‘ले आएंगे बाजार से जाकर दिलो जां और’

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मनीषा यादव

आदमी का पैदाइशी सपना है कि वह अमर हो जाए.

इधर चिकित्सा विज्ञान का भी सदियों से यही स्वप्न है कि वह जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझ ले. आयुर्वेद, यूनानी से लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तक यह कोशिश जारी है. पुरातन तथा पौराणिक कथाओं में इस तरह की कई कोशिशों का जिक्र है. हम अभी तक इसे मात्र किस्सा-कहानी मानते रहे. पर अब यह बात गल्प का हिस्सा नहीं रह गई है. बड़ी जल्दी यह एक वास्तविकता होने वाली है. अजर और अमर होने की कुंजी तलाशने के विज्ञान को ‘रीजनरेटिव मेडिसिन’ का नाम दिया गया है. ‘पुनर्नवा’ करने की कला को समझने की कोशिश कर रहा है आज का चिकित्सा विज्ञान.

कोशिश हो रही है कि शरीर का जो भी हिस्सा बीमारी से खराब हो जाए, काम करना बंद कर दे, हम उसे बाहर ही बना कर शरीर में फिट कर सकें, या उसे वहीं, शरीर के भीतर ही भीतर किसी कारीगरी से एकदम नया बना दें. कैसा रहे कि ऐसी दुकानें उपलब्ध हों जहां आपका लिवर, दिल, फेफड़े, यहां तक कि दिमाग भी ‘शेल्फ’ पर मोटरपार्ट्स की भांति उपलब्ध हों? चचा गालिब ने जो शेर बेवफाई के सिलसिले में कहा था कि ‘ले आएंगे बाजार से जाकर दिलो जां और’ उसके दूसरी तरह से चरितार्थ होने के दिन आ रहे हैं.

वैसे शरीर के खराब अंग को निकाल कर नया लगाने की कोशिश दशकों से जारी है. किडनी प्रत्यारोपण, हृदय या पैंक्रियाज के प्रत्यारोपण इसी सोच का नतीजा हैं. पर ऐसे प्रत्यारोपण के लिए आपको किसी और शख्स की किडनी या हृदय आदि दान में चाहिए. ऐसे दानवीर बहुत कम मिलते हैं. लाखों किडनी फेल्योर के केस किडनी के लिए प्रतीक्षारत हैं. लाखों का दिल लगभग बैठा हुआ है. इन्हें अंग मिल जाते तो ये भी स्वस्थ जीवन जीते. अभी तो ये सब इंतजार करते मर जाते हैं. इन्हें डोनर नहीं मिल पाते हैं. कुछ ऐसा हो पाता कि हम प्रयोगशाला में ये सारे अंग बना पाते, तो जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आ जाता. इसलिए शुरुआती दिनों में, जब जीवन की हमारी समझ उतनी गहरी नहीं थी अर्थात ‘न्यूक्लियर बायोलॉजी’ का ज्ञान उतना नहीं था, तब एक अलग ही तरह से इसका समाधान खोजने का प्रयास हुआ. यह प्रयास अब भी चल रहा है. यह माना गया है कि आदमी का दिल, गुर्दे, लिवर आदि अंतत: एक मशीन ही तो हैं. ऐसे ही आदमी का दिमाग भी एक कंप्यूटर या कह लें कि सुपर कंप्यूटर ही तो है. सो इन अंगों के संचालन को यदि मशीन की भांति समझ लिया जाए तो क्यों नहीं वैसी ही एक मशीन बायोइंजीनियरिंग की वर्कशॉप में बनाई जाए? जो भी खराब अंग हो उसी को हटाकर यह मशीनी अंग वहां फिट कर दिया जाए?

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