शेर के दांत दिखाने के

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फोटो: शैलेंद्र पाण्डेय
फोटो: शैलेंद्र पाण्डेय

छह दशक पहले 25 नवंबर 1949 को बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा की बैठक में देश की संसदीय प्रणाली को लेकर एक वक्तव्य दिया था. उन्होंने कहा था, ‘राजनीति के क्षेत्र में हम लोग ‘एक व्यक्ति – एक वोट’ की नीति को स्वीकृति देने जा रहे हैं.’ इसके साथ ही उन्होंने आशंका और हिदायत के मिले-जुले भाव में एक दूसरी बात भी कही थी. संसद के केंद्रीय हाल में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था, ‘कौन कह सकता है कि भारत के लोगों तथा उनके राजनीतिक दलों का व्यवहार कैसा होगा? भारतवासी देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे या पंथ को देश से ऊपर रखेंगे? मैं नहीं जानता. लेकिन यह बात निश्चित है कि यदि राजनीतिक दल पंथ को देश से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता फिर से खतरे में पड़ जाएगी…’

बेशक बाबा साहब ने कभी नहीं चाहा होगा कि उनका यह अंदेशा भविष्य में सच साबित हो, लेकिन हालिया चुनावी मौसम के दौरान घटी कुछ घटनाओं में ऐसा होने के साफ संकेत नजर आ चुके हैं. बीते दिनों उत्तर प्रदेश की अलग-अलग जगहों पर भाजपा और समाजवादी पार्टी के नेताओं अमित शाह और आजम खान ने धर्म विशेष के प्रति राग-द्वेष पैदा करने वाली बयानबाजी करके जहां ‘देश को पंथ से पहले’ रखने के विचार को उलट दिया, वहीं महाराष्ट्र में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को दो-दो बार वोट डालने का नुस्खा सिखा कर केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने ‘एक व्यक्ति – एक वोट’ के सिद्धांत को भी आंखें दिखा दी. इन घटनाओं के बीच बीते 14 अप्रैल को बाबा साहब की 123 वीं जयंती भी मनाई गई.

इस बीच केंद्रीय चुनाव आयोग ने आचार संहिता के उल्लंघन वाले इन मामलों का संज्ञान ले कर आजम खान और अमित शाह की चुनावी रैलियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही उन पर मुकदमा दर्ज करने के आदेश जारी कर दिए. इससे पहले चुनाव आयोग शरद पवार को भी नोटिस भेज चुका था. लेकिन जब तक इन कदमों को लेकर उसकी सराहना होती, भाजपा और समाजवादी पार्टी ने उस पर सवाल उठा दिए. अपने-अपने नेताओं को निर्दोष बताते हुए दोनों ही पार्टियां आयोग की कार्रवाई को गलत बताने में लग गई. भारतीय जनता पार्टी ने अमित शाह के खिलाफ आयोग के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया और आयोग के फैसले के खिलाफ अदालत जाने समेत सभी विकल्पों पर विचार करने की बात भी कही. बाद में शाह के गलती मान लेने के बाद आयोग ने उन पर लगाया प्रतिबंध हटा दिया.

अभी आजम के साथ ऐसा नहीं हुआ है क्योंकि वे अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हैं और उलटे आयोग को तरह-तरह से दोषी ठहराने में लगे हुए हैं. इसमें उनका साथ सपा के तमाम अन्य नेता भी समय-समय पर दे रहे हैं. आयोग के फैसले को गलत बताते हुए पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव का चेतावनी-भरे अंदाज में कहना था, ‘आयोग के रवैये से उनकी पार्टी का हर कार्यकर्ता आजम खान बन जाएगा. ऐसे में चुनाव आयोग किस-किस पर कार्रवाई करेगा?’ इस पूरे घटनाक्रम के बीच मामला तब और खतरनाक हो गया जब आजम ने आयोग पर केंद्र सरकार का मुलाजिम होने तक का आरोप लगा दिया. बकौल आजम, ‘चुनाव आयोग भी सीबीआई की तरह केंद्र के इशारे पर काम कर रहा है.’ लेकिन अपनी इतनी आलोचना और आरोपों पर कोई और कदम उठाने की बजाय आयोग चुप्पी साधे हुए है..

इस सबके बीच एक और घटना का जिक्र किया जाना बेहद जरूरी है. यह घटना शरद पवार को भेजे गए उस नोटिस से संबंधित है जो उन्हें अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से दो-दो बार वोट डालने की बात कहने के चलते आयोग ने भेजा था. भारतीय दंड संहिता की धारा 171 D के तहत दो-दो बार वोट देना तथा ऐसा करने के लिए किसी को प्रेरित करना दोनों ही अपराध हैं. इस मामले के सामने आने पर शरद पवार ने इसे मजाक में कही हुई बात बताया और आयोग को जवाब भेज कर इस पर खेद जता दिया. पवार के इस जवाब से चुनाव आयोग संतुष्ट नहीं था, बावजूद इसके उसने इस मामले का पटाक्षेप कर दिया. शरद पवार को भेजे गए आदेश में आयोग ने लिखा, ‘हालांकि आयोग आपके जवाब से संतुष्ठ नहीं है, फिर भी आपके द्वारा खेद जताने के बाद मामले को समाप्त किया जाता है.’ आयोग ने शरद पवार को अनुभवी नेता होने की दुहाई देकर भविष्य में ऐसा न करने की सलाह भी दी. लेकिन अगर आयोग शरद पवार के जवाब से संतुष्ट नहीं था तो फिर उसने मामले को खत्म क्यों किया ?

आचार संहिता से जुड़े मामलों पर स्पष्टीकरण और जानकारी के लिए चुनाव आयोग के अधिकारियों से बात करने की कई निष्फल कोशिशों के बाद तहलका ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया. हमने यह जानने की कोशिश की कि संहिता के उल्लंघन की ज्यादातर शिकायतों पर आयोग आखिर कैसी कार्रवाइयां करता है. सूचना के अधिकार तथा अन्य स्रोतों से भी जुटाई गई जानकारियां बताती हैं कि आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी ज्यादातर मामलों को चुनाव आयोग पवार की तरह संतोषजनक जवाब न मिलने के बावजूद उनके मामले की तरह ही निपटाता है. तहलका के पास ऐसे मामलों की अच्छी-खासी फेहरिस्त है जो भड़काऊ भाषण देने, धार्मिक आयोजनों में सरेआम नोट बांटने, आचार संहिता के बावजूद नई योजनाओं की घोषणा करने और पेड न्यूज से संबंधित हैं. लेकिन इन सभी मामलों का हश्र लगभग एक जैसा ही रहा.

सूचना के अधिकार के तहत तहलका ने चुनाव आयोग से पूछा कि 2012 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान आचार संहिता के उल्लंघन की उसे कितनी शिकायतें मिलीं. बेहद जटिल हिंदी में आयोग की तरफ से मिले जवाब का मजमून यह था कि इस तरह की शिकायतों को संकलित करना संभव नहीं है. जब चुनाव आयोग से यह पूछा गया कि इन शिकायतों पर उसने क्या कार्रवाई की तो भी आयोग ने यही जवाब दिया कि न तो उसके पास इसका पूरा ब्यौरा रहता है और न ही ऐसा किया जाना संभव है.

इसके बाद तहलका ने सवाल किया कि आयोग इतना ही बता दे कि आचार संहिता का उल्लंघन करने की शिकायत मिलने पर वह क्या कार्रवाई कर सकता है. इस सवाल का जवाब आया कि ऐसे मामलों में आयोग नोटिस देने और दोषी पाए जाने पर चेतावनी जारी करता है.

आयोग से मिले इन जवाबों के बाद हमने उसके प्रकाश में आए नवीनतम दस मामलों में की गई कार्रवाइयों का व्यौरा मांगा. इस पर आयोग ने जो जानकारी दी उनमें दोषी पाए जाने पर सबसे बड़ी कार्रवाई चेतावनी थी. इन दस मामलों में से सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे दो लोगों के मामले दिलचस्प हैं:

भाजपा नेता अमित शाह पर आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में एफाआईआर दर्ज हुई है.
भाजपा नेता अमित शाह पर आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में एफाआईआर दर्ज हुई है.

पिछले साल त्रिपुरा विधान सभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग नें प्रदेश के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को आचार संहिता का उल्लंघन करने पर नोटिस भेजा. प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग को दी गई एक शिकायत में आरोप लगाया था कि उन्होंने चुनाव आचार संहिता के दौरान मुख्यमंत्री कार्यालय में एक स्थानीय टेलीवीजन चैनल को इंटरव्यू दिया जिसके जरिए उन्होंने राजनीतिक बयानबाजी की और अपनी सरकार की प्रशंसा की. आदर्श आचार संहिता के मुताबिक आचार संहिता की समयावधि में राजनीतिक उद्देश्य से सरकारी मशीनरी का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए. सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी बताती है कि आयोग ने इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना था. लेकिन कार्रवाई के नाम पर उसने बस इतना किया कि माणिक सरकार को सरकारी मशीनरी का दोबारा दुरुपयोग न करने की चेतावनी देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली.

दूसरा मामला भी 2013 में ही हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों का है. एक चुनावी रैली में प्रदेश के तत्कालीन उप मुख्यमंत्री केएस ईश्वरप्पा ने एक समुदाय विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए भाषण दिया. इस भाषण पर चुनाव आयोग ने उन्हें 12 अप्रैल, 2013 को नोटिस भेज कर ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और ‘भारतीय दंड संहिता’ की धारा 505 के उल्लंघन के लिए जवाब मांगा. आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक आयोग मान चुका था कि ईश्वरप्पा का बयान आचार संहिता के उल्लंघन के साथ ही सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वाला और नागरिकों के विभिन्न वर्गों में वैमनस्य को बढ़ावा देने वाला था. आईपीसी की धारा 505 के तहत अपराधी पाए जाने पर तीन साल तक कैद हो सकती है. लेकिन 23 अप्रैल को दिए अपने फैसले में आयोग ने ईश्वरप्पा को सिर्फ फटकार लगाई और भविष्य में सावधानी बरतने की नसीहत देकर मामले को खत्म कर दिया.

साफ है कि आचार संहिता के उल्लंघन के बाद आयोग की कार्रवाई नोटिस देने, अफसोस जताने और भविष्य में ऐसा न करने की नसीहत वाले तयशुदा खांचे में ही बंधी हुई है. लेकिन क्या यह तरीका वाकई में असरकार है?

इस सवाल के जवाब के लिए हम एक और बड़े नेता से जुड़ा मामला देखते हैं. हाल ही में केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ उत्तर प्रदेश की एक चुनावी रैली में अशोभनीय टिप्पणी की थी, जिस पर उन्हें नोटिस भेजा जा चुका है. इन्हीं बेनी बाबू को दो साल पहले भी आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में आयोग ने तलब किया था. 2012 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान बेनी बाबू ने एक चुनावी सभा में कहा कि यदि प्रदेश में उनकी पार्टी की सरकार आई तो मुसलमानों को दिए जाने वाले आरक्षण में बढोतरी की जाएगी. बेनी प्रसाद ने तब यह भी कहा कि चुनाव आयोग चाहे तो उन्हें इस बात के लिए नोटिस दे सकता है. इस तरह देखें तो उन्होंने आचार संहिता का उल्लंघन तो किया ही था साथ ही चुनाव आयोग को खुलेआम चुनौती भी दी थी. बाद में बेनी प्रसाद वर्मा ने चुनाव आयोग के नोटिस के जवाब में अफसोस जताने के उसी कुख्यात तरीके का सहारा लिया, जिसके बाद चुनाव आयोग ने उन्हें भविष्य में ऐसा नहीं करने की सलाह देकर छोड़ दिया.

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क्या है आदर्श चुनाव आचार संहिता ?

आदर्श चुनाव आचार संहिता यानी वे नियम जिनका पालन उम्मीदवारों और उनकी पार्टियों के लिए चुनाव के दौरान करना जरूरी है. इन नियमों को राजनीतिक दलों के साथ समन्वय और उनकी सहमति के साथ ही बनाया गया है, ताकि चुनाव के दौरान पारदर्शिता होने के साथ ही सभी राजनीतिक दलों के लिए समान अवसर प्रदान किए जा सकें. चुनाव की तारीखों के एलान के साथ ही संबंधित राज्य में चुनाव आचार संहिता भी लागू हो जाती है और सभी सरकारी कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक निर्वाचन आयोग के कर्मचारी बन जाते हैं. आचार संहिता की मुख्य बातें :

  • कोई भी राजनीतिक पार्टी या प्रत्याशी ऐसा कोई काम नहीं करेगा जिससे अलग-अलग समुदायों के बीच वैमनस्य की भावना को बढ़ावा मिले.
    राजनीतिक पार्टी या प्रत्याशियों पर निजी हमले नहीं किए जा जाने चाहिए, हालांकि उनकी नीतिगत आलोचना की जा सकती है.
  • 12चुनाव प्रचार के लिए धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. साथ ही वोट हासिल करने के लिए जाति या धर्म आधारित अपील नहीं की जा सकती.
  •  मतदाताओं को किसी भी प्रकार के प्रलोभन या किसी धमकी के जरिए वोट देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है.
  •  मतदान से 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार संबंधी किसी भी तरह की सार्वजनिक रैली और बैठक प्रतिबंधित है.
  • मतदान के दिन मतदान केंद्र के 100 मीटर के दायरे में चुनाव प्रचार नहीं किया जा सकता.
  • प्रत्याशी या राजनीतिक दल मतदान केंद्रों पर वोटरों को लाने लेजाने के लिए वाहन मुहैया नहीं करा सकते.
  • चुनाव प्रचार के दौरान आम लोगों की निजता या व्यक्तित्व का सम्मान होना चाहिए.
  • प्रत्याशी या राजनीतिक दल किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति का इस्तेमाल उसकी इजाजत के बिना नहीं कर सकते.
  • राजनीतिक पार्टियों को सुनिश्चित करना जरूरी है कि उनके कार्यकर्ता दूसरी राजनीतिक पार्टियों की रैली आथवा सभाओं में किसी भी तरह से  बाधा नहीं डालेंगे.
  • राजनीतिक पार्टी या प्रत्याशी को रैली, जुलूस अथवा मीटिंग करने से पहले स्थानीय पुलिस को जानकारी देकर प्रस्तावित कार्यक्रम का समय और स्थान बताना होगा.
  • किसी इलाके में निषेधाज्ञा लागू होने पर इससे छूट पाने के लिए प्रशासन की अनुमति जरूरी होगी.
  • किसी भी स्थिति में पुतला जलाने की इजाजत नहीं होगी

सत्ताधारी पार्टी के लिए  दिशानिर्देश

  • चुनाव की घोषणा होने के बाद संबंधित सरकार आदर्श चुनाव आचार संहिता के दायरे में आ जाएगी.
  • इस दौरान प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री कोई भी नई घोषणा नहीं कर सकते.
  • सरकारी दौरों को चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
  •  चुनाव प्रचार के लिए सरकारी धन का इस्तेमाल नहीं हो सकता.
  • सरकारी मशीनरी, सरकारी वाहन, सरकारी आवास तथा अन्य सुविधाओं का इस्तेमाल चुनाव संबंधी गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित है.
  • चुनाव आचार संहिता के दौरान सरकार कैबिनेट की बैठक नहीं कर सकती.
  • अधिकारियों, कर्मचारियों के तबादले और तैनाती संबंधी  मामलों में चुनाव आयोग की अनुमति ली जानी अनिवार्य है.

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सपा नेता आजम खान और कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा(नीचे) तो आयोग की चेतावनियों की जरा भी परवाह नहीं करते दिखते.
सपा नेता आजम खान और कांग्रेस नेता बेनी प्रसाद वर्मा(नीचे) तो आयोग की चेतावनियों की जरा भी परवाह नहीं करते दिखते.

