के लंबे काल-प्रवाह में बहुत असरदार तरीके से मिलती है. हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध काल-विभाजन में तो प्रेम और रति के साहित्य को अलग से ही एक काल में मान्यता दी गई है, जिसे ‘रीतिकाल’ या ‘श्रृंगारकाल’ के नाम से जाना जाता है. अनगिनत कवियों एवं सूफी भावधारा की कविता कहने वाले लोगों ने प्रेमाख्यान को अपनी रचनाधर्मिता में अत्यंत वरीयता दी है. ऐसे में हम आसानी से घनानंद, आलम, बोधा, ठाकुर, देव, पद्माकर, मतिराम और बिहारी के नाम ले सकते हैं, जिन्होंने स्नेह और राग की अवधारणा को अत्यंत प्रमुखता से और लगभग उन्मुक्त होती हुई भाषा में स्थान दिया. बोधा की यह उक्ति आज भी प्रेम के संदर्भ में बहुत मार्मिक और गालिब के इश्क के संदर्भ में लगभग मुहावरा बन गए शेरों की तरह लगती है. बोधा ने कहा था, ‘यह प्रेम को पन्थ कराल महा, तलवार की धार पे धावनो है.’ भक्तिकालीन समय में मलिक मोहम्मद जायसी ने अपने प्रेमाख्यान काव्य ‘पद्मावत’ में जनश्रुति, इतिहास और कल्पना के योग से प्रेम को वृहत्तर अर्थों में उकेरा है. इस महाकाव्य में हिरामन तोता (गुरु) रतनसेन (आत्मा) के मन में पद्मावती (परमात्मा) के लिए पूर्वराग जगाता है, जिसकी परिणति आत्मा और परमात्मा के तादात्म्य से अपना उत्कर्ष पाती है. बहुत बाद में आधुनिक काल तक आते हुए और हिंदी के पुनर्जागरण के दौर में भी भारतेंदु हरिश्चंद्र और पंडित बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ जैसे अमर चितेरों ने अपने गीतों एवं कजरियों के माध्यम से श्रृंगार का एक बिल्कुल अभिनव अर्थ ही खड़ी बोली की भाषा परंपरा में संभव किया.

यह देखना प्रासंगिक है कि हिंदी परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक काम प्रेम और रति को लेकर जयशंकर प्रसाद ने सबसे पहले अपने महाकाव्य ‘कामायनी’ के माध्यम से प्रस्तुत किया. ‘कामायनी’ चालीस के दशक के मध्य में प्रकाशित होने वाला ऐसा अमर-ग्रंथ बन सका, जिसके द्वारा स्त्री और पुरुष के रिश्ते में पहली बार उद्दाम लालसा और रति से उत्पन्न आनंद का एक वैश्विक-दर्शन रचा गया. यह अकारण नहीं है कि स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंधों की नींव पर खड़ी यह अमर रचना एक हद तक सृष्टि की उत्पत्ति और उसके आनंदवाद पर भी प्रतीकात्मक अर्थों में गहराई से विमर्श रचती है. ठीक इसी तरह का वैभव इसके बाद रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक ‘उर्वशी’ में भी संभव होता दिखाई पड़ता है. ‘उर्वशी’ और ‘पुरुरवा’ के पौराणिक कथानक को आधार बनाकर लिखी गई यह लंबी काव्य-रचना अपने समय में जितनी मशहूर हुई, उतनी ही अधिक विवादित भी. कईयों ने इसमें देह और प्रेम के निरूपण में अश्लीलता की हदों को पार जाता हुआ मांसल किस्म का आस्वाद पाया, तो कई इस तर्क के समर्थन में खड़े हुए कि दिनकर ने अपने समय से आगे की ऐसी क्लासिक की रचना कर दी है, जिसका मूल्यांकन मात्र देह और गेह के संदर्भ में करना जरूरी नहीं. कविता से इतर, उपन्यासों की गंभीर दुनिया में ‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ के मिलन-बिंदु पर खड़ी हुई रचना ‘चित्रलेखा’ बनती है. यह उपन्यास आज भी भगवतीचरण वर्मा के सदाबहार अप्रतिम उपन्यासों में गिना जाता है. ‘चित्रलेखा’ के माध्यम से दूसरी बार साहित्य की दुनिया में कामाध्यात्म जैसी युक्ति सफल होती साबित हुई, जो कि इससे पहले व्यापक स्तर पर उर्वशी के बहाने हिंदी में संभव हो चुकी थी. चित्रलेखा, बीजगुप्त, कुमारजीव एवं श्वेतांक के बहाने यह उपन्यास पाप और पुण्य, रति और सौंदर्य, वैभव और साधना तथा दर्प और संयम के सर्वथा विरोधाभासी प्रत्ययों में उलझाता हुआ भोग और आनंद की पराकाष्ठा पर जाकर समाप्त होता है. यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि उर्वशी और चित्रलेखा ने पहली बार हिंदी साहित्य में प्रणय और उससे उपजे भोग, साथ ही भोग से निवृत्त आनंद और निर्बाध की दशा की ओर इशारा किया था. बाद में एक पूरी परंपरा ही चल पड़ी, जिसमें कई ऐसे भी बेतुके वाद और मत प्रभावी होने से कुछ दिनों के लिए साहित्य में सामने आये, जिनकी कोई ठोस भूमिका साहित्य में निभती हुई दिखाई नहीं पड़ी और इनका प्रभाव भी बहुत असरकारी नहीं बन पाया.

