विलक्षण विराट

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12 नवंबर, 2013. दो दिन बाद क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर को अपना 200वां और आखिरी टेस्ट मैच खेलना था. देश-दुनिया में उनकी विदाई पर बात हो रही थी. सचिन का आखिरी मैच उनके अपने शहर मुंबई में था, इसलिए दूसरे बहुत-से लोगों की तरह मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (एमसीए) ने भी इस मौके को यादगार बनाने के लिए एक खास कवायद की. उसने वानखेड़े स्टेडियम में अलग-अलग जगहों पर 51 पोस्टर लगाए. टेस्ट मैचों में तेंदुलकर के कुल 51 शतकों की याद दिलाते इन पोस्टरों में तेंदुलकर की तस्वीरें थीं और यह जिक्र भी कि यह शतक उन्होंने किस टीम के खिलाफ लगाया. अपनी इस अनूठी कवायद पर एमसीए को तारीफ की उम्मीद रही होगी.

लेकिन हुआ उलट. ऐन वक्त पर पता चला कि उसी वानखेड़े में एक दूसरे खिलाड़ी के पोस्टरों की इतनी जबरदस्त भीड़ हो गई है कि उसमें तेंदुलकर के लिए खास तौर से बनाए गए 51 पोस्टर खो-से गए हैं. इसकी एक वजह तो यह थी कि ये पोस्टर बहुत ही ऊंचाई पर लगे थे और दूसरी यह कि इनके लिए तेंदुलकर की तस्वीरों को अखबार या पत्रिका जैसे दूसरे स्रोतों से लेकर बड़ा किया गया था जिससे वे साफ नहीं दिख रही थीं. उधर, इस दूसरे खिलाड़ी की तस्वीर खास तौर पर इन्हीं पोस्टरनुमा विज्ञापनों के लिए ली गई थी इसलिए पहली नजर तेंदुलकर के बजाय उसके पोस्टरों पर ही जा रही थी. इस पर एमसीए का असहज होना स्वाभाविक था और यह भी कि तुरंत ही इस दूसरे खिलाड़ी के ज्यादातर पोस्टर हट गए.

तेंदुलकर ने मैच में 74 रन बनाए तो उस खिलाड़ी का स्कोर रहा 57 और मैच के बाद तेंदुलकर जब दर्शकों को धन्यवाद कहने के लिए मैदान का चक्कर लगाने निकले तो इसी खिलाड़ी ने कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के साथ मिलकर तेंदुलकर को अपने कंधे पर उठा लिया.

ये खिलाड़ी हैं विराट कोहली.

कोहली कहते हैं कि उनके क्रिकेटर बनने की सबसे बड़ी वजह तेंदुलकर हैं. तेंदुलकर कहते हैं कि उन्हें कोहली की बल्लेबाजी में अपनी छाया दिखती है. डॉन ब्रैडमैन को इसी तरह तेंदुलकर के खेल में अपने खेल की झलक दिखती थी. सुनील गावस्कर, दिलीप वेंगसरकर, इयान चैपल जैसे क्रिकेट के दिग्गज जो कहते हैं उसका लब्बोलुआब यह है कि कोहली अगले सचिन हो सकते हैं. उधर, बिशन सिंह बेदी, मुथैय्या मुरलीधरन जैसे दूसरे दिग्गजों का भी एक वर्ग है जिसका मानना है कि कोहली सचिन तो नहीं हो सकते क्योंकि दो लोगों का एक जैसा होना नामुमकिन है लेकिन यही प्रतिभा, अनुशासन और समर्पण अगर वे अगले 15 साल भी बरकरार रख पाए तो वे क्रिकेट के अगले युग के महानायक जरूर हो सकते हैं.

इन सब बातों पर विचार करने और घटनाओं के जिस सिलसिले से हमने बात शुरू की थी उसे उल्टे क्रम में देखने पर एक दिलचस्प संभावना जताई जा सकती है. सचिन तेंदुलकर की विरासत का बोझ उठाने के लिए विराट कोहली के कंधे पर्याप्त मजबूत हैं, यह उनके प्रदर्शन से लगता है. इस संभावना को यह हालिया खबर और वजन देती है कि विज्ञापन अनुबंधों से होने वाली कमाई के मामले में वे अब तक शीर्ष पर चल रहे अपने कप्तान महेंद्र सिंह धोनी से भी आगे निकल गए हैं. उधर, धोनी कह चुके हैं कि कोहली भविष्य के कप्तान हैं.

तो क्या विराट कोहली भारत के पहले सर्वगुणसंपन्न क्रिकेटर हैं?

