वर्दी चाहे हमदर्दी

imgभारत नेपाल सीमा पर स्थित एक थाने के इंस्पेक्टर सुरेंद्र सिंह (बदला हुआ नाम) हाल ही में काफी परेशान थे. मामला एक बच्चे की हत्या का था. वैसे तो हत्या, लूट, डकैती आदि जैसे मामलों से पुलिसवालों को आए दिन ही दो-चार होना पड़ता है. लेकिन सिंह इसलिए मुश्किल में थे कि मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया था और जिस अपराधी पर हत्या का आरोप था वह नेपाल भाग गया था. वे बताते हैं, ‘नेताओं का दबाव एसपी पर पड़ा तो मुझे चेतावनी मिली कि एक सप्ताह में हत्यारे को पकड़ो या सस्पेंड होने के लिए तैयार रहो. कुर्सी बचानी थी लिहाजा नेपाल में कुछ लोगों से संपर्क कर अपराधी को भारत की सीमा तक लाने की व्यवस्था करवाई जिसमें करीब 70 हजार रुपए लग गए. इस काम में विभाग की ओर से एक पैसे की भी मदद नहीं मिली, पूरा पैसा मैंने खर्च किया. जो रुपया घर से खर्च किया है उसे किसी न किसी तरह नौकरी से ही पूरा करूंगा.’

इससे आगे सिंह की आवाज का लहजा धीमा और तल्ख हो जाता है. वे कहते हैं, ‘इन्ही वजहों से आम आदमी की नजर में हमारे विभाग के कर्मचारी सबसे भ्रष्ट हैं. लेकिन आप ही बताएं कि हम इधर-उधर हाथ न मारें तो पूरा वेतन सरकारी कामों में ही खर्च हो जाएगा और बच्चे भीख मांगने को मजबूर होंगे.’

यह पुलिस का वह चेहरा है जिसकी तरफ आम निगाह अमूमन नहीं जाती. दरअसल पुलिस शब्द जिन सुर्खियों में होता है उनके विस्तार में जाने पर भ्रष्टाचार, उत्पीड़न, ज्यादती, धौंस, शोषण आदि जैसे शब्द ही पढ़ने को मिलते हैं. लेकिन पुलिस के पाले में खड़े होकर देखा जाए तो पता चलता है कि कुछ और पहलू भी हैं जिनकी उतनी चर्चा नहीं होती जितनी होनी चाहिए, ऐसे पहलू जो बताते हैं कि वर्दी को सिर्फ आलोचना की ही नहीं, कई अन्य चीजों के साथ हमारी हमदर्दी की भी जरूरत है.

इनमें पहली जरूरत है संसाधनों की. जैसा कि आगरा में तैनात रहे एक थानेदार नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘हमारे यहां से एक बच्चे का अपहरण हो गया. सर्विलांस से पता चला कि अपहरणकर्ता बच्चे को राजस्थान लेकर गए हैं. बदमाशों का पता लगाने के लिए कई टीमों को लगाया गया. सभी टीमें निजी वाहनों से राजस्थान के शहरों की खाक छानती रहीं. सफलता भी मिली. लेकिन पूरे ऑपरेशन में 50 हजार से ऊपर का खर्च हुआ. गाड़ियों में डीजल डलवाने से लेकर टीम के खाने-पीने तक का जिम्मा थाने के मत्थे रहा. इसमें कुछ दरोगाओं ने भी अपने पास से सहयोग किया. आप ही बताइए, जिस पुलिस विभाग के कंधों पर सरकार ने गांव से लेकर शहर तक शांति, अपराध रोकने और लोगों के जानमाल की सुरक्षा का जिम्मा दे रखा है उसे क्यों इतना भी बजट और अन्य संसाधन नहीं दिए जाते कि वह किसी अपराधी को पकड़ने के लिए बाहर जा सके?’

