युवाओं का साथ पाने के लिए हुई हुंकार रैली

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Jignesh Mevani Rally

देश के जनसमाज को जागरूक करने के लिए देश का युवा वर्ग आज आंदोलन की राह पर है। जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल, और अल्पेश ठाकोर जैसे युवाओं ने आपसी एकजुटता के साथ एक राज्य में सत्ता को चुनौती दी। मुकाबला भी खासा चुनौती पूर्ण रहा। देश के युवाओं को साथ लेने की अपील के साथ दिल्ली में ‘युवा हुंकार रैलीÓ तमाम पुलिसिया-प्रशासनिक बाधाओं के बाद भी हुई।

इस रैली से यह आभास ज़रूर हुआ कि देश का युवा फिर सक्रिय है जनसमाज को साथ लेकर आंदोलन करने के लिए। वह भारतीय छात्रों को धर्मों और जातियों में नहीं बांटने देने चाहता। वह तो सस्ती, उपयोगी और उच्च स्तरीय शिक्षा और स्तरीय शोध की मांग कर रहा है। वह रोज़गार की बात कर रहा है। युवा लोगों की यह हुंकार रैली थी। इसमें वादा किया गया कि हर प्रदेश, हर जि़ले में छात्रों की अब बड़ी रैलियां होंगी। इस रैली में युवाओं ने किसी भी राजनीतिक दल से अपने जुड़ाव की बात नहीं की। अपनी निराशा की वजहें गिनाई। अपनी एकता पर ज़ोर दिया और दमन और गिरफ्तारियों का विरोध किया। संविधान को माना और कहा व्यवस्था परिवर्तन में अब अपनी हिस्सेदारी लेनी होगी।

नई दिल्ली में नौ जनवरी को संसद मार्ग पर युवाओं की हुंकार रैली हुई। गुजरात के युवा नेता जिग्नेश मेवाणी और कई दूसरे युवा नेताओं की अपील पर यह रैली आयोजित थी। यह रैली दूसरी रैलियों से कहीं अलग और जबरदस्त थी। यह

रैली बेरोजगारी दूर करने, सरकार की नाकामी और मुस्लिम एवं दलितों के दमन के विरोध में हुई।

पुलिस प्रशासन ने पहले यह प्रचारित किया कि रैली रद्द हो गई है। फिर सवाल उठाया गया कि क्या नियमों को तोड़ कर यह रैली होनी चाहिए थी। जिन्होंने हिम्मत की उन्हें दिल्ली क्षेत्र की सीमाओं पर ही रोक दिया गया। गाडिय़ों, बसों और ट्रकों में आ रहे युवाओं को रोक दिया गया।यह जानकारी दी आयोजकों ने। यह रैली इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रोक के बाद भी लोग जुटे। यहां विभिन्न जाति, संप्रदाय के युवक ही नहीं, युवतियां भी थीं।

इस रैली में गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी , कन्हैया कुमार, उमर खालिद, असम के किसान नेता अखिल गोगोई, शहला रशीद और कई युवा संगठनों के युवा नेताओं ने समानता की बात की। सामाजिक न्याय की बात की। इन वक्ताओं ने न सुनने वाली व्यवस्था को बदलने की बात की। देश के संविधान को सर्वोपरि माना। भगत सिंह, डा. अंबेडकर के दर्शन को माना और अपील की कि घर-घर से युवा निकलें और आंदोलन से जुडें़। हम शोषित किए जाते रहे हैं। संविधान को बदलने और महिलाओं को सम्मान नहीं देने वाले देशद्रोही हैं।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चिरपरिचित अंदाज में सीधे तौर पर मोदी सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि आज देश में भाजपा और आर एस एस के नेता विभाजन की रेखाएं खींच रहे हैं। जो लोग दलित और अल्पसंख्यक हैं और वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हां -हां में नहीं मिलाते हैं उन्हें गाली दी जाती है, उनके घर जलाए जाते हैं और मारपीट की जाती है। देश के किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है बस सरकार अम्बानी और अड़ानी को फायदा पहुंचाने पर सोचती है।सरकार की नीतियों में विकास की बात नहीं हो रही है उन्होंने कहा कि अभी हाल में जेएनयू में प्रोफेसर पद के चयन के लिये गौशाला के बारे में पूछा गया। इससे साफ होता है कि सरकार की सोच किस दिशा में जा रही है।

युवा नेता उमर खालिद ने तीखे अंदाज में सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मीडिया को निशाने पर लेते हुए कहा कि आज दोनों भटके हुए हैं। उन्होंने कहा कि साढ़े तीन साल पहले जब देश में मोदी की लहर और मोदी सरकार की बातें होती थी तो विपक्ष डरा था कि अब विपक्ष नहीं बचा है। लेकिन अब उस सरकार के दिन लदने वाले हैं। क्योंकि सरकार विकास की बात न करके धु्रवीकरण कर देश को बांटने में लगी है। सरकार दलित, किसानों और मजदूरों के साथ- साथ गरीबों की पढ़ाई के लिए तो पैसों का रोना रोती है जबकि अंबानी और अड़ानी के लिये हजारों करोड़ रुपये मांफ करने में लगी है।

खालिद ने कहा कि जिस तरह सन् 1857 में आजादी की लड़ाई लड़ी लगी थी उसी तर्ज पर किसानों ,अल्पसंख्यकों और दलितों के अधिकारों की लडाई लडी जा रही है। पुणे के कोरेगांव में दलितों पर जो आरएसएस और भाजपा ने साजिश रची है वह निदंनीय है। खालिद ने कहा कि सहारनपुर में चन्द्रशेखर पर जो रासुका लगाया गया है उसको हटाया जाए। दलित नेता सुनील तेवतिया और डॉ ए के गौतम ने कहा कि पुणे के कोरेगांव में दलितों के साथ आरएसएस और भाजपा ने किया है उसकी उच्चस्तरीय जांच हो और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो।