
अपनी कहानी चिट्ठी से मुझे गहरा लगाव है और गहरी विरक्ति. पहले विरक्ति के बारे में. इस कहानी को लिखे हुए 25 बरस हो रहे हैं और इस बीच मैंने इसकी उपेक्षा करने, इसे थोड़ा पीछे धकेल देने के पर्याप्त जतन किए लेकिन उसके बावजूद यह चुनौती देती हुई मेरे सामने है. आप पूछेंगे कि मैं ऐसा आत्महंता क्यों. बताता हूं: यह कहानी मेरी पहचान के साथ नत्थी हो गई. लंबे समय तक ऐसा हुआ कि कोई मुझे पहचानता या मेरा किसी से परिचय कराता तो यह वाक्य प्रकट होता, ‘चिट्ठी कहानी के लेखक!’ शुरुआत में ये लफ्ज शहद की तरह मिठास से भरपूर थे लेकिन बाद में कर्णकटु क्योंकि मैं एक लेखक के रूप में इस कहानी के ठप्पे से मुक्ति चाहता था. क्योंकि एक लेखक हमेशा किसी ठप्पे, किसी लेबल, किसी इकती शिनाख्त को घोर नापसंद करता है. लेकिन साहित्य में ऐसा अनेक बार घटित हुआ है कि कोई रचना अपने निर्माता के नियंत्रण, मूल्यांकन और आशयों से निर्बंध होकर खुदमुख्तार हो जाती है. यकीन मानिए ‘चिट्ठी’ लिखने के बाद मैं पूरी तरह आश्वस्त न था. एक तरह का अनिश्चय, संशय इसको लेकर मन में था क्योंकि तब हिंदी कहानी में जो दौर था उसमें इसकी समाई न थी. कम से कम इतना तय था कि यह मेरा कोई महत्वाकांक्षी प्रयत्न नहीं था. मेरा और मेरे दोस्तों का जो जीवन, दुख और संघर्ष था उसे एक किस्सा बनाकर मैंने लिख डाला था : बस इतना ही. लेकिन सन 1989 को ‘हंस’ में इसके प्रकाशित होने के बाद जो प्रतिक्रियाएं हुईं उससे मैं रोमांचित, प्रसन्न और भौचक्का था. प्रशंसाओं की ऐसी झड़ी इसके पहले मेरे जीवन में कभी नहीं आई थी. कोई कहता उसने इस कहानी की बीस बार पढ़ा कोई कहता पचीस. राजेंद्र यादव जी ने हंस के कार्यालय में एक युवा कहानीकार से मुलाकात कराई. वह बेहद खुश हुआ. उसने कहा, ‘बाइस बार ‘चिट्ठी’ कहानी पढ़ चुका हूं.’ मैंने कहा, ‘काफी ज्यादा है.’ उसने कहा, ‘मेरा एक दोस्त संैतीस बार पढ़ चुका है.’ सच कहूं यह मेरी उम्मीदों से बहुत अधिक और अप्रत्याशित था जबकि वस्तुस्थिति यह थी कि छपने के पहले मैं इसे लेकर निराश हो गया था कि सोचने लगा था- इसे इस रूप में छपाना ठीक नहीं होगा…
वह सन 1988 का उत्तरार्द्ध था. हम जैसे तत्कालीन युवा लेखकों की माली हालत इतनी खस्ता रहती थी कि हम अपनी रचनाओं की छायाप्रतियां तथा टाइपिंग कराने में भी हिचकते, डरते, कन्नी काटते थे. अतः जो मिलता उसे हम अपनी रचनाएं सुनाने लगते थे. यहां तक कि इलाहाबाद के दिनों में हमने भैरव प्रसाद गुप्त, अमरकांत, मार्कण्डेय, रवींद्र कालिया, ममता कालिया जी जैसे वरिष्ठ लेखकों को भी अपनी साधारण रचनाओं को सुनाकर सताया था. बहरहाल सन 1988 के उत्तरार्द्ध में आज के महत्वपूर्ण कवि, सामाजिक चिंतक, इतिहासकार बद्री नारायण सुल्तानपुर के मेरे घर पर रुके और रात को भोजन के बाद फिर शुरू हुआ उसका कवितापाठ और मेरा कहानी पाठ. उस रात चिट्ठी कहानी का पाठ खत्म करते-करते मैं गहरी निराशा से भर उठा था. मुझे लग रहा था कि एक मजबूत कहानी में जो मुहावरा, जो गांभीर्य, जो गुस्सा और उद्देश्य होना चाहिए वह मेरी कहानी में अनुपस्थित है अतः इसे न छपाया जाए. बद्री ने कहा, ‘इसी तरह का अहसास मुझे अपनी कविताओं को लेकर होता है. लगता है हम अपने राजनीतिक विचारों को रचना में सही ढंग से रूपांतरित नहीं कर रहे हैं. लेकिन सच कहता हूं तुम्हारी कहानी बहुत अच्छी है. तुम्हारी अब तक की सर्वश्रेष्ठ.’ मुझे भी उसकी निगाह में उसकी विफल कविताएं बहुत प्रभावकारी लग रही थीं जिनमें कुछ बाद में हिंदी की यादगार कविताएं साबित हुईं. उस रोज शायद हम दोनों दोस्त एक राज छिपा रहे थे कि हम अपने जिस रचना स्वरूप को लेकर संशयग्रस्त हैं वह अवचेतन में, एक अनकहे स्तर पर हमें बहुत प्रिय भी लग रहा था. तो यह द्वैत, यह विरोधाभास, यह अजूबा अपनी रचनात्मकता के प्रति क्यों था हममें? इस प्रश्न का उत्तर तलाशने के लिए थोड़ा पीछे के वक्त में चलना होगा.
हर पीढ़ी के स्मृतिकोश में एक बड़ी राजनीतिक घटना होती है जो पहले पहल उसके जीवन को घेरती है. इसी से उसकी राजनीतिक स्मृति की यात्रा शुरू होती है और इसका उसकी चेतना के निर्माण में अहम योगदान होता है. हमारी पीढ़ी जो साठ के आस-पास की थी, उसकी राजनीतिक स्मृति खुलती है ‘आपातकाल’ से. आपातकाल के दमन, उसके प्रतिरोध, उसकी पराजय और केंद्रीय सत्ता से पहली बार कांग्रेस पार्टी के निष्कासन से. हमारी निर्मिति में राजनीति के रेशे खूब थे. आैर व्यवस्था परिवर्तन की आकांक्षा के साथ सुंदर समाज बनाने का स्वप्न. लेकिन ये सब परिपक्व और गहराई में न था. एक युवकोचित शुरुआत थी. इसी धजा के साथ मैं उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर कस्बाई शहर से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एमए की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद गया.
उन दिनों हिंदी कहानी में आपातकाल समाप्त होने के बाद प्रारंभ हुई जनवादी कहानी की धारा अपने प्रबल रूप में थी जो पक्षधरता, सर्वहारा शोषित, प्रताड़ित की विजय, क्रांति, विद्रोह आदि के तत्वों से बनी थी. इसमें शक्ति संरचनाएं हारती हुई और लाचार दिखाई देती थीं बावजूद अपने दमनकारी चरित्र के. हमसे ठीक पूर्ववर्ती पीढ़ी के अधिकतर वामपंथी लोग इस तरह लिख रहे थे. यह शायद आपातकाल की शिकस्त से उपजा उत्साह था. स्थिति यह थी कि कहानी बगैर हिंसा के, शोषक की प्रताड़ना के पूरी नहीं होती थी. सीधे-सीधे दो वर्गों का युद्ध होता था. लेकिन हमारी पीढ़ी के लोग नए थे. जीवन हममें उतरता जा रहा था और हम जीवन में. हम अपनी मां, पिता की तकलीफें देख रहे थे, हमारी बहनें, भाई अभी हमारे साथ थे. उनके सुख-दुख हमारे थे, हमारे उनके. हम सभी युवाओं को प्रेम पुकारता था. लड़कियां अच्छी लगती थीं. कहना यह है कि हमारे छोटे-छोटे अनुभव हममें रचे-बसे थे किंतु दिमाग हमारा राजनीतिक था. यहां तक कि हम अपनी प्रेमिकाओं को रिझाने, उनकी आत्मा पर छाप छोड़ने के लिए रोमांस नहीं क्रांति की चर्चा करते थे.