इस सवाल के सही-सही जवाब के लिए विस्तार से यह देखना होगा कि क्रिकेट में सर्वगुणसंपन्न होने की क्या शर्तें हो सकती हैं और कोहली उन पर खरे उतरते हैं या नहीं.

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसमें तीन अलग-अलग विधाएं आपस में टकराती हैं. बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण. अगर आप ऑलराउंडर नहीं हैं, जो कि ज्यादातर खिलाड़ी नहीं होते, तो फिर आपकी श्रेष्ठता बल्लेबाजी या गेंदबाजी में से किसी एक विधा में आपके स्तर पर तय होती है. तिस पर आप अच्छे फील्डर भी हों तो सोने पर सुहागा.

यह तो हुई एक कसौटी. क्रिकेट एक ऐसा खेल भी है जो टीम के साथ खेला जाता है. तो बाकी टीम के साथ सामंजस्य का गुण भी जरूरी है और यहां सोने पर सुहागा जैसी बात यह हो सकती है कि आपमें टीम की अगुवाई करने की क्षमता भी हो.

इसके अलावा एक तीसरी कसौटी भी है. क्रिकेट को भारत में दूसरा धर्म कहा जाता है, इसलिए स्वाभाविक ही है कि इसका असर मैदान से परे भी जाता है. अच्छे खिलाड़ी पर बहुतों की नजरें रहती हैं. अपने प्रचार के लिए जरिया ढूंढ़ती कंपनियों की, उनमें कोई खबर तलाशती मीडिया की और उन्हें अपने प्रेरणास्रोत की तरह देखने वाले आम लोगों की भी.

पहले पहली कसौटी की बात करते हैं. बल्लेबाजी और गेंदबाजी में से कोहली पहली विधा से ताल्लुक रखते हैं. दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके से ताल्लुक रखने वाले कोहली ने भारतीय क्रिकेट टीम में 2008 में पदार्पण किया. लेकिन होनहार बिरवान के होत चिकने पात वाली कहावत की तरह वे इससे पहले ही सुर्खियों में आ चुके थे. 2005 में दिल्ली की अंडर-17 टीम की तरफ से खेलते हुए पंजाब और हिमाचल के खिलाफ दोहरे शतक लगाकर उन्होंने लोगों का ध्यान खींचा. इसके बाद दिसंबर, 2006 में हुई एक असाधारण घटना से वे अचानक राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गए. कर्नाटक और दिल्ली के बीच रणजी ट्रॉफी मैच हो रहा था. मैच के दूसरे दिन कोहली के पिता का निधन हो गया. अगले दिन उनका अंतिम संस्कार होना था. उधर, मैच में दिल्ली की हालत पतली थी. पहली पारी में कर्नाटक ने 446 रन बनाए थे. जवाब में दिल्ली की टीम 59 रनों पर अपने पांच बल्लेबाज खो चुकी थी. दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक विराट कोहली और पुनीत बिष्ट क्रीज पर थे और दिल्ली का स्कोर था 103 रन. फॉलोऑन का खतरा सिर पर था. कोच चेतन चौहान और कप्तान मिथुन मन्हास सहित टीम के बाकी लोगों ने कोहली से कहा कि वे मैच छोड़कर घर जाएं. लेकिन कोहली ने कहा कि वे टीम के साथ रहेंगे. उन्होंने कुल 90 रन बनाए और पुनीत बिष्ट के साथ छठे विकेट के लिए 152 रनों की साझेदारी करके दिल्ली को फॉलोऑन से बचा लिया. इसके बाद वे पिता के अंतिम संस्कार में गए. अपने इस फैसले के बारे में तब कोहली ने जो कहा उसका सार यह था कि यही उनकी अपने पिता को श्रद्धांजलि थी. टीम के प्रति अपने दायित्व को उन्होंने अपने व्यक्तिगत दुख से ऊपर रखा और दिखाया कि जब इम्तिहान का वक्त आता है तो सच्चे खिलाड़ी और मजबूत हो जाते हैं.

क्या यह संयोग है कि ऐसी ही एक घटना सचिन तेंदुलकर के जीवन से भी जुड़ी है? 1999 के विश्व कप के दौरान सचिन के पिता का निधन हो गया था. लेकिन इस दुख को पीछे छोड़कर उन्होंने शतक जमाते हुए अगले मैच में भारत को जीत दिलाई थी.

इसके बाद कोहली 2008 में फिर सुर्खियों में आए जब उनकी कप्तानी में भारत ने मलेशिया में खेले गए अंडर 19 क्रिकेट वर्ल्ड कप का खिताब अपने नाम किया. इस टूर्नामेंट के छह मैचों में 47 की औसत से उन्होंने कुल 235 रन बनाए. यह आंकड़ा तब और बड़ा लगने लगता है जब पता चलता है कि वे चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करने आते हैं.

