‘राहुल गांधी को अहम मुद्दों पर बात करने की जरूरत है’ | Tehelka Hindi

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‘राहुल गांधी को अहम मुद्दों पर बात करने की जरूरत है’

अर्थव्यवस्था संकट में है और कहा जा रहा है कि अगले कुछ सालों तक इस संकट के जाने के आसार नहीं हैं. क्या आपको लगता है कि फैसले लेने में कुछ गलतियां हुई हैं?
दुनिया का हर देश इस स्थिति से गुजर रहा है. समूची विश्व अर्थव्यवस्था पर ही दबाव है. सितंबर 2008 में अमेरिका में लीमैन ब्रदर्स के ढहने के साथ जो संकट शुरू हुआ था उससे हम अब तक नहीं उबर पाए हैं. पिछली नौ तिमाहियों से हम विकास दर का घटना ही देख रहे हैं. अब मुझे इस वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही के आंकड़ों का इंतजार है. देखते हैं हालत सुधरती है या नहीं. लेकिन मुझे यकीन है कि अगर हमने सही कदम उठाए और धैर्य रखा तो हम इन हालात से उबर जाएंगे. इसलिए मैं इतना निराश नहीं हूं. हां, हमने कुछ गलतियां की हैं, लेकिन हालात सारी दुनिया के लिए ही खराब हैं.

आपने कहा कि अगर हम सही कदम उठाएंगे तो इस संकट से बाहर निकल आएंगे. क्या आप थोड़ा विस्तार से इस बारे में बताएंगे?
जी बिल्कुल और हम वे कदम उठा भी रहे हैं. मुझे लगता है कि कुछ बुनियादी मुद्दों पर हमारी सोच बिल्कुल साफ होनी चाहिए. जैसे वित्तीय घाटा. वित्तीय घाटे (आय से ज्यादा खर्च की स्थिति) को किसी भी तरह से काबू में रखना होगा. हमें कोशिश करनी होगी कि दुनिया भर में इसके लिए जो स्वीकार्य मानक है यानी तीन फीसदी, इससे आगे यह किसी हाल में न जाए. हमें चालू खाते के घाटे (वह स्थिति जहां आयात ज्यादा हो और निर्यात कम) को घटाकर उस स्तर पर लाना होगा जहां हम इसका बोझ उठा सकें. हमें अपने खर्च पर लगाम लगानी होगी ताकि यह मुद्रास्फीति में उछाल का कारण न बने. हमें घरेलू और विदेशी निवेश, दोनों के लिए दरवाजे खुले रखने होंगे. रुपया दुनिया की उन मुद्राओं में से एक है जिनका सबसे ज्यादा लेन-देन हो रहा है. रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण अवश्यंभावी है. इसलिए हमें अपने वित्तीय बाजार का भी उदारीकरण करना होगा. हमें अपने बैंकों को और मजबूत बनाना होगा. ऐसे कई कदम हैं और मैं विश्वास के साथ आपसे यह भी कह सकता हूं कि इनमें से कई कदम हमने पिछले 15 महीनों के दौरान उठाए भी हैं.

