वाराणसी, उत्तर प्रदेश

मोदी को पटखनी देने के लिए मुख्तार अंसारी भी बनारस सीट से अपनी किस्मत आजमाने वाले हैं. नेतागिरी से ज्यादा अपने आपराधिक कर्म कुकर्म के कारण पहचाने जाने वाले अंसारी पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी के चुनावी जोश को ठंडा कर पाने में काफी सफल रहे थे. उस चुनाव में जोशी मात्र 17 हजार वेटों से मुख्तार को हरा पाए थे. मुख्तार को इस बार उम्मीद है कि मोदी के कारण इस बार पूरा का पूरा मुस्लिम वेट उन्हीं की झोली में आ गिरेगा. ऐसे में थोड़ा बहुत इधर-उधर से वेट मिल गया तो भले ही वे चुनाव हार जाएं लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि व्यक्ति का कद इस बात से भी तय होता है कि उसका प्रतिद्दंदी कौन है, उसी तर्ज पर वे भी याद रखे जाएंगे.

कांग्रेस अभी ये तय नहीं कर पाई है कि बनारस से मोदी को उसका कौन सा सिपाही चुनौती देगा. हां, पिछले कुछ समय में कई नेताओं के नाम जरूर सामने आए हैं. राष्ट्रीय स्तर पर दिग्विजय सिंह से लेकर प्रियंका गांधी तक का नाम उछला. स्थानीय स्तर पर पार्टी के विधायक अजय राय से लेकर पूर्व सांसद विजय मिश्रा, काशी नरेश के भाई अभिभुषण सिंह से लेकर संकट मोचन मंदिर के महंत के बेटे तक को चुनावी मैदान में मोदी के सामने उतारने की चर्चा गर्म रही है.बनारस की राजनीति को जानने वाले बताते हैं कि कांग्रेस के लिए मोदी को बनारस में हराना तो लगभग नामुमकिन जैसा है लेकिन वह चाहे तो मोदी को अच्छी चुनौती जरूर दे सकती है. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वह कोई स्थानीय प्रत्याशी उतारे.

शरद कहते हैं, ‘अगर कांग्रेस बाहर से दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को लाकर मोदी के खिलाफ लड़ाएगी तो उसकी जमानत जब्त होना तय है. उसे स्थानीय नेता को खड़ा करना चाहिए. ऐसा करने पर वे सम्मानजनक लड़ाई जरूर लड़ पाएगी.’

लेकिन बनारस में कांग्रेस के पास ऐसा नेता कौन है ? पाठक कहते हैं, ‘अभी की स्थिति में अजय राय सबसे सही कैंडिडेट हो सकता है. अपने क्षेत्र में इस आदमी की छवि रॉबिनहुड की है. ये कांग्रेस की इज्जत बचा सकता है. बनारस में लोग इसे जानते और मानते हैं.’

सपा और बसपा ने ‘इस सीट पर दिमाग लगाना ही व्यर्थ है’ की तर्ज पर प्रत्याशी खड़ा कर दिया है.

भले आज बनारस में मोदी की जीत की संभावना ज्यादा प्रबल बताई जा रही है लेकिन पिछले पांच सालों में इस सीट पर भाजपा को लेकर जनता में एक तीखी नाराजगी की भावना भी है. हालाकि इसका लेना देना यहां भाजपा सांसद रहे मुरली मनोहर जोशी से है. स्थानीय लोग बताते हैं कि अगर इस बार भी पार्टी ने जोशी को टिकट दिया होता तो वे जरूर भयानक हार का सामना करते. बीएचयू से पीएचडी कर रहे सुजीत प्रताप सिंह कहते हैं, ‘वो आदमी इतना जनता से कटा रहता था जिसकी कोई सीमा नहीं है. इस दर्जे के वे पंडित जी थे कि जनता से नजर बचा के चलते थे कि कहीं दूसरे की नजरों से वे गंदे ना हो जाएं. अपने कार्यकाल में उन्होंने बनारस के लिए कुछ नहीं किया.’

बनारस के स्थानीय लोगों के साथ बीतचीत में ये बात सामने आती है कि हिंदुत्व के छौंक के साथ उसे सबसे अधिक उम्मीद इस बात की है कि मोदी आएंगे तो शायद इस ऐतिहासिक शहर की गलियों, सड़कों और मोहल्ले की सूरत बदलेगी. लोग बताते हैं कि कैसे कमलापति त्रिपाठी के बाद बनारस को कोई अच्छा सांसद नहीं मिला.

खैर, जिस तरह से बनारस में बहस देश के एक कदम आगे हो रही है. उसी के तहत ये चर्चा और आशंका भी सामने आ रही है कि बनारस और वड़ोदरा दोनों सीटें जीतने के बाद मोदी कहीं ‘बना रहे बनारस कहकर’ आगे न निकल लें.

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