यह अकेला उदाहरण नहीं. सब इंस्पेक्टर अजय राज पांडे के मुताबिक संसाधनों से जुड़ी दिक्कतें कई मोर्चों पर हैं. वे कहते हैं, ‘यदि कोई दरोगा या सिपाही किसी मुल्जिम को पकड़कर थाने लाता है तो मुल्जिम की खुराक का जिम्मा थाने का होता है. पूछताछ के बाद 24 घंटे में उसे न्यायालय में पेश करना होता है.  24 घंटे यदि मुल्जिम को थाने में रखा गया तो दो बार खाना तो खिलाना ही पड़ेगा. इसमें एक मुल्जिम पर कम से कम 40-50 रुपये खर्च हो जाते हैं. जबकि सरकार की ओर से हवालात में बंद होने वाले मुल्जिम की एक समय की खुराक पांच रुपये ही निर्धारित है. ऐसे में पुलिसकर्मी या तो अपनी जेब से 30-35 रुपये एक मुल्जिम पर खर्च करें या थाने के आसपास के किसी ढाबेवाले पर रौब गालिब कर फ्री में खाना मंगवा कर मुल्जिम को खिलाएं. पुलिस यदि फ्री में खाना मंगवाती है तो कहा जाता है कि वह वसूली कर रही है.  लेकिन अपने पास से खाना खिलाएंगे तो कितना वेतन घर जा पाएगा? इसके अलावा सब इंस्पेक्टर को गश्त के लिए सरकार की ओर से मात्र 350 रुपये महीना ही भत्ते के रूप में मिलता है. जिससे सिर्फ सवा छह लीटर तेल ही आ सकता है. जबकि एक सब इंस्पेक्टर प्रतिदिन गश्त में कम से कम डेढ़ लीटर तेल खर्च करता है.’

विभाग का जो कर्मचारी (सिपाही) सबसे अधिक भागदौड़ करता है उसे ईंधन के लिए एक रुपया भी नहीं मिलता. जैसा कि पांडे कहते हैं, ‘सिपाही को आज भी साइकिल एलाउंस ही मिलता है. यह हास्यास्पद है कि अपराधी एक ओर हवा से बातें करने वाली तेज रफ्तार गाड़ियों का इस्तेमाल कर रहे हैं और दूसरी ओर अधिकारी व सरकार इस बात की उम्मीद करते हैं कि सिपाही साइकिल से दौड़ कर हाइटेक अपराधियों को पकड़े. नाम न छापने की शर्त पर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) में तैनात एक कांस्टेबल बताते हैं कि अधिकारियों से लेकर दरोगा तक का दबाव होता है कि सिपाही भी ‘गुडवर्क’ लाकर दे. वे कहते हैं, ‘गुडवर्क के लिए गली-मोहल्लों की खाक छाननी पड़ती है जो साइकिल से संभव नहीं है. थाने में तैनात एक सिपाही भी गश्त के दौरान करीब 45 लीटर तेल महीने में खर्च कर देता है, जबकि उसे मिलता एक धेला भी नहीं. थानों में तैनात कुछ सरकारी मोटरसाइकलों को ही महीने में विभाग की ओर से तेल मिलता है. लेकिन इनसे केवल 8-10 सिपाही ही गश्त कर सकते हैं, शेष को अपने साधन से ही गश्त पर निकलना पड़ता है. ऐसे में नौकरी करनी है तो जेब से तेल भरवाना मजबूरी है.’ इसके अलावा पुलिस विभाग का सूचना-तंत्र काफी हद तक स्थानीय मुखबिरों पर ही निर्भर होता था. लेकिन चूंकि मुखबिरों को देने के लिए विभाग के पास अपना कोई फंड नहीं होता इसलिए अच्छे मुखबिर मिलना अब मुश्किल होता है. वही व्यक्ति अब पुलिस को सूचना देने में रुचि रखता है जिसका अपना कोई स्वार्थ हो.

पिछले वर्ष पुलिस विभाग से रिटायर हुए इंस्पेक्टर नरसिंह पाल बताते हैं, ‘कोई भी भ्रष्टाचार का आरोप बड़ी आसानी से लगा देता है, लेकिन भ्रष्टाचार के पीछे कारण क्या है, इसे जानने की कोशिश न तो अधिकारियों ने कभी की और न ही किसी सरकार ने. चाहे जिसका शासन हो, सबकी मंशा यही होती है कि अधिक से अधिक अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो. ठीकठाक अपराधियों पर एनएसए लगाने के लिए अधिकारियों का दबाव भी होता है. एक एनएसए लगाने में थानेदार का करीब तीन चार हजार रुपये खर्च हो जाता है. इस खर्च में 100-150 पेज की कंप्यूटर टाइपिंग, उसकी फोटो कॉपी, कोर्ट अप्रूवल और डीएम के यहां की संस्तुति तक शामिल होती है. पुलिस विभाग तक की फाइल जब सरकारी कार्यालयों में जाती है तो बिना खर्चा-पानी दिए काम नहीं होता. यह खर्च भी थानेदार को अपनी जेब से देना पड़ता है.’