बेनी बाबू जैसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमें एक ही व्यक्ति अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग तरीके से आचार संहिता का उल्लंघन करता है मगर चुनाव आयोग हर बार उससे निपटने का एक ही तरीका अपनाता है नोटिस देना, जवाब लेना और दोषी पाए जाने पर चेतावनी देना. इसका मतलब साफ है कि आचार संहिता के उल्लंघन वाले मामलों को निपटाने का यह ‘नोटिसछाप’ फार्मेट कहीं से भी कारगर नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि जब मामला ढाक के तीन पात जैसा ही होना है तो फिर चुनाव आयोग नियमतोड़ू राजनेताओं के खिलाफ नोटिस देने से आगे कोई कदम क्यों नहीं उठाता?

संविधान के अनुच्छेद 324 के मुताबिक चुनाव आयोग को देश में चुनाव प्रक्रिया के संचालन संबंधी जितने भी अधिकार प्राप्त हैं वे सभी पारदर्शी ढंग से चुनाव संपन्न कराने के लिए हैं, ताकि देश का संचालन धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक और लोकतांत्रिक ढांचे के अनुरूप हो सके. लेकिन असलियत यह है कि चुनाव प्रक्रिया के जटिल दौर में इन ढाचों को तोड़ने-मरोड़ने वाली ताकतों से निपटने के लिए आयोग के हाथ में कुछ भी नहीं है. नेशनल इलैक्शन वाच के संस्थापक सदस्य प्रोफेसर त्रिलोचन शास्त्री बताते हैं, ‘भले ही कितना ही गंभीर मामला क्यों न हो, चुनाव आयोग आचार संहिता के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित व्यक्ति अथवा पार्टी को नोटिस देने और दोषी पाए जाने की स्थिति में फटकार लगाने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता. रिप्रजेंटेशन आफ पीपुल एक्ट 1951 में भी आयोग को ऐसा अधिकार नहीं मिला है कि वो आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों का नामांकन रद्द कर सके. उसके पास इतना ही अधिकार है कि वो चुनावों को लेकर बनाई गई व्यवस्था का जहां तक संभव हो सके पालन कराए.’

जिस रिप्रजेंटेशन आफ पीपुल एक्ट 1951 की बात प्रोफेसर शास्त्री कर रहे हैं उसमें चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर सजाओं के संबंध में आयोग को जो अधिकार दिए गए हैं वे बेहद सीमित हैं. इस एक्ट के आधार पर चुनाव आयोग आचार संहिता तोड़ने वालों के अपराध को श्रेणीबद्ध तो कर सकता है, लेकिन उन्हें दंडित करने का अधिकार सिर्फ अदालत के पास ही है. ऐसे में आदर्श चुनाव आचार संहिता की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़ा हो जाता है.

यह सवाल इस लिए भी सोचने योग्य है कि आयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में आचार संहिता के उल्लंघन के मामले रुक नहीं रहे हैं. 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में ही आचार संहिता के उल्लंघन की साढे सात लाख से अधिक शिकायतें पाई गई थी. इस बार के लोकसभा चुनाव की बात करें तो अब तक चुनाव आयोग आजम खान, अमित शाह और बेनी प्रसाद वर्मा से लेकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव जैसे बड़े नेताओं को कारण बताओ नोटिस थमा चुका है. यह रफ्तार बताती है कि आचार संहिता की धज्जियां उड़ाने में नेताओं को कोई खतरा नहीं दिख रहा है.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) डॉ एस वाई कुरैशी इस मसले को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि, ‘आदर्श चुनाव आचार संहिता कोई कानून नहीं है. यह आयोग द्वारा बनाई गई ऐसी नैतिक व्यवस्था है जिसके जरिए राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि चुनाव प्रक्रिया को साफ सुधरा बनाने में वे आयोग की मदद करें. यही वजह है कि आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में आयोग के अधिकार नोटिस देने और चेतावनी जारी करने तक सिमट जाते हैं.’

