राजुला-मालूशाही (उत्तराखंड)

कत्यूरी राजवंश के एक राजकुमार मालूशाही और तिब्बत सीमा निवासी एक साधारण व्यापारी की पुत्री राजुला के प्रेम से उपजी यह कथा सदियों बाद भी उत्तराखंड के लोक गीतों में जिंदा है. सभी प्रेम कथाओं की तरह इस कथा में भी सामाजिक, जातीय, क्षेत्रीय और परंपरागत विषमताओं की बाधाएं हैं. कहानी का खलनायक दूसरे देश तिब्बत का है. पर दोनों प्रेमी अपनी जान की बाजी लगाते हुए दुनिया के इन बंधनों को तोड़ कर अंतत: एक होते हैं.

कथा की शुरुआत बैराठ (अब कुमाऊं में पड़ने वाला चौखुटिया क्षेत्र) से होती है जहां का संतानहीन राजा दुलाशाह संतान प्राप्ति के लिए बागनाथ में भगवान शिव की आराधना कर रहा है. वहीं पर शौका प्रदेश का एक व्यापारी सुनपत भी संतान की आकांक्षा लिए तप कर रहा है. दुलाशाह सुनपत को वचन देता है कि यदि उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है तो वह उस पुत्र की शादी भगवान के ही आशीर्वाद से होने वाली सुनपत की पुत्री से करेगा.

दुलाशाह के घर राजकुमार मालूशाही का जन्म होता है और सुनपत के घर सुंदर कन्या राजुला का. पर दुर्योग से राजकुमार के पैदा होने के कुछ समय बाद दुलाशाह की मृत्यु हो जाती है. राजा के मरते ही राजपरिवार अपना वचन भी भूल जाता है. बड़ा होते-होते राजकुमार की वीरता और राजुला की सुंदरता के किस्से कुमाऊं सहित पड़ोसी देशों में भी फैल जाते हैं. इन चर्चाओं को सुन कर हूणदेश (तिब्बत) का एक ताकतवर व्यापारी विखीपाल राजुला के पिता से उसका हाथ मांगता है. वह धमकी भी देता है कि यदि प्रेम-पूर्वक राजुला की शादी उससे नहीं की गई तो वह शौका प्रदेश को तहस-नहस करके राजुला को जबरदस्ती ले जाएगा. वर्षों से वैराठ से कोई संदेश न आने से असमंजस में पड़ा सुनपत, विखीपाल की धमकी से डरते हुए उसके आगे झुक जाता है.

इधर, राजुला और मालूशाही एक-दूसरे के सपने में आते हैं और एक-दूसरे को देखते ही मिलने के लिए व्याकुल हो जाते हैं. अपनी मां से रंगीले प्रदेश बैराठ के बारे में सुन कर राजुला हीरे की एक अंगूठी ले कर अकेली मालूशाही से मिलने पहुंचती है. उधर राजपरिवार मालूशाही को एक जड़ी सुंघा कर सुला देता है. राजुला अपने प्रियतम को अंगूठी पहना कर और संदेश छोड़ कर वापस अपने पिता के पास आ जाती है जहां उसके विवाह की तैयारियां चल रही होती हैं. जागने पर मालूशाही को जब राजुला का संदेश मिलता है तो वह उसे साधु भेष में पाने के लिए शौका प्रदेश की ओर बढ़ता है. वहां पहुंच उसे पता चलता है कि विखीपाल शादी करके रालुजा को हूण-देश ले जा चुका है. मालूशाही हूण-देश की ओर बढ़ता है. रास्ते में उसे मारने की कोशिश होती है. लेकिन वह राजुला के महल तक पहुंचने में कामयाब होता है. लेकिन यहां विखीपाल उसे जहर देकर मार देता है. पर गुरु गोरखनाथ मालूशाही को अपनी तांत्रिक विद्या से बचा लेते हैं. अंत में प्यार की जीत होती है. विखीपाल को युद्ध में हरा कर मालूशाही राजुला को बैराठ लाकर उससे विवाह करता है.

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