इसी समय छायावादोत्तर अनेक कवियों और गीतकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से कुछ प्रणय और विरह के गीत भी रचे, जिनका तत्कालीन प्रभाव उनके एक विशिष्ट श्रोता व पाठक-वर्ग पर जबर्दस्त था. इनमें हम प्रमुख रूप से हरिवंशराय बच्चन, नरेंद्र शर्मा, गोपाल सिंह नेपाली, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, शंभुनाथ सिंह, जानकी वल्लभ शास्त्री, नीरज एवं रमानाथ अवस्थी आदि गीतकारों को याद कर सकते हैं. इनमें से लगभग सभी कवियों ने अपने समय में श्रेष्ठ गीतकार के रूप में ख्याति अर्जित की है. गीत और गज़ल की दुनिया के बरक्स इस दौर के कुछ ऐसे महत्वपूर्ण उपन्यासों का जिक्र भी आवश्यक है, जिनमें प्रेम एवं देह के कथानक को बौद्दिक आशयों के तहत परखा गया है. ऐसे में हम आसानी से अज्ञेय की महत्वपूर्ण कृति ‘शेखरः एक जीवनी’, निर्मल वर्मा की ‘लाल टीन की छत’ एवं कृष्णा सोबती की ‘मित्रो मरजानी’ को रेखांकित कर सकते हैं. इसी के समानांतर थोड़ा भावुक धरातल पर लिखा गया धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ जैसा उपन्यास एक समय में युवा दिलों की धड़कन के रूप में लोकप्रिय होता उपन्यास बन पड़ा था. साठ-सत्तर के दौर में सुधा और चंदर की अति भावुक प्रणय-कथा जैसे हर एक कॉलेज जाने वाले लड़के-लड़कियों का सबसे जरूरी अध्ययन बन गई थी. इसी के साथ-साथ उस समय के उन काव्य नाटकों की ओर ध्यान देना भी जरूरी लगता है जिनमें प्रेम की अजस्र रसधारा बह रही थी. इसमें सबसे प्रमुख रूप से उभरी काव्य-नाटिका को काव्य-रूपक में धर्मवीर भारती ने बांधा था. इस काव्य-नाटिका की कुछ पंक्तियां आज तक लोकप्रिय हैं. जैसे, एक प्रसंग है जिसमें राधा कृष्ण से मान करती हुई यह प्रश्न करती हैं,‘इतिहास में अर्थ गूंथने वाले तुम्हारे हाथ/आज मेरी वेणी में फूल क्यों नहीं गूंथ पाते?’

