वे दिन और आज

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सिर्फ साल भर पहले तक यानी 14 फरवरी 2018 में भी गंगा किनारे जाने के लिए प्राचीन  काशी में गलियां थी। सुबह सवेरे नहीं, बल्कि भोरहरी में ही बनारसी गमछा लपेटे ललिता गली से गंगाघाट की तरफ  जाने का सिलसिला शुरू हो जाता था। लेकिन अब 14 फरवरी 2019 में ऐसा नहीं है। गलियों का अस्तित्च अब इतिहास बन चुका है। लोग घरों को छोड़ कर जा चुके हैं।

सबसे पहले काशी की तंग, संकरी गलियों को छोड़कर परिंदे चले गए। वे समझ गए थे कि अब  यहां रहना मुश्किल है। उसके बाद कुत्ते गए। फिर वे सांड जो यहां की गलियों में घूमते थे वे इसे छोड़ कर चले गए। जब घरों का उनमें बने बड़े छोटे मंदिरों का ध्वंस शुरू हुआ तो चूहे भी नए ठिकानों को चले गए । अब तो बंदर भी जा चुके हैं। वहां न जाने कहां।

ऐसा लगता है कि परिंदे और कुत्ते सबसे पहले भांप लेते हैं कि आदमी के दिमाग में क्या चल रहा है। जब परिंदे किसी बस्ती को छोड़कर जाने लगें तो समझ जाइए कि सभ्यता का विकास जल्दी ही वहां होने को है। आदमी के मन मस्तिष्क से निकलती तरंग और गंध को परिंदे और कुत्ते न केवल जानते-समझते हैं बल्कि वे उसके तात्पर्य को भी समझ-बूझ लेते हैं।

परिंदों को बदलते मौसम की भी समझ होती है। पहले ऋषि-मुनि तो जीव-जंतुओं की गतिविधियों से अनुमान लगा लेते थे कि मौसम का क्या रुख होगा। चीटियों के अपने बिल से बाहर निकलने पर उन्हें अनुमान हो जाता था कि अब बारिश होगी। हमारे ही यहां घाघ नाम के कवि अपने जमाने के बड़े मौसम वैज्ञानिक थे जो हवा, आसमान में बादलों के उतार-चढ़ाव और रूपरंग और जीव -जंतुओं के व्यवहार में बदलाव के आधार पर सटीक भविष्यवाणी अपने दोहों में करते थे।

लेकिन अब हमारा इतना ‘विकास’ हो चुका है कि परिंदों, कुत्तों और चौपायों की भाषा समझने-जानने की क्षमता खो चुके हैं। हमारे ऋषि -मुनि न केवल उनके संकेतों और व्यवहार से जान जाते थे कि वे क्या चाहते हैं और मौसम में क्या बदलाव होगा । यह था उनका ‘वेलेंटाइन डे’ यानी प्रेम-उमंग-उत्साह का उत्सव।

आज ‘विकास’ ने सबको -‘अपने साथ’ ले लिया है ‘सबका विकास’ करने के लिए। पुननिर्माण के नाम पर ध्वंस, प्रेम की जगह अब झूठ, मक्कारी, फरेब, जालसाजी, विश्वासघात, तिकड़मबाजी आदि गुण विकसित हो गए हैं।   जिनसें एक सभ्यता नष्ट होती है। दूसरी का निर्माण होना शुरू हो जाता है। यही है ‘पक्काप्पा’। यानी विकास की हमने जो राह चुनी है उसी दिशा में आगे बढऩा है। पीछे लौटने का सवाल ही नहीं है। यह है काशी की संस्कृति का ‘विकास’ या ‘विनाश’। आप आज़ाद हैं कुछ भी कहने के लिए।

सुरेश प्रताप