पूर्वी उत्तर प्रदेश में तैनात एक डीआईजी कहते हैं, ‘विभाग में हर कदम पर कमियां हैं. योजनाओं को ही लीजिए. सरकार योजना शुरू तो कर देती है लेकिन उसे चलाने के लिए भविष्य में धन की व्यवस्था कहां से होगी इस बारे में नहीं सोचती.’ उक्त डीआईजी एक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि सरकार की ओर से प्रदेश भर के थानों को कंप्यूटराइज्ड कराने के लिए बड़ी तेजी से काम हुआ. जिन थानों में ठीक-ठाक कमरों की व्यवस्था तक नहीं थी उन जगहों पर थाना प्रभारी ने अधिकारियों के दबाव में किसी तरह व्यवस्था कर कंप्यूटर लगवाने के लिए कमरे दुरुस्त कराए. लेकिन कंप्यूटरों के रखरखाव के लिए कोई बजट नहीं मिला. मतलब साफ है, यदि कंप्यूटर में कोई खराबी आती है तो थानेदार या मुंशी अपनी जेब से उसे सही करा कर सरकारी काम करें. उक्त डीआईजी कहते हैं, ‘सूचना क्रांति का दौर है, हर अधिकारी चाहता है कि उसके क्षेत्र में कोई भी घटना हो, सिपाही या दारोगा उसे तत्काल मोबाइल से अवगत कराएं. लेकिन समस्या यह है कि पुलिस कर्मियों को मोबाइल का बिल अदा करने के लिए एक रुपया भी नहीं मिलता. थानों में स्टेशनरी का बजट इतना कम होता है कि यदि कोई लिखित शिकायत थाने में देना चाहता है तो मजबूरी में मुंशी पीड़ित से ही कागज मंगवाता है और उसी से फोटोस्टेट भी करवाता है. कभी-कभी मुंशी यह सुविधाएं अपने पास से शिकायती को दे देते हैं तो सुविधा शुल्क वसूल करते हैं. ऐसे में आम आदमी के दिमाग में पुलिस के प्रति गलत सोच पनपना लाजिमी है.’

यह तो हुई उन खर्चों की बात जिनके लिए पैसा ही नहीं मिलता. लेकिन जो पैसा पुलिसकर्मियों को अपनी सेवाओं के लिए मिलता है उसकी भी तुलना दूसरे क्षेत्रों से करने पर साफ नजर आ जाता है कि स्थिति कितनी गंभीर है. पाल कहते हैं, ‘तीसरे वेतन आयोग में प्राइमरी स्कूल के अध्यापक का वेतनमान 365 रु तथा कांस्टेबल का 364 रु था. दोनों के वेतन में मात्र एक रुपए का अंतर था. चौथे वेतन आयोग में यह अंतर 200 तथा पांचवें वेतनमान में 1450 रु का हो गया. छठे वेतनमान में पुलिस विभाग का सिपाही प्राइमरी स्कूल के अध्यापक से 4100 रु पीछे रह गया.’

और यह हाल तब है जब पुलिस विभाग का सिपाही हमेशा ड्यूटी पर माना जाता है और अध्यापक महज 10 से चार बजे तक ही स्कूल में रहते हैं. पुलिस कर्मचारियों को किसी त्योहार या अन्य मौकों पर भी ड्यूटी करनी पड़ती है. जबकि अन्य विभाग के कर्मचारियों को साल में 109 छुट्टियां मिलती हैं. पुलिस कर्मचारियों को 109 सरकारी छुट्टियों का नगद भुगतान भी नहीं होता. थाने में तैनात सिपाही व दरोगा की ड्यूटी कम से कम 12 घंटे की हो जाती है. चौकी प्रभारी, एसओ व इंस्पेक्टर की ड्यूटी 24 घंटे की होती है. इसके बावजूद कर्मचारियों को ओवर टाइम की कोई सुविधा नहीं है. जबकि मानवाधिकार आयोग व सुप्रीम कोर्ट भी आठ घंटे की ड्यूटी की बात कहते हैं.

