‘रूह जो महसूस करती है वही बयान करती है’

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जानेमाने सूफी गायक आरिफ लोहार . फोटो:अरुण सहरावत
जानेमाने सूफी गायक आरिफ लोहार . फोटो:अरुण सहरावत
जानेमाने सूफी गायक आरिफ लोहार . फोटो:अरुण सहरावत
जानेमाने सूफी गायक आरिफ लोहार . फोटो:अरुण सहरावत

आरिफ, सबसे पहले थोड़ा सूफीवाद और सूफी संगीत के बारे में बताएं.
सूफी है क्या? इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि अंदर से और बाहर से जो इंसान सूफी होता है वह रूह से पाक-साफ होता है. वो किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता. सूफी लोगों को जिंदगी की वह राह दिखाता है जिस पर चलकर इंसान को अपनी जिंदगी बशर करने और उसे अर्थपूर्ण बनाने में मदद मिलती है. सूफी अल्लाह का वह नेक बंदा है जिससे हर चीज, परिंदा, जानवर, दरख्त.. हर चीज महफूज रहती है. सूफी के कलाम प्यार-अमन और मोहब्बत का पैगाम होते हैं. हमारे जो सूफी संत हैं उन्होंने इंसानों को जीने की राह दिखाई है और आने वाले समय में जिंदगी को कैसे जीना है इसकी राह भी दिखाई है. सूफी संगीत इसी संदेश को लोगों तक पहुंचाने का जरिया है.

आपने हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों जगहों पर काम किया है. दोनों जगहों पर सूफीवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं. आप दोनों देशों की सूफी परंपरा में कोई अंतर पाते हैं या फिर दोनों एक ही धारा है.
देखिए, ये सारा संदेश जो दरवेशों और सूफी संतों ने दिया है वह सब एक ही है. इंसान तो एक ऐसे जमघट में रह रहा है जहां लालच और पैसे की दौड़ ही सब कुछ है. इंसान उसी दौड़ में लगा हुआ है. फिर एक चीज होती है सुकून. यह सुकून जो है वह सिर्फ एक दरवेश की दरगाह में ही मिल सकता है. वहां जाकर इंसान महसूस करता है कि यहां ठहराव है, शांति है. सारे सूफीवाद का यही सार है. हिंद और पाक में ऐसे बेशुमार सूफी पैदा हुए हैं जिनके सूफियाना कलाम ने इंसानियत की बेहतरी के फलसफे दिए हैं.

तो इसको क्या माना जाए? यह इस्लाम से अलग कोई धारा है या इस्लाम की ही कोई उपधारा है?
सूफीवाद की बुनियाद इस्लाम है. सूफीवाद उसका एक पहलू है जो कि पूरी दुनिया में जाता है. इसका मूल इस्लाम से है. जो सूफी इकराम हैं जैसे कि बाबा बुल्ले शाह, बाबा फरीद सरकार, बाबा लतीफ बटाई, यहां हिंद में अजमेर शरीफ के कलाम या निजामुद्दीन औलिया आदि ने जो दरस लिए हैं वह इस्लाम से लिए हैं. बल्कि अगर आप देखें तो इस्लाम के अलावा भी बाकी जो मजहब हैं दुनिया में, वे सभी शांति और अमन का ही संदेश देते हैं.

एक धारणा है कि इस्लाम और संगीत साथ-साथ नहीं चल सकते. पर हमने पाकिस्तान में एक से बढ़कर एक महान संगीतकार देखे हैं. गुलाम अली खान हैं, आबिदा परवीन हैं, नुसरत फतेह अली खान आदि. तो ये विडंबना एक साथ कैसे चलती है पाकिस्तान में? क्या इसकी वजह से आपको कभी कोई मुश्किल पेश आई?
नहीं, हम तो अपने मुल्क में बेहतरीन परफॉरमेंस कर रहे हैं, और सारे लोग हमें दिलोजान से चाहते हैं. हम वहां पर हिट होते हैं. हम सूफी महफिलों में जाते हैं. हमें तो आज तक किसी ने रोका-टोका नहीं है. बात यह है कि जब आप कोई भी चीज हद से बढ़कर करते हैं जिससे कि अश्लीलता झलकती हो तो स्वाभाविक रूप से हर कोई इसे पसंद नहीं करेगा. कुछ लोग बेहद नर्मदिल और रूढ़िवादी होते हैं जिनको इन चीजों से चोट पहुंचती है. सूफी आदमी भी इस तरह की चीजें पसंद नहीं करता है.