सचिन तेंदुलकर से विराट कोहली की तुलना करने की स्वाभाविक वजहें बनती हैं. पूर्व क्रिकेटर रवि शास्त्री को लगता है कि करियर के इस मोड़ पर तो सचिन और वेस्टइंडीज के महान क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स भी इतना बढ़िया नहीं खेल रहे थे. सुनील गावस्कर और पूर्व आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज डीन जोंस सहित कई लोग कह चुके हैं कि क्रिकेट के एकदिनी संस्करण के मोर्चे पर कोहली तेंदुलकर के रिकॉर्ड तोड़ सकते हैं. कोहली का प्रदर्शन भी इसकी झलक देता है. सचिन ने अपना पहला वनडे शतक 79 पारियां खेलने के बाद लगाया था. इन 79 पारियों में उन्होंने 32.41 की औसत से 2,236 रन बनाए थे और उनका स्ट्राइक रेट था 78.48. उधर, विराट कोहली 79 पारियों के बाद 47.57 की औसत से कुल 3,233 रन बना चुके थे. उनके शतकों की संख्या नौ हो चुकी थी और स्ट्राइक रेट था 84.88.

कोहली बीते महीने ही 25 साल के हुए हैं और एकदिवसीय मैचों में उनका रिकॉर्ड बता रहा है कि अभी ही वे खेल के इस प्रारूप में शतकों की संख्या के मामले में तीसरे नंबर पर पहुंच गए हैं. उनसे आगे बस तेंदुलकर और गांगुली हैं. 120 मैचों की 114 पारियों में वे कुल 17 शतक और 27 अर्धशतक जमा चुके हैं. इससे पहले सबसे तेजी से 17 शतकों के आंकड़े तक पहुंचने वाले सौरव गांगुली थे जिन्होंने यहां तक पहुंचने के लिए कोहली से 58 पारियां ज्यादा खेली थीं. 5000 रनों के आंकड़े तक सबसे तेजी से पहुंचने का रिकॉर्ड भी पिछले ही दिनों उनके नाम हो गया है. कोहली का औसत 52 से ज्यादा है और 52 गेंदों पर शतक ठोककर भारत की तरफ से एकदिवसीय क्रिकेट में सबसे तेज सैकड़ा ठोकने का रिकॉर्ड भी उनकी झोली में आ चुका है. बीते अक्टूबर में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्होंने यह कारनामा किया. अब तक यह रिकॉर्ड सहवाग के नाम था. फिलहाल वे एकदिवसीय क्रिकेट में बल्लेबाजों के लिए बनी आईसीसी की सूची में शीर्ष पर हैं और बहुत-से लोग मानते हैं कि अगर वे तेंदुलकर जितने मैच खेल गए तो अपने प्रेरणास्रोत के तमाम रिकॉर्ड पीछे छोड़ देंगे. हाल ही में जब ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एकदिवसीय शृंखला में उन्होंने दो शानदार शतक जड़े तो इयान चैपल ने कहा कि उन्हें 1998 में शारजाह में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ही जड़े गए तेंदुलकर के दो शतकों की याद आ गई.

टेस्ट मैचों में भी कोहली की प्रगति असाधारण है. खेल के इस प्रारूप को वे अपनी पहली पसंद भी बताते हैं. 2011 में पहला टेस्ट खेलने वाले कोहली अब तक कुल 18 मैचों में करीब 42 की औसत से 1,178 रन बना चुके हैं. इस दौरान उन्होंने चार शतक और छह अर्धशतक लगाए हैं. क्रिकेट के सबसे नए संस्करण टी20 में भी उनकी प्रतिभा दिखी है. अब तक 21 मैचों में 34.50 की औसत से वे कुल 587 रन बना चुके हैं. आईपीएल और चैंपियंस लीग में भी उनका प्रदर्शन असरदार रहा है.