काम ज्यादा, वेतन कम और ऊपर से छुट्टियों का टोटा. ऐसे में कर्मचारियों में तनाव व कुंठा आना स्वाभाविक है. लेकिन उनकी शिकायतों की कहीं सुनवाई नहीं. पाल कहते हैं, ‘. थाने की जीप को महीने में मात्र 150 लीटर डीजल मिलता है जबकि जरूरत 350 लीटर डीजल की होती है. ऐसे में यदि कोई थानेदार एसपी के पास जाकर अतिरिक्त डीजल की मांग कर बैठता है तो यही जवाब मिलता है कि थाना चलाना है तो अपने पास से मैनेज करना सीखो.’  पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री मायावती को अपने हाथों से केक खिलाते तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह की तस्वीर पुलिस की व्यवस्था में आई विकृति का सबसे शक्तिशाली प्रतीक है. जब पुलिस का सबसे बड़ा अधिकारी ही इस तरह नतमस्तक नजर आए तो क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई कांस्टेबल या सब इंस्पेक्टर किसी छुटभैये नेता की बात न मानने की हिम्मत करेगा?’ एक दूसरे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘ऐसे में खुद ही सोचिए कि क्या फोर्स के मन में अपने मुखिया के लिए आदर का भाव होगा. जब डीजीपी ही यह करते दिखें तो किसी कांस्टेबल या सब इंस्पेक्टर को यही लगता है कि उसकी सुनवाई कहीं नहीं होने वाली और उसे अपना मोर्चा खुद ही संभालना है. इससे फोर्स का मनोबल टूटता है.’ पूर्व डीजीपी और सुप्रीम कोर्ट में पुलिस सुधारों के लिए याचिका दायर करने वाले प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘जब एडीजी, आईजी और डीआईजी रैंक के अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं की जीहुजूरी करते दिखें तो एसआई और इंस्पेक्टर रैंक के कर्मचारियों को लगता है कि  खुद को बचाना है तो सत्ताधारी पार्टी के स्थानीय एमएलए या एमपी के साथ रिश्ते बनाकर रखे जाएं. और यही असुरक्षा उन्हें अपने स्थानीय संरक्षकों के हित में काम करने के लिए मजबूर करती है.’

लखनऊ के एक थाने में तैनात कांस्टेबल रमेश कहते हैं, ‘एक पॉश कालोनी में गश्त करते हुए मैंने देखा कि चार लड़के एक कार में बैठे शराब पी रहे थे. मैंने उन्हें मना किया तो उनमें से एक कार से उतरा और उसने मुझे तीन-चार झापड़ रसीद कर दिए. मैंने पुलिस स्टेशन फोन कर और फोर्स भेजने को कहा. लेकिन कार्रवाई करने की बजाय एसओ ने मुझसे कहा कि वे उन लड़कों को जानते हैं और मैं भविष्य में सावधानी बरतूं. मैं उसी दिन मर गया था. आत्महत्या इसलिए नहीं की क्योंकि 12 साल की एक बेटी है. अब तो मेरे सामने बुरे से बुरा भी हो जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं किसी रोबोट जैसा हो गया हूं जो तभी कुछ करता है जब अधिकारी करने को कहे.’

रमेश हमें अपने आवास में ले जाते हैं. किसी दड़बे जैसी नजर आती यह जगह बहुत छोटी है और लोग बहुत ज्यादा. रमेश कहते हैं, ‘हमारे इस घर से ज्यादा जगह तो हमारी जेल में है. मगर किसे परवाह है.’ पूर्व आईजी एसएस दारापुरी कहते हैं, ‘किसी इलाके में प्रशासन कैसे काम कर रहा है इसका संकेत इससे मिल जाता है कि वहां पुलिस का क्या हाल है.’