भारत में भी हमने देखा है कि कई बार कोई राजनीतिक समस्या खड़ी होते ही पाकिस्तान से आने वाले कलाकारों को यहां से वापस जाने का दबाव बनाया जाता है. कभी आपका इस तरह की चीज से सामना हुआ?
कलाकार जो होता है वह दो देशों के बीच ब्रिज बनाने का काम करता है. वह फनकार कहीं का हो. देशों के बीच विवाद होते रहते हैं. लेकिन इस चीज को इतना दिल से नहीं लगाना चाहिए. कभी भी कलाकार को दरकिनार नहीं करना चाहिए. आप देखिए कि कितनी भी कड़वाहट पैदा हो जाए लेकिन मेंहदी हसन साहब, गुलाम अली साब, नुसरत साब की आवाज को आप रोक नहीं सकते. वो तो यहां लोगों के दिलों पर राज करते हैं. इसी तरह से आप देखिए कि लता जी वहां पाकिस्तानियों के दिलों पर राज करती हैं. तो आप उनकी आवाजों को तो रोक नहीं सकते. खूब सुनते हैं लोग उन्हें. रफी साब को, किशोर कुमार को सुनते हैं. तो कहने का मतलब है कि कलाकार जो होता है वह सीमाओं से बंधा नहीं होता है, वह इनसे ऊपर है. वह अमन का पुजारी होता है. मेरे दादा जी सुनाया करते थे कि एक जंगल में आग लग गई तो वहां पर एक चिड़िया चोंच में पानी भर के पानी फेंक रही थी. तो किसी ने कहा कि ऐ कमलिए, ऐ जलिए तू ये क्या काम कर रही है. तेरी चोंच भर पानी से इस जंगल की आग क्या बुझेगी. तो चिड़िया ने कहा–मैं ये तो नहीं जानती कि मेरे पानी से इस जंगल की आग बुझेगी या नहीं बुझेगी, लेकिन आग बुझाने वालों का नाम जब लिया जाएगा तब सबसे पहले मेरा नाम लिया जाएगा कि मैंने इस आग को बुझाने की शुरुआत की थी. तो कलाकार यही काम करता है.

हिंदुस्तान में आपकी पहचान कोक स्टूडियो के जरिए बनी. उससे पहले यहां आपके प्रशंसकों की संख्या इतनी बड़ी नहीं थी. तो आपको क्या लगता है कि कोक स्टूडियो जैसे प्लेटफॉर्म जरूरी हैं? क्या ये कलाकार को सामने लाने का बेहतर जरिया हैं?
पाकिस्तान में सबसे पहले मैं 90 में हिट हुआ था. यूट्यूब पर मेरे गाने पहले से ही मौजूद थे. कोक स्टूडियो के जरिए दुनिया से मेरा वास्ता पड़ा. यह तजुर्बा बड़ा अच्छा रहा और लोगों ने मुझे पसंद भी किया. यह निश्चित रूप से बेहतर शुरुआत है. इससे आप अपने फन को दुनिया के सामने रख पाने में कामयाब होते हैं.

एक चीज और, आपका पहनावा बड़ा शानदार होता है और बहुत पसंद किया जाता है. तो यह निराला पहनावा सिर्फ आपका शौक है या इसका आपके सूफीवाद और अध्यात्म से कोई लेना-देना है?
आप दोनों चीजें ले सकते हैं. इसका जो रंग है काला वह तो मेरा शौक है. इसके अलावा डिजाइन करना होता है तो हमारी लोक दास्तानों में बड़ी मिसाल दी जाती है हीर रांझे की. ये बाल उसी रांझे के कैरेक्टर से लिए गए हैं. ये ढोलना जो है मिर्जा साहिबा की स्टोरी से ली हैं. ये मिर्जा साहिबान पहनते थे. ये जूता है तो हमारी धरती पर सिर्फ मेरे इलाके में ही बनते हैं. तो आज के दौर में इन्हें सिर्फ मैं ही पहनता हूं. इसी तरह से लांचा कुर्ता जो हमारा पहनावा था जो आज भी हमारे यहां लोग पहनते हैं, तो यह उन्हीं से लिया गया है. लोक दास्तानों में जो चीजें मौजूद हैं उन्हें मैं इस्तेमाल करता हूं. एक लोक फनकार के ऊपर लोक दास्तानों का बहुत असर होता है. इस तरह से तमाम लोककथाओं का टोटल किया जाए तो एक आरिफ लोहार बनता है और एक आलम लोहार बनता है.

आलम लोहार यानी आपके वालिद साब..
जी, मेरे वालिद साब.

1 COMMENT

  1. ‘मिट्टी मिट्टी दुनिया सारी, मिट्टी दा संसार’ सचमुच एक बेहतरीन साक्षात्कार को शब्दों के मोती में पिरोकर आपने अद्भुत लेख तैयार किया है जोकि वाकई काबिलेतारीफ है। वैसे सूफी गायक आरिफ लोहार के शब्द इस बातचीत में तिरोहित हैं कि उनके यह शब्द जैसे ‘रूह जो महसूस करती है वही बयान करती है’लाजबाव है।

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