यह सब कुछ इतनी जल्दी हुआ है कि अविश्वसनीय लगता है. कोहली भी कई बार कह चुके हैं कि कभी-कभी वे भी अचानक यह सोचने लगते हैं कि क्या यह सब उन्होंने ही किया है. बल्लेबाजी की उनकी शैली भी अनोखी है. अपनी आक्रामक बल्लेबाजी के लिए विख्यात वीरेंद्र सहवाग जोखिम की बिल्कुल भी परवाह न करने के लिए जाने जाते रहे हैं. जानकार मानते हैं कि इस गुण की वजह से उन्होंने बड़े स्कोर तो बनाए लेकिन उनकी फॉर्म में निरंतरता का अभाव दिखता रहा. उधर, एक और विध्वसंक बल्लेबाज धोनी की शैली दूसरी है. वे भी आक्रामक हैं, लेकिन वे अपनी ताकत आखिरी समय के लिए बचाकर रखते हैं. वे जिस नंबर पर खेलते हैं उसमें संकट की स्थिति यही होती है कि शुरुआती चार खिलाड़ी जल्द ही आउट हो जाएं. ऐसे में धोनी आउट न होकर स्थिति के स्थिर होने का इंतजार करते हैं, धीरे-धीरे गेंदबाज की घबराहट बढ़ाते हैं और फिर आखिरी वक्त में एक्सीलेटर दबा देते हैं. लेकिन कोहली इसके उलट हैं. वे हालात के बदलने का इंतजार नहीं करते. वे खुद ही हालात को बदल देते हैं. वे पहली ही गेंद से विध्वंसक हो जाते हैं और ऐसा करते हुए वे कहीं भी जोखिम लेते हुए नहीं दिखते. क्रिकेट की शास्त्रीय परंपरा से परिपूर्ण शॉट लगाते कोहली का विध्वंस बहुत शांति भरा दिखता है. उन्हें खेलते हुए देखकर शायद ही दर्शकों की सांस कभी हलक में अटकी हो. ठोस तकनीक उनके खेल को बहुत आश्वस्तकारी बनाती है. आंकड़े बताते हैं कि भारत ने लक्ष्य का पीछा करते हुए जो सबसे बड़ी 10 जीतें हासिल की हैं उनमें से पांच कोहली के टीम में आने के बाद आई हैं और इनमें से चार में कोहली ने अहम भूमिका अदा की है. उनके रहते हुए भारत ने जो मैच जीते हैं उनमें कोहली का औसत करीब 68 रहा है जो धोनी के करीब 74 के औसत से थोड़ा ही कम है. लक्ष्य का पीछा करते हुए उन्होंने 11 शतक बनाए हैं और उन सभी मैचों में भारत जीता है. शायद इसीलिए वे सबसे अच्छे ‘फिनिशरों’ की लिस्ट में शामिल हो गए हैं.

यह तो हुई बल्लेबाजी की बात. इसके अलावा कोहली एक बहुत अच्छे फील्डर भी हैं. क्रिकेट में एक कहावत है कि रन बचाए यानी रन बनाए. 30 यार्ड के घेरे में कोहली की मौजूदगी एक आश्वस्ति जगाती है. कई मौकों पर उनके सीधे थ्रो या असाधारण कैच ने जमे हुए बल्लेबाज को वापस पवेलियन भेजा है.

साफ है कि बल्लेबाजी और फील्डिंग की कसौटी पर कोहली पूरी तरह खरे उतरते हैं. अब बाकी खिलाड़ियों से सामंजस्य और नेतृत्व क्षमता की बात. भारतीय क्रिकेट का इतिहास बताता है कि यहां गुटबाजी और खिलाड़ियों का आपसी टकराव कोई नई बात नहीं है. दो बड़े खिलाड़ियों में न पटने के कई किस्से हैं. कभी सुनील गावस्कर और कपिल देव की आपसी खुन्नस के चर्चे हुआ करते थे. हाल के दिनों में धोनी और वीरेंद्र सहवाग के बीच टकराव की खबरें भी आम हो गई थीं. लेकिन कोहली और धोनी में कहीं से ऐसा नहीं लगता. धोनी खुलकर कोहली की तारीफ करते हैं और कोहली धोनी की. एक हालिया साक्षात्कार में कोहली का कहना था, ‘धोनी से मैं बहुत कुछ सीख रहा हूं और वे सबक मैदान पर भी आजमा रहा हूं.’ उधर एक दूसरे साक्षात्कार में धोनी का कहना था, ‘कोहली एक असाधारण खिलाड़ी हैं. उनकी शैली देखकर लगता है कि कैसी भी परिस्थिति हो, बल्लेबाजी बहुत आसान होती है.’ दूसरे खिलाड़ियों के साथ उनका सामंजस्य भी ऐसा ही है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हालिया एकदिवसीय सीरीज के आखिरी मैच में रोहित शर्मा के साथ हुई एक संवादहीनता की वजह से कोहली बिना खाता खोले ही आउट हो गए थे. उन्हीं रोहित शर्मा ने जब मैच में दोहरा शतक ठोका तो सबसे ज्यादा खुशी कोहली के चेहरे पर ही दिख रही थी.