और जो तमाम मुश्किलों के बावजूद अपना कर्तव्य निभाने की जिद पर डटे रहते हैं उनके साथ क्या होता है यह जानना हो तो शैलेंद्र सिंह एक उदाहरण हैं जिन्होंने 2004 में डिप्टी एसपी के पद से इस्तीफा दे दिया. चंदौली में जन्मे सिंह प्रदेश में नियुक्ति पाने वाले सबसे कम उम्र के सर्कल अफसरों में से एक थे. लेकिन उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि उत्तर प्रदेश में एक पुलिस अधिकारी होना बड़ा मुश्किल काम है. सिंह बताते हैं, ‘एक बार मुझे खबर मिली कि दो लोग अवैध रूप से 10 लाख 50 हजार रु लेकर जा रहे हैं. पूछताछ के दौरान उन्होंने माना कि वे बेसिक शिक्षा अधिकारी रमेश कुमार की तरफ से यह पैसा ले जा रहे थे जो शिक्षा मंत्री राम अचल राजभर के जरिए पार्टी फंड में जाना था. रमेश कुमार ने मुझे फोन किया और कहा कि आप गलत जगह हाथ डाल रहे हैं. खबर पुलिस मुख्यालय पहुंची तो आईजी स्तर से नीचे तक हड़कंप मच गया. उन्होंने मेरे इंस्पेक्टर को खूब लताड़ा मगर मुझसे सीधे कुछ नहीं कहा. मायावती जी उस समय

देश से बाहर थीं. मेरा एक हफ्ते में पांच बार ट्रांसफर हुआ. शाम को मैं सीबी-सीआईडी का चार्ज लेता और सुबह पता चलता कि मेरा तबादला भ्रष्टाचार निरोधक शाखा में कर दिया गया है.’

सजा देने, डर बिठाने और इस तरह पुलिस को अपने इशारों पर नचाने के लिए ऐसे तबादलों का किस खूबी से इस्तेमाल होता है यह आंकड़ों पर नजर डालने से भी साफ हो जाता है. 2007 के मध्य से 2009 के मध्य तक 95 आईपीएस अफसर ऐसे थे जिनका पांच से लेकर 11 बार तक तबादला हुआ. बरेली शहर ने इस दरम्यान 12 एसएसपी देखे. नोएडा का यह हाल है कि कोई एसपी छह महीने टिक जाए तो हैरत होने लगती है. गृह सचिव जीके पिल्लई ने कुछ समय पहले ही एक इंटरव्यू में माना था कि उत्तर प्रदेश में एक एसपी का एक जगह औसत कार्यकाल दो महीने होता है. जब शीर्ष स्तर पर ही यह हाल है तो एसएचओ और सब इंस्पेक्टरों  की स्थिति क्या होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है. आईजीपी रैंक के एक अधिकारी व्यंग्यात्मक लहजे में कहते भी हैं, ‘सब इंस्पेक्टर, एएसआई या फिर हेड कांस्टेबल को जो एक वाक्य सबसे ज्यादा सुनने को मिलता है वह यही है कि तेरा ट्रांस्फर करवा दूंगा.’

एक पुलिसकर्मी की समस्याएं रिटायर होने के बाद भी कम नहीं होती. नौकरी के दौरान जिन जिन जगहों पर दरोगा की तैनाती रही है यदि वहां के न्यायालय में उसके द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट या गवाही से संबंधित कोई मामला चल रहा हो तो उसे वहां जाना पड़ता है. इस काम के लिए उसे महज 15 रुपये ही खाने का सरकारी खर्च मिलता है. वह भी तब जब न्यायालय में तय तारीख पर गवाही हो जाए. कई बार गवाही किन्हीं कारणों से नहीं हो पाती. ऐसे में खाने का खर्च रिटायर पुलिसकर्मी को अपने पास से उठाना पड़ता है. यदि दारोगा न्यायालय में गवाही के लिए उपस्थित नहीं हो पाता तो उसके खिलाफ वारंट जारी हो जाता है. ऐसे में नौकरी के दौरान ये खर्चे नहीं खलते, लेकिन रिटायरमेंट के बाद यह खासा मुश्किल होता है.

प्रदेश के पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता का आरोप है कि पूरा विभाग ही गैर योजनाबद्ध तरीके से चलता आ रहा है. वे खुलकर कहते हैं, ‘हर सरकार चाहती है कि क्राइम का ग्राफ उसके शासन में कम रहे. इसका फायदा पुलिस विभाग बखूबी उठाता है. अब सीएम का फरमान है कि क्राइम 15 परसेंट कम हो. आप बताइए उनके पास ऐसा करने के लिए कोई जादू की छड़ी तो है नहीं. इसलिए वे अपने तरीके निकालते हैं. मसलन पीड़ित की रिपोर्ट ही नहीं दर्ज की जाती. इससे पुलिसकर्मियों को दोहरी राहत मिलती है. एक तो क्राइम का ग्राफ नहीं बढ़ता, दूसरा रिपोर्ट दर्ज होने के बाद होने वाली भागदौड़ से भी राहत मिलती है क्योंकि भागदौड़ में हजारों रु खर्च होते हैं, जिसके लिए थानों के पास कोई बजट नहीं होता.’

