वर्तमान का दस्तावेजीकरण

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पुस्तक: जी हां लिख रहा हूं…
लेखक : निशान्त
मूल्य : 150 रुपये
प्रकाशनः राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

आलोचक भले ही कहते हों कि यह कविता का नहीं कहानियों का युग है लेकिन फिर भी कुछ कवियों ने हमें चौंकाना नहीं छोड़ा है यह शुभ संकेत है. कविताएं लिखी जा रही हैं और खूब लिखी जा रही हैं. फेसबुक आदि माध्यमों ने तुरंत कवियों की एक पूरी पीढ़ी को ही जन्म दिया है लेकिन इन सबके बीच निशान्त जैसे कवियों की मौजूदगी बहुत आश्वस्त करती है. एक बानगी देखिए ‘इस समय एक युवा कवि कह रहा है/ अभी नहीं लिख पाया अपने समय की कविता/ तो बाद में कुछ भी नहीं लिख पाऊंगा/ चूक जाऊंगा.’ कवि यहां वक्त के असर और उन दबावों को रेखांकित कर रहा है जो सब कुछ बदल देने का माद्दा रखते हैं. निशान्त न केवल लंबी कविताओं को साधने में महारत रखते हैं बल्कि उनकी कविताएं निहायत निजी अनुभवों के व्यापक सामाजिक असर को भी साथ-साथ रेखांकित करती चलती हैं. उनका कविता संग्रह ‘जी हां लिख रहा हूं’ में मुख्य रूप से उनकी पांच लंबी कविताएं शामिल हैं.

निशान्त की कविताओं में ‘मैं’ की गूंज इतनी ज्यादा है कि सरसरी निगाह डालने वाले बहुत आसानी से उनकी कविताओं को व्यक्तिकेंद्रित कविता करार दे देंगे लेकिन हकीकत में निशांत की कविताओं का ‘मैं’ दरअसल एक पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है. उनकी कविताओं में जिन बिंबों का इस्तेमाल है वे अनूठे और गूढ़ हैं. ये पंक्तियां, ‘यह बड़ा गड़बड़ समय था/ एक लड़का हलाल हो गया था और मुस्कुरा रहा था/ दूसरा अपनी बारी का इंतजार कर रहा था.’ इनमें वह समय का सच तो सामने ला ही रहे हैं साथ ही एक विडंबना को भी उजागर कर रहे हैं. दिल्ली आने वाला कोई ऐसा युवा शायद ही होगा जो मुखर्जी नगर व बत्रा सिनेमा से अपरिचित होगा. सिंगल स्क्रीन थिएटर को आधार बनाकर निशान्त ने जड़ों से कटकर दिल्ली पहुंचे युवाओं के स्वप्नभंग को बेहद खूबसूरत ढंग से रचा है.

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