क्या सीमित अधिकार की यह दुहाई चुनाव आयोग की लाचारी को नहीं दिखाती? अगर आयोग के पास अधिकार ही नहीं हैं तो फिर उसके द्वारा दिए जाने वाले नोटिस और चेतावनियों का क्या औचित्य है? यह सवाल इस लिए भी लाजिमी है कि आयोग द्वारा खींची गयी आचार संहिता की लगभग सभी लकीरें चुनावों के दौरान तोड़ी जाती रहीं हैं जिसके परिणाममस्वरुप नियम तोडने वाले शख्स को फौरी लाभ मिल जाता है. इस तरह की करतूतों में भड़काऊ भाषण देने, सार्वजनिक मंचों से पैसा बांटने, नई योजनाओं की घोषणा करने और धारा 144 के उल्लंघन से लेकर निर्धारित राशि से ज्यादा धन खर्च करने तक के मामले शामिल हैं.

निर्धारित राशि से ज्यादा धन खर्च करने का एक मामला तो पिछले साल काफी गरमाया भी था. यह मामला लोकसभा में विपक्ष के उपनेता और भाजपाई सांसद गोपीनाथ मुंडे के उस बयान से उपजा जिसमें उन्होंने दावा किया कि 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने चुनाव प्रचार पर आठ करोड़ रुपये खर्च किए थे. आदर्श चुनाव आचार संहिता कहती है कि कोई भी प्रत्याशी चुनाव आयोग द्वारा तय की गई राशि – जो 2009 में 25 लाख थी – से अधिक धन खर्च नहीं कर सकता है.

चुनाव आचार संहिता के दौरान नई योजनाओं की घोषणा करने का एक मामला पिछले साल तमिलनाडु की एक विधानसभा सीट पर उपचुनाव के दौरान भी सामने आ चुका है. दरअसल यहां अपनी पार्टी के प्रत्याशी का प्रचार करने पहुंची जयललिता ने आचार संहिता लगी होने के बावजूद इलाके के स्कूल और अस्पताल के उच्चीकरण करने समेत और भी कुछ नई घोषणाएं कर दी. आयोग के पास इस मामले की शिकायत पहुंची जिसे उसने सही पाया और जयललिता को नोटिस भेज दिया. लेकिन आयोग को भेजे अपने जवाब में जयललिता ने ऐसी किसी भी नई घोषणा करने की बात से इंकार कर दिया. उनका कहना था कि उन्होंने पुरानी घोषणाओं को दोहराने के साथ ही नई बातों को लेकर सिर्फ आश्वासन दिए थे. जयललिता के इस जवाब से असंतुष्ठ होते हुए भी आयोग के पास उन्हें भविष्य में ऐसा न करने की नसीहत देने के सिवा कोई और चारा नहीं था.

सवाल फिर से वही खड़ा हो जाता है कि यदि ऐसा है तो आचार संहिता की जरूरत ही क्या है. प्रोफेसर त्रिलोचन शास्त्री कहते हैं कि, ‘चुनाव आयोग अगर आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी मामलों का संज्ञान लेना और नोटिस देना भी बंद कर दे तो चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कारणों की बाढ़ आ जाएगी. कम से कम आचार संहिता के होने से ऐसे मामलों में अंकुश तो लगाया ही जा सकता है.’

‘इस बात से इनकार नहीं किया जाना चाहिए कि सीमित शक्ति के बावजूद चुनाव आयोग ने काफी हद तक आचार संहिता के उल्लंघन वाले मामलों को नियंत्रित करने का काम किया है.’ इस बात से सहमति जताते हुए डा. कुरैशी कहते हैं, ‘सब कुछ नहीं से कुछ तो सही वाली स्थितियां है जिन्हें चुनाव सुधारों के जरिए ही ठीक किया जा सकता है.’

चुनाव सुधारों की जिस जरूरत की ओर कुरैशी का इशारा है, उस पर एक नजर डाले बिना यह कथा अधूरी होगी.

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