वनाधिकार पत्र के लिए अब जंगल-सत्याग्रह

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DSCN9192कौन
‘राष्ट्रीय मानव’ का दर्जा प्राप्त बैगा जनजाति

कब
9 अगस्त, 2012 से

कहां
मसना गांव, जिला – मंडला (मध्य प्रदेश)

क्यों
देवालय के नाम पर यहां न कोई छत है, न कोई चारदीवारी. है तो देवालय नाम का एक वटवृक्ष और उसके नीचे रखी देवमूर्ति. यह है मध्य प्रदेश के बैगा जनजाति बहुल मंडला जिले का मसना गांव. यहां जंगल की जमीन पर अपना वनाधिकार पत्र पाने के लिए बैगा जनजाति के लोग 9 अगस्त, 2012 से लगातार जंगल-सत्याग्रह कर रहे हैं. हैरानी की बात है कि ऐसा बहुत कम ही लोगों को पता है कि यहां बीते 17 महीने से हर दिन सुबह-शाम बैगा महिला, पुरूष और बच्चे बारी-बारी से उपवास कर रहे हैं. इस जंगल-सत्याग्रह की खासियत यह है कि इसकी बागडोर बैगा महिलाओं ने संभाली हुई है.

काबिले गौर है कि राष्ट्रीय पशु ‘बाघ’ और राष्ट्रीय पुष्प ‘कमल’की तर्ज पर भारत सरकार ने बैगा को आदिम जाति मानकर राष्ट्रीय मानव का दर्जा दिया है. वहीं इनकी कम होती तादाद को देखते हुए मप्र सरकार ने ‘बैगा विकास प्राधिकरण’ बनाया है. 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वनवासियों के साथ हुए पारंपरिक अन्याय को स्वीकारते हुए उनके लिए वनाधिकार कानून लागू किया था. इसी कानून के तहत बैगा जनजाति को भी उनकी पारंपरिक उपयोग की जमीन का हक दिया जाना था. किंतु आदिवासी एकता मंच के कार्यकर्ता ध्रुवदेव बताते हैं कि मसना गांव के सभी 41 बैगा परिवारों को उनकी जमीन से उजाड़ते हुए वन-विभाग ने अपना कब्जा जमाया है. उनके मुताबिक, ‘बैगा परिवारों ने अपनी जमीन के लिए वनाधिकार पत्र हासिल करने का दावा अगस्त, 2011 में ग्राम-सभा में पेश किया था. ग्राम-सभा ने भी उनके दावों को मान्य करते हुए आगे की कार्यवाही के लिए जिला प्रशासन को भेजा था. लेकिन प्रशासन ने उनके व्यक्तिगत वनाधिकार के दावों को नकार दिया.’

वनाधिकार कानून कहता है कि विवादास्पद जमीन पर जब तक अंतिम निर्णय नहीं हो जाता है तब तक सरकार किसी भी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती. लेकिन सत्याग्रही सुशीला बाई बताती हैं कि अधिकारियों ने 17 महीने पहले उनकी जमीन पर बनी झोंपड़ियों और फसलों को जला दिया. इसके खिलाफ जब सभी ग्रामीण शिकायत दर्ज कराने मंडला के दलित-आदिवासी थाने पहुंचे तो उनकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की गई.

सत्याग्रहियों का कहना है कि 6 अगस्त, 2012 को उनके विरोध प्रदर्शन के खिलाफ पुलिस ने 24 पुरुषों और 8 महिलाओं को बिना सूचना के मंडला थाने में बंद रखा. बावजूद इसके जब विरोध नहीं थमा तो 3 मई, 2013 को 6 बैगाओं को तीन महीने के लिए जेल में डाल दिया गया. सत्याग्रही बजराहिन
बाई के मुताबिक, ‘हमारी जमीन पर लोहे के तार और खंबे लगाकर सरकार ने कब्जा जमा लिया. अधिकारियों ने झूठे मामले लादकर हमें
नक्सली बता दिया. हमें हर तरह से परेेशान करने की कोशिश की गई.’

अंग्रेजों ने अपनी हुकूमत के दौरान यहां की जमीन को हथियाने की कोशिश की थी. किंतु बैगा जनजाति ने अहिंसक सत्याग्रह से उन्हें नाकाम बना दिया था. विडंबना ही माना जाएगा कि आज जमीन का अधिकार पाने के लिए इन्हें अपनी ही सरकार के खिलाफ संघर्ष करना पड़ रहा है.
शिरीष खरे

1 COMMENT

  1. हमेशा से सरकारो का मतलब आदिवासियो से वोटबैंक को लेकर ही रहा है , आज भी आदिवासी मुख्यधारा में नही आ पाये है सरकार वनाधिकार को लेकर जितने भी दाव्रे करे लेकिन य्व सत्याग्रह सच्चाई की पोल खोलता है आदिवासी समाज का एक वर्ग जो दुरगम इलाको में आज भी बसता है उनकी मैदानी हकिकत सरकार को पता नही है| आज भी सांगाखेडा तहसील जुन्नारदेव जिला छिंदवाडा के कोरकू ,मवासी किस हालात में है कभी आप प्रसिद्ध बडा महादेव (पच्मढी) के मेंले में जाये तो देखे आज भी विकास वहा वन विभाग के माध्यम से ही पहुचता है बारिश में स्कुलो में ताले पड जाते है या तामिया पातालकोट के भारिया और अन्य जिलो के आदिवासी बेहतर हालात में नही है उनके नाम पर राजनीति तो जमकर हो रही है पर दुर्भाग्य देखिये कोई भी आदीवासी नेता आदिवासियो का भला नही कर रहा है वो सिर्फ बडे रजनितिक दलो में अपने वर्ग के प्रतिनिधित्व के नाम पर पेंडुलम बने हुये है और वैसे भी नतिजा सामने इसलिये नही आता क्योकि कहा जाता है जहा कोइ नीति नही वही तो राजनिती है | नितिन दत्ता , पत्रकार , तामिया जिला-छिंदवाडा (म.प्र.)

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