अब जरा इलाहाबाद विश्वविद्यालय और इलाहाबाद के बारे में. यहां हम कई दोस्तों का समुदाय था जो निश्चय ही अपने-अपने वामपंथी छात्र संगठनों में थे लेकिन सभी साहित्यिक, फक्कड़ और लापरवाही तथा बरबादी को प्यार करने वाले थे. यह हमारी मित्रता का समानबिंदु था और इलाहाबादी छात्र का आम चरित्र. उन दिनों जो इलाहाबाद की यात्रा करता था वह देखता था कि विश्वविद्यालय के चारों तरफ छात्र मुड़े-तुड़े कपड़े, हवाई चप्पलें पहले मार्क्सवाद, साम्यवाद, मार्क्स, लेनिन, चे ग्वारा, माओ, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, नामवर सिंह आदि को लेकर चाय के ढेलों पर चाय पीते हुए बहसें किया करते थे. हमारे विश्वविद्यालय. में हमारा प्रिय नारा था, ‘पढ़ाई लड़ाई साथ-साथ.’ बड़ा अजीब था विश्वविद्यालय. वहां के गुंडे भी साहित्य, राजनीतिक चिंतन की कमोबेश जानकारी रखते थे और बौद्धिक छात्र भी जरूरत पड़ने पर मारपीट से परहेज नहीं करते थे. हम किसी गरीब गुरबा को उसका हक दिलाने के लिए पिटाई-उटाई करने से कोई गुरेज नहीं करते थे तब. हम अच्छे महंगे कपड़े, चमकती घड़ी, खूबसूरत धूप चश्मा पहनने वाले छात्रों को, रईसजादों को दया, गुस्से और हिकारत से देखते थे. जिनकी कमीज के बटन साबूत और बंद हों, जिनके बाल संवरे हों, जो संपन्न हों उन लड़कों को मूर्ख मानते. हमें अपने दिमाग, दिल, फकीरी, विचारधारा और साहित्यिक विवेक पर बड़ा गुरूर रहता था. हम मानते थे कि हम दुनिया के सबसे अच्छे लोग हैं. हममंे से किसी के पास पर्स नहीं था, जेबें ठंडी रहती थीं पर दिल में बड़ी आग थी.
धीरे-धीरे वह समय आयाः हमने 1984 में हिंदू सिख दंगे देखे और देखा राजीव गांधी के नेतृत्व में नई आर्थिक नीति, नई शिक्षा नीति, इक्कीसवीं सदी में भारत को ले जाना है, संचार क्रांति आदि. और हमारे सान्निकट या समाजवाद के स्वप्न का ढहना. मार्क्सवाद के आत्मविश्वास का क्षीण होते जाना. सबसे ज्यादा हम पर आघात कर रही थी हमारी बेरोजगारी. हमारे पहले के जो लोग थे उनका जीवन अच्छा-बुरा जैसा था, स्थिर हो चुका था इसलिए वह वक्त उन पर उतना गहरा घाव नहीं कर रहा था जितना वह हमें चीर रहा था. हम सब इलाहाबाद छोड़ कर अपने-अपने गृह जनपद स्थित अपने-अपने घर चले गए थे. लेकिन बेरोजगारी का त्रास झेल रहे हम सबके लिए घर पनाहगाह था और यातनागृह भी था. ‘चिट्ठी’ कहानी जो हम दोस्तों और हमारी बेरोजगारी की कहानी थी उसमें आप देखेंगे कि उसमें काम न मिल पाने की व्यथा के स्वरूप में फर्क है. बेरोजगारी पर लगभग हर दौर में कहानियां रची गई हैं. इस थीम पर बेहतरीन कहानियां हमारी भाषा में हैं जिनके सामने मेरी कहानी कहीं नहीं ठहरती, लेकिन मैं यहां जो बात कहना चाहता हूं वह यह है कि बेरोजगारी पर लिखी कहानियों में आप देखें, वहां एक बेरोजगार नौजवान या नायक की पीड़ा और समस्या है जबकि ‘चिट्ठी’ की बेरोजगारी, उसकी मुश्किल, उसकी व्यथा वैयक्तिक जितनी है, उससे ज्यादा सामूहिक है. जोर देकर कहना होगा कि यह मेरी विशेषता और सामर्थ्य का परिणाम न था बल्कि इसका संपूर्ण श्रेय उस समय को दिया जाना चाहिए जिसमें हमारी पीढ़ी की निर्मिति हुई थी.