पूर्व डीजीपी उदाहरण देते हैं कि वर्ष 1973 में प्रदेश भर के थानों में 2 लाख 75 हजार मुकदमे दर्ज हुए थे जबकि उन दिनों अपराध आज की तुलना में काफी कम था. लेकिन अब यह आंकड़ा डेढ़ लाख के आसपास सिमट गया है. यही कारण है कि थानों में सुनवाई न होने की दशा में पीड़ितों की फरियाद विभिन्न आयोगों, न्यायालयों सहित पुलिस के आला अधिकारियों के यहां बढ़ रही है. आंकड़े देख कर अधिकारी से लेकर सरकार तक खुश होती है कि अपराध कम हो रहा है, लेकिन इस तरह अपराध कम करने से अपराधियों को ही बढ़ावा मिल रहा है. अधिकारी नेताओं के कृपापात्र हैं, लिहाजा वे कर्मचारियों की मांग सरकार तक नहीं ले जा पाते. दोनों ही यह उम्मीद करते हैं कि थाने में तैनात लोग ही अपने पास से सबकुछ मैनेज करें. नौकरी बचाने के लिए थाने के लोग सबकुछ करने को मजबूर होते हैं. ऐसा नहीं कि अधिकारी उनकी हरकतों से अनभिज्ञ हैं लेकिन जानबूझकर वे भी आंखें बंद किए परंपरा को आगे बढ़ाते रहते हैं. गुप्ता कहते हैं, ‘यह सब कुछ तभी सुधरेगा जब सरकार जैसे विकास योजनाओं पर रुपये खर्च करती है उसी तरह पुलिस विभाग के सभी कामों के लिए सरकारी धन उपलब्ध कराया जाए.’

जानकारों के मुताबिक पुलिस कर्मचारियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों को कम करने के लिए आईपीएस असीम अरुण ने शासन को एक प्रस्ताव भी बना कर भेजा है. जिसमें थानों की जीप का डीजल, वर्दी भत्ता, मोबाइल खर्च, मुल्जिम खुराक बढ़ाने से लेकर भवनों के मरम्मत, गुप्त व्यय सहित करीब 27 बिन्दु हैं. महीनों हो गए लेकिन यह प्रस्ताव भी अभी ठंडे बस्ते में ही है.

(बृजेश पांडे के सहयोग के साथ)

(31 अक्टूबर 2010)

2 COMMENTS

  1. Dear Sir

    You have tried to unveil that aspect of police force, which is often left by others. Thanks for this. It is a stark reality that everyone has complaint about police force, be it a common man or Chief Minister, but who cares for their rights. I agree that police force too have the same human rights, which others do possess.

    Various commissions have made their recommendations to provide basic comforts to these security personnels, but they have been denied. Why? Where lies the problem? The problem lies with those leaders and politicians who want this police force to become a tool in their hands. Even the Supreme Court has issued directions for these, but the deaf ears of statehood have ignored this. Now, the ball is in the court of media, if it highlights this, then we can hope for some relief to police force. Till then, we have to wait for this.

    Thanks once again for writing such article.

    Balendu Priyadarshan

    Advocate

  2. Dear Sir ,

    There is a saying in Hindi crime is guilty of the crime who endures. And in our country’s police, which tended to be in charge of the safety of the country are suffering the same crime will happen to the common man. If you try to force it, but then everything is possible.

    महोदय जी

    हिंदी में एक कहावत है जुर्म को सहने वाला जुर्म करने वाले से बड़ा अपराधी होता है। और जब हमारे देश की पुलिस जिसके हाँथों में सारे देश की सेफ्टी का जिम्मा हो वही जुर्म को सहता रहे तो फिर आम आदमी का क्या होगा। अगर फ़ोर्स चाहे तो सब कुछ संभव है लेकिन कोशिश करे तब।

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