हिंदी के दृश्य-पटल पर एक दौर वह भी था जब घरेलू पाठक लाइब्रेरी योजना के तहत महिला कथाकारों की ढेरों कहानियां, उपन्यसिकाएं एवं उपन्यास घर-घर महिलाओं के भीतर प्रचलित हो गए थे. यह साठ से अस्सी के बीच बीस वर्षों का वह समय था जब शिवानी जैसी कथाकार घर-घर आदर के साथ पढ़ी जाती थीं. उनके उपन्यासों का कथानक अक्सर प्रेम में चोट खाई हुई नायिका के साथ उसके प्रेमी या पति को लेकर संबंधों के इर्द-गिर्द बुना जाता था, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण विषय प्रेम ही होता था. इस प्रेम की अभिव्यक्ति में विरह और उसके संत्रास से उपजी हुई नायिका की संघर्ष भरी जिंदगी ही खूब चाव से पढ़ी जाती थी. एक पूरी लंबी फेहरिस्त है शिवानी के उपन्यासों की, जिसमें प्रेम अपने मोहक, उदात्त, रचनात्मक और यातना भरे सभी तरह के रूपों में प्रकट हुआ है. ‘अतिथि’, ‘चौदह फेरे’, ‘कृष्णवेणी’, ‘करिए छिमा’, ‘चिर स्वयंवरा’, ‘जालक’ जैसी पुस्तकें आज भी लोकप्रिय हैं और आसानी से किसी भी पुस्तक मेले में खरीददारों को आकर्षित करती रहती हैं.

हाल के वर्षों में प्रेम का स्वरूप बदला है. प्रेम भी कई बार अपने चेहरे बदलकर कविता, कहानी, उपन्यास आदि में व्यक्त होता रहा है. प्रेम कविताओं को व्यापक स्तर पर विमर्श और कविता के परिसर का जरूरी प्रत्यय बनाने वाले कवियों में अशोक वाजपेयी का नाम पूरे आदर के साथ लिया जा सकता है. उनके अब तक प्रकाशित चौदह कविता-संग्रहों में पहले संग्रह ‘शहर अब भी संभावना है’ से लेकर बिल्कुल नव्यतम संग्रह ‘दुःख चिट्ठीरसा है’ में प्रेम की दुनिया आकाश तक फैली हुई नजर आती है. इसी तरह उन्हीं के समकालीन कवि-कथाकार विनाेद कुमार शुक्ल ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास में निम्न मध्यमवर्गीय परिवेश में स्त्री-पुरुष के दांपत्य प्रेम का सर्वथा मनोहारी अंकन करते हैं. पवन करण जैसे युवा कवि का अत्यंत संवेदनशील कविता-संग्रह ‘स्त्री मेरे भीतर’ में स्त्री के कई आयाम बिल्कुल नये संदर्भों में व्यक्त हुए हैं, जहां प्रेम की परिभाषा भी बिल्कुल बेबाकी व साहस के साथ अभिव्यक्ति पा सकी है.

कहने का आशय यह है कि रीतिकाल से शुरू होने वाली प्रेम की अजस्र धारा इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभिक बारह वर्षों तक आकर बारहों तरीके से अपनी अभिव्यक्ति की राह तलाशती नजर आती है. इसमें कहीं कथ्य का बांकपन है, तो कहीं चित्रण की सलोनी आभा. कहीं प्रेम का उदात्त रूप मौजूद है, तो कहीं उसका अत्यंत दैहिक पक्ष भी उसे कई कोणों से घेरे रहता है. फिर भी घनानंद के शब्दों में यदि कहें तो, साहित्य में प्रेम ‘अति सूधो सनेह को मारग’, जैसा स्नेहिल प्रेम भी है और कामुकता के आवरण में लिपटा हुआ अत्यंत झीने किस्म का प्रणय भी.

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