आपने कुछ गलतियों की भी बात की.
देखिए. कोई ऐसा देश नहीं है जो मंदी से न गुजर रहा हो. चीन का भी वही हाल है जो हमारा है. विकास दर के मामले में चीन 10 से घटकर 7.5 फीसदी पर आ गया है. हम आठ से घटकर 5.5 पर आ गए. तो मुझे लगता है कि हमारे यहां जो हुआ वह दुनिया से कोई अलग बात नहीं है. हां, लेकिन मुझे लगता है कि हालात के यहां तक पहुंचने में कुछ योगदान हमारा भी रहा क्योंकि हमें लगा कि हम खर्च बढ़ाकर इस संकट से निपट लेंगे. अब पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि हम कोई और विकल्प भी अपना सकते थे. यह एक सामूहिक निर्णय था जो कैबिनेट ने लिया था, लेकिन मैं भी उसके लिए बराबर का जिम्मेदार हूं. इस फैसले ने वित्तीय घाटे का जो स्वीकार्य मानक था उसे तोड़ दिया. वित्तीय घाटा छह फीसदी से भी आगे जाने का खतरा हो गया. इससे चालू खाते का घाटा इतना बढ़ गया कि उसके साथ आगे बढ़ना मुश्किल हो गया. अब आप ही बताइए, 88 अरब डॉलर के चालू खाते का जो घाटा है उसकी भरपाई मैं कहां से करूं? मैं क्या कोई भी नहीं कर सकता. पिछले साल तो हम इस कमी को किसी तरह पूरा कर गए. लेकिन साल दर साल ऐसा थोड़े ही हो सकता है. और तीसरी बात यह है कि इसने मुद्रास्फीति को बढ़ा दिया. मुद्रास्फीति जैसे स्थायी मेहमान बन गई. तो मुझे लगता है कि कुछ गलतियां हुईं. लेकिन ऐसा नहीं है कि हमें पता था कि इनके परिणाम अच्छे नहीं होंगे और फिर भी हमने ये फैसले किए. वह तो जब आज के संदर्भ में हम इनका विश्लेषण करते हैं तो लगता है कि नीतियां शायद कुछ अलग हो सकती थीं.

जब आप कह रहे हैं कि सरकार के खर्च पर अंकुश लगाना चाहिए तो क्या यह दोहरे मापदंडों वाली बात नहीं है? देश की 70-80 फीसदी आबादी आज भी विकास के दायरे से बाहर है. फिर भी जब उस पर खर्च करने की बात आती है तो आप चिंता जता रहे हैं.
हम गरीब पर खर्च कर तो रहे ही हैं. मेरा कहना यह है कि हम इस आर्थिक संकट से बाहर नहीं निकल पा रहे. कोई देश कितना खर्च करे, उसकी एक सीमा होती है. देखिए, अगर आपके पास पैसा है तो खर्च करिए. आप स्वास्थ्य पर खर्च करिए, सामाजिक कल्याण पर करिए. सुरक्षा पर करिए. लेकिन यहां मैं वित्तीय घाटे की बात कर रहा हूं. यानी आप उधार लेकर खर्च कर रहे हैं. आप अगली पीढ़ी से उधार ले रहे हैं और उसे आज अपने लिए खर्च कर रहे हैं. सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा..ये सब सरकार की प्राथमिकताएं होती हैं. हमारे यहां लोकतांत्रिक सरकार की व्यवस्था है जिसमें लोग चुनकर अपने प्रतिनिधि भेजते हैं. अगर चुने गए प्रतिनिधि आपकी कसौटी पर खरे नहीं उतरे तो उन्हें बाहर कर दीजिए. लेकिन जब तक हमारे पास सरकार चलाने की यह व्यवस्था है तो हमें चुने हुए प्रतिनिधियों को अपने फैसले लेने लायक आजादी तो देनी ही होगी. अगर वे अच्छा काम करेंगे तो फिर चुने जाएंगे. अगर नहीं तो जनता उन्हें बाहर कर देगी.

कारोबारी समुदाय को लगता है कि इन दिनों देश में उसके लिए माहौल बहुत प्रतिकूल है. उसे कई तरह की मंजूरियां लेनी पड़ती हैं, उसके लिए कई पेचीदगियां पैदा की जाती हैं और कई मायनों में अब भी लाइसेंस राज जैसी ही हालत है.
लाइसेंस राज तो बड़ी हद तक खत्म हो गया है. मुझे लगता है कि इस बात की मांग हो रही है कि एक तरह का नियमन हो, लोगों से संवाद हो, उनके सुझाव सुने जाएं. पानी, जमीन जैसे संसाधनों का इस्तेमाल कैसे हो, इसके नियम बनें. अब जब आप इन मसलों पर नियमन की बात करते हैं तो साफ है कि एक नियामक भी होगा. आपको उस नियामक से मंजूरी भी लेनी पड़ेगी. मतलब यह कि या तो एक चीज होगी या फिर दूसरी. दोनों साथ-साथ नहीं हो सकतीं. हम ऐसा देश नहीं हैं जहां सरकार के लिए यह प्रावधान हो कि वह आर्थिक मामलों में कम से कम दखल देगी. हम कम नियंत्रण लेकिन ज्यादा नियमन चाहते हैं.

