विकास के दावे संदेह के घेरे में

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भारत सरकार मानती है कि देश में बड़ी तादाद में शेल कंपनियां हैं इनका किसी को अता-पता नहीं है। लेकिन इनकी छानबीन अब होगी बता रहे हैं भारत हितैषी

शेल कंपनियां और  सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) स्टेटिस्टिक एंड प्रोग्राम इंपलीमेंटेंशन मंत्रालय ने साफ तौर पर बताया है कि ऐसी कंपनियां हैं जो पंजीकृत हैं औरउनकी शेल कंपनियां हैं जिनकी जानकारी बहुधा गलत होती है।

म्ंात्रालय ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि कारपोरेट मामलों के डाटाबेस (मिनिस्ट्री ऑफ कारपोरेट अफेयर्स एमसीई) ने राष्ट्रीय लेखा अनुमानों की तैयारी और74 वीं एनएसएस राउंड की महत्वपूर्ण तकनीकी रपट जारी की है।

आरोप हैं कि एक तिहाई गैर सरकारी, गैर वित्तीय कंपनियां जो सेवा क्षेत्र में हैं  उनका कोई अता-पता मिल ही नहीं रहा है। यह जानकारी अभी हाल में मिले नेशनलसैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) की 2016-17 की रपट में भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में अनुमान है कि ऐसी कंपनियां शेल, जाली, बोगस कंपनियां हो सकती हैं जोएमसीए -21 डाटाबेस में सक्रिय कंपनियों में शामिल थी जिससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का पता लगाना था। नई पड़ताल से यह अंदेशा है कि निजी कारपोरेटक्षेत्र में जीडीपी का वर्तमान तौर पर ज़्यादा अनुमान लगाया जा रहा है।  जिससे विकास के सरकारी दावे पर संदेह होता है।

हालांकि आज जीडीपी के आधे से ज़्यादा हिस्से में सर्विस क्षेत्र में जो आउटपुट अनुमान है वह काफी कम है। सार्वजनिक क्षेत्र के बाहरी अनुमान खासे कम हैं जोसार्वजनिक क्षेत्र और बड़ी निजी कंपनियों के मुकाबले काफी पीछे हैं।

इस कमी को पूरा करने के लिए सीएसओ सर्विसेज का एक सालाना सर्वे (एएसआई की तर्ज पर) करा रहा है। इसके पहले कदम के तौर पर एनएसएसओ ने गैरसरकारी और गैर वित्तीय कंपनियों और 2016-17 में तीन फ्रेम बनाकर काम शुरू किया। इसके तहत (या तो यूनिवर्सेस ऑफ एंटरप्राइेजेज) सर्वे के लिए एमसीएसैंपल तैयार किए गए। इसमें एमसीए सैंपल सबसे बड़ा होता था। दस फीसद नमूना सीएसओ के यूनिवर्स के तहत साढ़े तीन लाख सक्रिय गैर वित्तीय कंपनियांमिली। जब एनएसएसओ ने पूरे ब्यौरे की पड़ताल की तो उसे निराशा हाथ लगी। उसे जानकारी मिली कि 45 फीसद चुनी गई कंपनियों ने तो सर्वे में भाग लेना हीपसंद नहीं किया।

सर्वे की परेशानियां

एनएसएसओ की रिपोर्ट के अनुसार एमसीए इकाइयों में 45 फीसद की तो सर्वे के बाहर कैजुएलिटी बताया गया। इस सर्वे में अधिकांश इकाइयों का हाल बुरादिखा। यह कंपनियों के जवाब न देने, यूनिट के बंद होने, यूनिट के कवरेज एरिया से बाहर होने या उनके न मिल पाने की वजहें थीं।

जो हो मंत्रालय का कहना है कि एनएसएसओ ने 35,456 कंपनियों को बतौर नमूना लिया। (संदर्भ आधार था 2013-14) और इन कारपोरेट के पास जानकारी हेतुअधिकारी गए भी थे। ऐसी कंपनियां जो सर्विस क्षेत्र में नहीं थी और सीआईएन पर आधारित थी उन्हें अलग किया गया और सर्वे से बाहर रखा गया। जिससे ऐसा नेलगे कि ये कारपोरेट हैं ही नहीं।