फिलहाल वे भारतीय टीम के उपकप्तान हैं. बीती जून-जुलाई में पहले वेस्टइंडीज में हुई त्रिकोणीय श्रृंखलीय और फिर जिंबाब्वे दौरे में धोनी की गैरमौजूदगी में उन्होंने कप्तानी भी संभाली. टीम ने श्रृंखला भी जीती और जिंबाब्वे को 5-0 से भी धोया. 2008 में अंडर 19 विश्व कप भारत ने उनकी ही कप्तानी में जीता था. ज्यादातर लोग मानते हैं कि वे भविष्य के कप्तान हैं. धोनी भी उनकी तारीफ करते हुए कई बार कह चुके हैं कि विराट कोहली कप्तान बनने की राह पर हैं.
लेकिन कई बार भविष्यवाणियां भी धरी रह जाती हैं. बहुत-से उदाहरण हैं जो बताते हैं कि करियर के शुरुआती दौर में बहुत प्रतिभाशाली दिखने वाले खिलाड़ी आगे जाकर वह ताल कायम नहीं रख पाए. दस साल पहले तक अमेरिका के ब्रायन बेकर के बारे में माना जा रहा था कि वे लॉन टेनिस की दुनिया में अगला बड़ा नाम होने वाले हैं. अपने वक्त में अजित अगरकर एकदिवसीय क्रिकेट में 50 विकेटों के आंकड़े तक सबसे तेजी से पहुंचने वाले गेंदबाज बन गए थे. इरफान पठान की तुलना वसीम अकरम से होने लगी थी. विनोद कांबली भी असाधारण प्रतिभा के धनी माने जाते थे. लेकिन ये सारे नाम आगे चलकर उन उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके जो उनसे लगाई गई थीं.

इसके कई कारण होते हैं. चोटें, अभ्यास या फिटनेस की उपेक्षा और अनुशासनहीनता भी. ब्रायन बेकर पर कूल्हे और कोहनी की सर्जरियों ने ऐसा कहर ढाया कि बीच में वे छह साल तक एक भी मैच न खेल सके. इरफान पठान को भी चोटों ने काफी परेशान किया. उधर, शोएब अख्तर और एस श्रीसंत जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों पर अनुशासनहीनता का ग्रहण लगा.

विराट कोहली इस मोर्चे पर काबू में दिखते हैं. उनकी फिटनेस का ही नतीजा है कि वे इस दौर के सबसे अच्छे फील्डरों में शुमार होते हैं. वैसे इस मामले में खुद से भी बेहतर वे सचिन तेंदुलकर को बताते हैं. कोहली का मानना है कि तेंदुलकर फिटनेस का प्रतिमान हैं और उन्होंने 40 की उम्र तक भी फिटनेस का जो स्तर बनाकर रखा है, उसी से उन्हें प्रेरणा मिलती है. यानी वे बिल्कुल सही राह पर हैं. शुरुआत में कोहली के आक्रामक रवैये और देर रात तक चलने वाली आईपीएल पार्टियों में उनकी मौजूदगी पर भी सवाल खड़े किए गए थे. 2012 में ऑस्ट्रेलिया में एक मैच के दौरान हूटिंग करते दर्शकों को उंगली दिखाने के लिए भी उनकी आलोचना हुई और जुर्माने के तौर पर उनकी मैच फीस भी कटी. लेकिन बीते कुछ समय के दौरान उनके साक्षात्कार गौर से देखें तो अब वे काफी बदले हुए नजर आते हैं. वक्त के साथ उनमें आई परिपक्वता साफ दिखती है. वे मानते हैं कि जब उम्र कम होती है तो आदमी को बहुत-सी चीजों की समझ नहीं होती लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ में आ गया है कि मर्यादा में रहना महत्वपूर्ण है. हालांकि वे अपनी आक्रामकता को सही ठहराते हैं. उनके मुताबिक हर इंसान की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं. रिकी पॉन्टिंग या विव रिचर्ड्स भी अपने दौर में विरोधी टीम पर बैट और व्यवहार दोनों तरह से हमलावर रहते थे और ये दोनों ही क्रिकेट के महान खिलाड़ियों की सूची में शामिल हैं. कोहली यह भी कहते हैं कि उनका एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखना उनके पांव जमीन पर रखने में उनकी मदद करता है. वे मानते हैं कि अतीत में उनसे गलतियां हुईं लेकिन वे उनसे सबक सीखकर आगे बढ़ना चाहते हैं.

उन्होंने ऐसा किया भी है. वक्त के साथ उनसे ज्यादा उनका प्रदर्शन उनके बारे में बोलने लगा है. बचपन के दिनों से कोहली के कोच राजकुमार शर्मा मानते हैं कि सहज आत्मविश्वास और असाधारण प्रतिभा उनमें शुरू से ही रही है. पूर्व क्रिकेटर कृष्णामाचारी श्रीकांत के मुताबिक इन गुणों में परिपक्वता के मेल ने कोहली के खेल को एक अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया है.