कई मायनों में हम नीतिगत स्तर पर लाचारी की जो यह स्थिति देख रहे हैं क्या वह एक तरह से रूपरेखा बनाने में हुई कमी का नतीजा है? क्या आपको लगता है कि नेतृत्व के स्तर पर असफलता रही है? कंपनियों के निवेश और सौदों के फैसले बोर्डरूम में होते हैं–ज्यादातर उन चिंताओं को दरकिनार करते हुए जिनकी बात हमने अभी की और एक अर्थशात्री और वित्तमंत्री होने के नाते आप उनके साथ खड़े होते हैं. लेकिन फिर वोट के लिए आपको लोगों के पास जाना पड़ता है और वहां पर अच्छी राजनीति मायने रखती है. तब आप लाचार हो जाते हैं क्योंकि वे लोग अलग-अलग कारणों से इन परियोजनाओं का विरोध करते हैं. तो क्या यह एक तरह का डिजाइन डिफेक्ट है? यानी आप परियोजनाओं की रूपरेखा बनाते हुए सभी पहलुओं पर ठीक से विचार नहीं करते.
मेरा मानना है कि गरीबी हटाने से महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण कुछ नहीं है. मुझे उनसे कोई दिक्कत नहीं है जो सरकार के फैसलों का विरोध कर रहे हैं, लोगों को सरकार के फैसलों के खिलाफ संगठित कर रहे हैं. लेकिन मेरा सवाल यही है कि क्या इस सबसे उन लोगों का कुछ भला हो रहा है जिनके लिए वे लड़ रहे हैं. क्या उनकी जिंदगी पहले से बेहतर है. अगर वे वैसे ही गरीब हैं तो मैं उनका तर्क और मॉडल खारिज करता हूं. मुझे लगता है कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि लोगों को गरीबी के दुश्चक्र से बाहर निकाला जाए. गरीबी सबसे बड़ी प्रदूषक है, सबसे बड़ा श्राप है. इसलिए उन लोगों की तरफ मैं बहुत संदिग्ध नजर से देखता हूं जो ऊर्जा संयंत्रों को बंद करवाते हैं, कोयला खनन नहीं होने देते, छोटे-बड़े बांधों का विरोध करते हैं. मैं यही पूछता हूं कि इससे क्या होगा. आखिर में लोग वहीं रहेंगे जहां वे थे. वे गरीब के गरीब रहेंगे. मुझे खुशी है कि इस मुद्दे पर अलग-अलग राय है. यह लोकतंत्र है. लेकिन सवाल आखिर में वही है कि क्या आप चाहते हैं कि गरीब वैसा ही रहे जैसा वह आज है. उसके लिए सड़कें और स्कूल नहीं न बनें, अगर किसी को यह लगता है कि लोग उसी गरीबी में रहना चाहते हैं तो वह इन लोगों का बुरा कर रहा है. मुझे मेधा पाटकर या अरुंधती राय जैसे लोगों से कोई दिक्कत नहीं है अगर वे मुझे यह बता दें कि उनकी विचारधारा या विरोध लोगों को गरीबी से बाहर निकाल लाएगा. मैं कार्यपालिका की गलतियों का बचाव नहीं कर रहा. नेताओं, अफसरों पुलिस और कारपोरेट्स सेक्टर से गलतियां हुई हैं, आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी गरीबी में जी रहा है तो इसमें उनका भी हाथ रहा है, लेकिन उन गलतियों को सही किया जाना चाहिए.

लेकिन क्या ये सिर्फ अच्छी बातें करना नहीं है. इससे किसी को क्या एतराज होगा?
नहीं, यह अच्छी बातें करने जैसी बात नहीं है. हमें कोयला चाहिए. या तो हम खुद अपना कोयला खोदें या फिर इसे आयात करें या फिर इसके बिना रहें. यही तीन विकल्प हैं.