आश्चर्य तो तब हुआ जब एनएसएसओ ने देखा  कि नतीजे तो निहायत खराब है। इससे पहले से तय दो खंड के नतीजों को रोकना पड़ा और संक्षेप में एक तकनीकीरिपोर्ट लगानी पड़ी जो अभी हाल प्रकाशित है: कई इकाइयां, खासकर एमसीए की सूची की इकाइयों की पहचान इसलिए नहीं हो सकी। खासकर एमसीए सूची कीक्योंकि पोस्टल एड्रेस पूरे नहीं थे। इसी कारण कई नोटिस सही जगह पर पहुंचे ही नहीं। इसके अलावा ऐसी ढेरों इकाइयां मिली जिनकी कोई छानबीन कभी हुई हीनहीं। कुछ की छोटी सी तकनीकी रपट ज़रूर मिली जिसे अभी हाल जारी किया गया था। इसमें यह यह माना गया कि एनएसएसओ को इस सर्वे के दौरान किनपरेशानियों से गुजरना पड़ा। कई इकाइयां खासकर जो एमसीए की सूची में थीं उनकी पहचान नहीं की जा सकी क्योंकि वास्तविक डाक के पते ही नहीं थे। इसकेचलते बहुत सारे नोटिस उचित जगह नहीं पहुंचे। एक बड़ी संख्या उन इकाइयों की मिली जो आउट ऑफ कवरेज इकाइयां थी। वे अलबत्ता मिली । इन इकाइयों परधारा 2.35 के आधार पर दस्तख्त नहीं लिए गए क्योंकि इसमें समय लगता और जो मालिक थे वे भी दस्तख्त करने पर सहज राजी नहीं थे। कई मामलों में तो यह भीदेखा गया कि चुने गए उद्योगपतियों ने सलाना आडिट रपट 2015-16 के लिए तैयार ही नहीं की थी साथ ही 2015-16 की कोई बैलेंस शीट ही पहले कभी बनी।

शेल कंपनियां

ऐसा सोचा जा सकता है कि ऐसी कंपनियां जाली हो सकती हैं। जो सिर्फ पेपर पर कानूनी तौर पर ही हैं न तो वे कोई माल उत्पादित करती हैं और न ही कोई सेवाकार्य। फिर जीडीपी के उल्लेख में इनका क्या उपयोग?

ऐसा माना जाता है कि शेल कंपनियां दो वजहें बताती हैं- एक शेल कंपनियों से अर्थव्यवस्था में एक वेल्यू आती है। उसके घट जाने से जीडीपी पर असर दिखता है।दूसरे सभी सक्रिय कंपनियां जो अपना ऑडिट किया हुआ तीन साल में एक बार भेजती ही हैं। शेल कंपनियों का योगदान एमसीए डाटाबेस में है।

दोनों ही तर्कोंे पर सवाल उठते हैं। शेल कंपनियां कोई माल उत्पादित नहीं करती और कोई सेवा का काम भी नहीं करती। वे मालिक का लाभ छिपाने या घाटादिखाने में मदद अलबत्ता करती हैं। यानी एक कंपनी जिसकी मालिक दूसरी कंपनी है और इसका इस्तेमाल तरह से खासतौर पर गलत इस्तेमाल में होता है।

एक तर्क यह भी है कि तमाम सक्रिय कंपनियां एमसीए के तहत पिछले तील साल का हिसाब-किताब एक बार जमा करती हैं हालांकि यह भी नौकरशाही का बनायागया झूठ है। यदि यह सही माना जाए तो सात-आठ लाख कंपनियां जो पहले कभी सक्रिय नहीं थी, सक्रिय दिखेंगी। एक डाटा के अनुसार सात आठ लाख कंपनियांऐसी ही हैं।

जीडीपी को क्षति

एनएसएसओ के सर्विस सेक्टर के सर्वे में 45 फीसद की तो पहचान इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि शेल, बोगस कंपनियां थीं। एमसीए-21 के डाटा सेट की गुणवत्ताएकदम नहीं है। यह नई जीडीपी सिराज की आधार भी है। एनएसएसओ सर्वे के नतीजों से सवाल ज़्यादा उठे हैं, और दुहराव प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगे हैं।

याद करें तो 2004-05 के नेशनल एकाउंट्स की सिरीज पर आरबीआई में जो नमूना अध्ययन 2500 कंपनियों का किया और ग्रास वैल्यू एडेड सेविंग्स आदि काआकलन  तैयार किया जो प्राइवेट कारपोरेट सेक्टर (पीपीएस) के लिए था। इस नमूने का पेड-अप-कैपिटल (पीयूसी) के मानक से भी कंपनियों की कारगुजारी कीपड़ताल हुई। इस तरीके की अपनी सीमाएं थीं। फिर भी इसे एडवाइजरी कमेटी ऑन नेशनल एकांउट्स स्टेटिस्टिक्स (एसीएमएएस) ने लिया और नेशनल एकाउंट्सका अधार वर्ष 2011-12 माना। एक उप समिति (एसीएनएएस) के तहत गठित हुई।