इसलिए आश्चर्य नहीं कि दुनिया उनके पीछे है. खेल से जुड़े सामान बनाने वाली मशहूर कंपनी एडिडास के साथ उन्होंने हाल ही में तीन साल के लिए 10 करोड़ रु सालाना फीस के साथ एक अनुबंध किया है और खबरों के मुताबिक विज्ञापनों से होने वाली कमाई के मामले में अब वे तेंदुलकर और धोनी से भी आगे निकल गए हैं. कोहली 13 उत्पादों के ब्रांड एंबेसडर हैं. डियोड्रेंट से लेकर सीमा सुरक्षा बल तक तमाम विज्ञापनों में उनका चेहरा दिखता है. इसका एक कारण मैदान पर उनका प्रदर्शन है और दूसरा यह माना जाता है कि वे किसी पेशेवर मॉडल और अभिनेता से कम नहीं लगते. दरअसल विज्ञापन किसी चॉकलेट का हो या शैंपू का, कोहली की मौजूदगी के अलावा उनका अभिनय भी उसे प्रभावशाली बनाता है. इसके बारे में पूछने पर वे चुटकी लेते हुए कहते हैं कि उन्हें शूटिंग के सिलसिले में सेट पर लंबा वक्त बिताना अच्छा नहीं लगता इसलिए वे पूरी कोशिश करते हैं कि रीटेक न हो और शायद यही चीज उनकी एक्टिंग को सहज बना देती है. हालांकि उनकी नजर में विज्ञापनों का उतना महत्व नहीं है. एक हालिया साक्षात्कार में वे कहते हैं, ‘मैं जानता हूं कि यह सब मेरे प्रदर्शन की बदौलत है, इसलिए मैं उस पर ज्यादा ध्यान देता हूं. विज्ञापन मेरे लिए बोनस की तरह हैं.’

कहें वे कुछ भी, बाजार उनके पीछे भाग रहा है. क्रिकेट के कारोबारी पहलुओं पर अपने आकलन के लिए चर्चित ब्रिटिश पत्रिका स्पोर्ट्सप्रो ने साल 2013 के लिए ऐसे 50 खिलाड़ियों की सूची बनाई है जो प्रचार के लिए सबसे मुफीद हैं. कोहली इसमें 13वें स्थान पर हैं और वे रफेल नाडाल और मारिया शारापोवा जैसे दिग्गजों से भी आगे हैं. कुछ समय पहले विख्यात अंतरराष्ट्रीय फैशन पत्रिका जीक्यू ने उन पुरुषों की सूची में उन्हें दुनिया में तीसरे नंबर पर रखा था जिनका वस्त्र विन्यास बहुत आकर्षक माना जाता है. पत्रिका का कहना है कि कोहली भारत में जितना अपनी बल्लेबाजी के लिए जाने जाते हैं उतना ही अपनी स्टाइल के लिए भी. इस सूची में अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा भी हैं.

लेकिन क्या यह सर्वगुणसंपन्नता उन्हें सचिन तेंदुलकर के पार ले जा सकती है?

दरअसल नायकों के उभरने में उनकी योग्यता के साथ-साथ परिस्थितियों का भी योगदान होता है. योग्यता पर किसी शक-शुबह की गुंजाइश रही नहीं, इसलिए इस सवाल का ठीक-ठीक जवाब पाने के लिए इसे दूसरी तरह से पूछा जाना चाहिए. क्या आज हमारे देश में ऐसी परिस्थितियां हैं जो सचिन जैसे किसी दूसरे महानायक के उभार को मदद दे सकें?

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कीर्तिमानों का सिलसिला

एकदिवसीय क्रिकेट में सबसे तेजी से 5000 रन

एकदिवसीय क्रिकेट में सबसे तेजी से 17 शतक के आंकड़े तक पहुंचने वाले बल्लेबाज

पिछले तीन साल के दौरान एकदिवसीय मैचों में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले भारतीय बल्लेबाज

2012 में टेस्ट मैचों में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले भारतीय बल्लेबाज

पाकिस्तान के खिलाफ एकदिवसीय मैचों में सबसे बड़ा स्कोर (183) बनाने वाले बल्लेबाज

एकदिवसीय मैचों में दो बार लगातार पांच मैचों में 50 या उससे ज्यादा रन बनाने वाले एकमात्र खिलाड़ी[/box]