एक चौथा विकल्प भी है.
क्या है वह.

कि हम यह कैसे करना है, इसकी रूपरेखा ठीक से बनाएं.
ठीक बात है. मैं इससे सहमत हूं. तो जो यह रूपरेखा बेहतर तरीके से बना सकते हैं उन्हें संसद में आना चाहिए. आप आगे आइए. संसद में आइए और बेहतर व्यवस्था दीजिए. मैं यह मानने के लिए तैयार हूं कि कोई मुझसे अच्छी योजना बना सकता है लेकिन ऐसा करने के लिए उसे इस व्यवस्था में आना होगा.

मुझे लगता है कि प्रतिभा की कमी नहीं है. नई सोच की कमी है. अगर आप यह कह रहे हैं कि आप जैसी बुद्धिमत्ता वाला आदमी नए तरीकों से काम नहीं कर सकता तो हममें से किसी में ऐसा करने की योग्यता नहीं हो सकती.
मुझे अपनी इस प्रशंसा से खुशी हुई लेकिन मैं यह मानने को तैयार नहीं कि इन मुद्दों से कैसे निपटा जाए, यह तय करने के लिए मैं ही सबसे समझदार आदमी हूं. मुझसे समझदार बहुत-से लोग होंगे. मेरा कहना यह है कि अगर आपके पास बेहतर विकल्प है, नीति है, योजना है और आप देश को चलाने की इस व्यवस्था में, लोकतंत्र में यकीन रखते हैं तो आगे आइए, इस व्यवस्था का हिस्सा बनिए और तब फैसले लीजिए. आलोचना के आवरण में छिपकर वार मत कीजिए.

इससे कोई भी असहमत नहीं हो सकता. लेकिन सवा अरब लोग चुनाव नहीं लड़ सकते. इसलिए वे अपना नेता चुनते हैं. दिक्कत यह है कि ये चुने हुए प्रतिनिधि फिर उन्हीं लोगों से दूर हो जाते हैं. हमारे प्रधानमंत्री कारोबारियों की बैठकों में जाते हैं लेकिन जंतर-मंतर पर नहीं जाते जहां आम लोग अपनी शिकायतों को लेकर धरना देते हैं. आप निवेश लाने में, उसे जमीन पर उतारने में जितना समय देते हैं उतना वक्त उन लोगों को नहीं देते जो इस विकास में हिस्सेदारी की मांग करते हैं. हम योजना में इस कमी की बात कर रहे हैं. क्या यह खाई पाटना इतना मुश्किल है?
मुझे लगता है कि यह एकतरफा कथन है कि हम लोगों की नहीं सुनते, उनसे सुझाव नहीं लेते. जब मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र में होता हूं तो कितने ही लोगों से रोज मिलता हूं. आपको ऐसा क्यों लगता है कि हम इतने असंवेदनशील हैं? कोई मूर्ख ही होगा जो लोग क्या सोचते हैं इससे अपनी आंखें मूंदकर रखेगा. आप यह कह रहे हैं कि लोगों की सुनने के बाद भी हम गलत फैसले ले रहे हैं और आपके पास बेहतर योजना है. तो मैं आपके कथन का सम्मान करता हूं. मैं आपको आमंत्रित करता हूं कि आप मेरी जगह आएं और बेहतर फैसले लें. आपको लगता है कि यह बहुत मुश्किल है? नहीं है. जब मैं 24-25 साल का था और राजनीति में आ रहा था तो मुझे भी लगता था कि जो लोग सरकार में इतनी ऊंची जगहों पर हैं, उनकी बराबरी करना, उनके पदों तक पहुंचना बहुत मुश्किल है. लेकिन ऐसा नहीं है. मुझे लगता है कि नई पीढ़ी में कई लोग होंगे जो मुझसे बेहतर होंगे और जो मेरी जगह ले सकते हैं.

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