जिसने एमसीए-21 कारपोरेट डाटाबेस  के तौर पर प्रयोग में लाने को कहा। यह तय पाया कि पीयूसी आधारित वैज्ञानिक तरीके से कंपनियों के नतीजों का जायजालिया जाए वह भी पहले संशोधित अनुमानित स्टेज के बाद। यह तरीका कंपनियों के लिए उचित माना गया। खास कर वे कंपनियां जो सक्रिय हों और उन्होंने नेशनलएकाउंट्स अनुमान के समय रिटर्न न दायर किया हो।

म्ंात्रालय ने तय किया कि यह सर्विस सेक्टर का सालाना सर्वे करेगी खास कर 2019-20 में। इसमें हासिल निष्कर्षों का इस्तेमाल नेशनल एकाउंट्स एस्टिमेट मेंकिया जा सकेगा।

कारपोरेट जो खारिज किए गए

74वें राउंड सर्वे का मकसद उन इकाइयों की पहचान था जो सर्विस सेक्टर में सक्रिय हैं और रेट्स और रेटियों को आउटपुट और इनपुट के आधार पर विभिन्नसर्विसेज में परखा जाए।

जब भी कोई कारपोरेट कारपोरेटस अफेयर्स मिनिस्ट्री में पंजीकृत होता है (एमसीए-21) उसे एक कारपोरेट पहचान नंबर (सीआईएन) दिया जाता है। अबसीआईएन में नेशनल इंडस्ट्रियल क्लासिफेशन (एनआईसी)कोड होता है। इस तरह एक कारपोरेट के पास सीआईएन आधारित एनआईसी कोड रजिस्ट्रेशन केसमय मिलता है। यानी एक कारपोरेट एक अलग एनआईसी कोड से आर्थिक कार्य कलाप कर सकता है। बहुत कम कारपोरेट हैं जो नवीनतम एनआईसी कोड केलिए अपना सीआईएन बदलवाती हैं। इसके अलावा कई कारपोरेट तो काम धंधा बंद भी कर देते हैं। पिछले कुछ साल में 6.3 लाख कारपोरेट गैर पंजीकृत हुए हैं।

एनएसएस टेक्निकल रिपोर्ट जो एनएसएस राउंड में 74वीं हैं। उसे समझने की कोशिश इसी संदर्भ में करनी चाहिए। एनएसएस ने 35,456 कंपनियों (संदर्भ आधार2013-14) के नमूने लिए और कारपोरेट से संपर्क किया। ऐसी कंपनियां जो सक्रिय सेक्टर में सक्रिय नहीं थी पर अपने सीआईएन के जरिए काम कर रही थीं। उन्हेंअध्ययन की संभावना से बाहर कर दिया और उन्हें ‘आउट ऑफ  सर्वेÓ करार दिया। इसका मतलब यह नहीं है कि कारपोरेट है ही नहीं।

और जो मिले ही नहीं

कारपोरेट मामलों के मंत्रालय के सहयोग से 74वीं एनएसएस राउंड को ही आगे के काम का आधार माना गया और 35,456 कारपोरेट को इस नमूने में शामिलकिया गया। अगर ऊपर से देखें तो पाएंगे कि 74वें राउंड में तकरीबन 35,456 कंपनियोंं में से 34,834 , 86.6 फीसद कंपनियों ने अपने रिटर्न एमसीए डाटा बेस मेंदायर किए। इनमें 622 को ढूंढा भी नहीं जा सका। शायद सीआईएन में बदलाव के चलते। जीवीए अनुमान जो निजी कारपोरेट सेक्टर (पीसीए) है इसमें 4,235 इकाइयों का पता ही नहीं चल सका। ये 4,235 इकाइयां थी जो बताए गए 74वें राउंड में दिए गए पते पर नहीं मिली। जबकि 3,154 यूनिट ने एमसीए के पोर्टल परऑन लाइन रिटर्न भी दाखिल किए थे।

यानी कारपोरेट का एमसीए रिटर्न भरना तो एक रिवाज सा ही है। राष्ट्रीय एकाउंट्स एस्टिमेंट के अनुसार एक सहज प्रक्रिया है। एनएसएस की जो महत्वपूर्णजानकारियां हैं उसके तहत जब एनुअल सर्वे ऑफ सर्विस सेक्टर अमल में आएगा तो एनएसएस सर्वे से खासी जानकारी मिल सकेगी। तब नई रणनीति तैयार करनेमें सहयोग मिलेगा। इससे गुणवत्ता और भी सुधरेगी और बढ़ेगी।