1990 के पूर्वार्ध में जब सचिन का उदय हुआ तो परिस्थितियां भी जैसे एक महानायक का इंतजार ही कर रही थीं. 1983 में भारत के विश्वकप जीतने के बाद देश में एकदिवसीय क्रिकेट की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई थी. यह ऐसा समय भी था जब सार्वजनिक उपलब्धियों के नाम पर गर्व करने लायक चीजें या तो खत्म हो चुकी थीं या हो रही थीं. हॉकी का स्वर्णिम काल बीत चुका था और अब वह पतन की ओर जा रही थी. 1980 में बैडमिंटन के शिखर पर पहुंचे प्रकाश पादुकोन ढलान पर थे. टेनिस में विजय अमृतराज काफी उम्मीदें पैदा करने के बाद हाशिये पर जा रहे थे. शतरंज में विश्वनाथन आनंद का तब तक उदय नहीं हुआ था. खुद क्रिकेट में ही दिग्गज बल्लेबाज सुनील गावस्कर रिटायर हो चुके थे और दूसरे दिग्गज कपिल देव अपने करियर के आखिरी और सूखे दौर में थे. राजनीति लोगों का विश्वास खो चुकी थी, साहित्य, कला, संगीत, नृत्य जैसी विधाओं की लोकप्रियता बहुत सीमित थी और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में भारतीय प्रतिभा का कोई बड़ा दखल नहीं दिख रहा था. उस दौर में बड़ी हो रही पीढ़ी के सामने कोई नायक उपलब्ध था तो वह या तो सिनेमा का हीरो था या क्रिकेटर. ऐसे समय में तेंदुलकर आए. उनकी प्रतिभा ने उस समय की पीढ़ी में एक नया आत्मविश्वास भरा. उसे यकीन दिलाया कि वह बेहिचक पश्चिम से लोहा ले सकती है. एक शिक्षक पिता की इस संतान की सफलता में मध्यवर्गीय भारत ने अपनी सफलता देखी. अपने समय की पीढ़ी को क्रिकेटरों ने अंतरराष्ट्रीय पहचान का भरोसा दिलाया और सचिन तेंदुलकर इस चलन के अगुवा बने.

इत्तेफाक से यह वही दौर था जब देश का बाजार दुनिया के लिए खुल रहा था. अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को यहां पैठ और पहचान बनाने के लिए अपने नायकों और प्रतीकों की जरूरत थी. सचिन के रूप में उन्हें ऐसा आदर्श मिला. बाजार ने क्रिकेट को हाथों-हाथ लिया और उसे अपनी जरूरतों के हिसाब से बदला भी. क्रिकेट देश का दूसरा धर्म बन गया और सचिन इसके देवता. 24 साल के करियर में वे लगभग विवादमुक्त रहकर क्रिकेट खेलते रहे. वे मैदान में हों या उससे बाहर, उनका प्रदर्शन और व्यवहार सबके लिए आदर्श बना रहा. मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार सचिन के बारे में कहा था, ‘देश चाहता है कि सपूत हो तो तेंदुलकर जैसा, टीम चाहती है कि खिलाड़ी हो तो सचिन जैसा, माता-पिता चाहते हैं कि बेटा हो तो तेंदुलकर जैसा, गुरु चाहते हैं कि शिष्य हो तो तेंदुलकर जैसा और अब तो बेटा-बेटी चाहते हैं कि पापा हों तो तेंदुलकर जैसे.’

लेकिन आज हालात बदल गए हैं. उसी बाजार का क्रिकेट में हद से ज्यादा दखल हो गया है. नतीजा यह है कि अब बहुत-से लोग क्रिकेट को खेल की तरह नहीं बल्कि किसी तमाशे की तरह देख रहे हैं. उन्हें जैसे बस कुछ ओवरों की सनसनी और आइटम गर्ल्स की तरह आने-जाने वाली चीयरलीडर्स से मतलब है. एक खेल के रूप में क्रिकेट की शास्त्रीयता और नैतिकता पीछे छूट गई है. इसी दौर में क्रिकेट ने टीमों के मालिक देखे हैं और खिलाड़ी जैसे उनके जरखरीद गुलाम दिखते हैं. तिस पर आईपीएल जैसे आयोजनों में फिक्सिंग की घटनाएं कोढ़ में खाज बनकर आई हैं. बहुत-से लोग मानने लगे हैं कि खिलाड़ी गेंद और बल्ले से कविता रचने वाले देवता नहीं, महज पैसे के पीछे भागने वाले इंसान हैं. और यहीं क्रिकेट का वह जादू टूट रहा है जो इसे जुनून और धर्म में बदलता है. यह बात सिर्फ खेल विशेषज्ञ नहीं कह रहे. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) भी इसे मानती है. 2011 में आई उसकी एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता में लगातार गिरावट आ रही है, खासकर वनडे और टेस्ट क्रिकेट की. टी-ट्वेंटी का हाल भी खास जुदा नहीं है. इस गिरावट की गवाही खाली स्टेडियम और ओवरों के बीच में आते बगैर विज्ञापन वाले ब्रेक भी दे रहे हैं. यह कुछ साल पहले सोचा भी नहीं जा सकता था. यानी निश्चित तौर पर लोगों का धर्म और उसके देवताओं पर से भरोसा उठ रहा है.

ऐसे में क्या विराट कोहली तेंदुलकर जैसा नायकत्व हासिल कर पाएंगे?

दिग्गज क्रिकेटर ब्रायन लारा सहित तमाम लोग मानते हैं कि जीनियस जो खाली जगह छोड़ते हैं उसे कभी नहीं भरा जा सकता. हाल ही में लारा का कहना था कि विराट कोहली भले ही एकदिवसीय क्रिकेट में असाधारण रूप से खेल रहे हैं लेकिन उनसे आप जब भी क्रिकेट की बात करेंगे तो वे सबसे पहले सचिन की बात करेंगे. सचिन जब आए थे तो जिन दूसरे नायकों, यानी राहुल द्रविड़ और सचिन गांगुली के साथ उनकी तिकड़ी बननी थी, उन्हें आने में छह-सात साल बाकी थे. यानी उनके सामने खाली मैदान था. विराट कोहली के साथ टीम में धोनी जैसे कप्तान हैं और रोहित शर्मा, शिखर धवन और चेतेश्वर पुजारा जैसे साथी भी जो पिछले कुछ समय से लगभग उन जैसा ही खेल रहे हैं.

और मसला सिर्फ यही नहीं है. एक खेल के रूप में क्रिकेट का संतुलन भी डगमगाया है. महेंद्र सिंह धोनी सहित तमाम लोग चिंता जता चुके हैं कि यह संतुलन अब बल्लेबाजों के पक्ष में झुका दिखता है. यही वजह है कि एकदिवसीय क्रिकेट में 300 या 350 जैसे स्कोर बनना और उनका सफलता से पीछा अब मुश्किल नहीं बल्कि आम हो चुका है. विराट कोहली से जुड़ी एक खबर पर टिप्पणी करते हुए ठाणे के इम्तियाज लिखते हैं, ‘मुझे विराट कोहली की योग्यता पर शक नहीं, लेकिन फैब फोर (तेंदुलकर, गांगुली, द्रविड़ और लक्ष्मण) से उनकी तुलना न करें. वे उनके नजदीक भी नहीं ठहरते. मेरा मतलब यह है कि अब वैसे गेंदबाज कहां हैं? क्या आज मैकग्राथ, वसीम अकरम या वकार यूनुस के मुकाबले का कोई गेंदबाज है? फैब फोर के जमाने की तुलना में रन बनाना आज ज्यादा आसान है.’

तो क्या विराट कोहली कभी सचिन तेंदुलकर जैसे महानायक नहीं बन सकते?

आधुनिक सांस्कृतिक इतिहास के संस्थापकों में से एक माने जाने वाले जॉन ह्यूजिंगा ने कहा था कि खेल मानव समाज के लिए इसलिए अहम है क्योंकि उसमें एक सीख छिपी है. खेल के कुछ नियम होते हैं और उन नियमों की सीमा में रहकर खिलाड़ियों को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होता है. नियमों में ही खेल का जादू छिपा है कि ये नियम खेल को जीवन जैसा बनाते हैं. इनसे जो बाधाएं पैदा होती हैं उनमें आम इंसान अपने जीवन की मुश्किलें देखता है. और जब खिलाड़ी इन मुश्किलों से लोहा लेते हुए विजयी होता है तो रोज की जिंदगी में कई पराजयें झेलते आदमी को उसमें अपनी भी जीत दिखती है. इसीलिए अच्छे खिलाड़ी समाज के नायक बनते हैं और नियम तोड़ने वाले खिलाड़ी खलनायक भी. इंसानी समाज भी नियमों से चलता है जिन्हें मूल्य कहते हैं. लोग इनकी मर्यादा में रहकर अपना सबसे अच्छा प्रयास करें तो जीवन जादू बन जाता है. जब तक इंसानी सभ्यता है तब तक खेल की महत्ता रहेगी और इसलिए महानायकों के उभरने की संभावना भी.

यानी कोहली अगले और अपनी तरह के महानायक तो हो ही सकते हैं. अपने खांटी दिल्ली वाले अंदाज में वे कहते भी हैं कि वे बस अच्छा खेलना चाहते हैं, इतना अच्छा कि जब क्रिकेट छोड़ें तो लोग कहें कि खेलो तो इस बंदे जैसा.

 

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