यह कैसी हरकत है सरकार!

इलस्ट्रेशन:मनीषा यादव
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव

एक खबर- सरकार हरकत में आई. हरकत… शब्द बहुत दिलचस्प है. जब यह सरकार के साथ जुड़ता है, तो अलग अर्थ देता है और जब आम आदमी के साथ चस्पा होता है, तो सर्वथा अलग. भला यह कैसी हरकत!   बचपन में जब कभी हम हरकत करते थे मास्साब की छड़ी हरकत करती थी. वो भी हमारे बदन पर. कई बार तो ऐसा होता था कि हम हरकत कम करते थे और मास्साब की छड़ी हमसे ज्यादा. मगर यहां क्या हो रहा है!

सरकार विधिवतरूप से हरकत कर भी नहीं रही है, खरामा-खरामा अभी तो वह हरकत में बस आई है कि पहले पेज की मुख्य खबर बन गई. हरकत में उसके आने का स्वागत हो रहा है. खबर सुनकर एकबारगी ऐसा लगता है जैसे सरकार आईसीयू में भर्ती हो, अचानक से उसके बदन में हरकत हुई हो. और लोग खुश.

देखो! देखो! हरकत कर रही है! हरकत हो रही है! नहीं, नहीं, अभी मरी नहीं, अभी जिंदा है हमारी सरकार. सरकार हरकत में आई! जाहिर-सी बात है अब तक वह शांत थी. अगर सरकार सोई हुई होती, तो कहा जाता सरकार जागी. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार सोई हुई नहीं होती, सब देखती-समझती है, मगर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है. अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि सरकार सही समय पर हरकत में नहीं आती. प्राय: लोग सरकार का मुंह जोहते रहते हंै कि सरकार कब हरकत में आएगी. जनता की तरह सरकार की भी याददाश्त थोड़ी कमजोर होती है. सरकार को याद दिलाना पड़ता है कि वह सरकार है. उसकी कुछ जिम्मेदारी है. इत्ती सी बात याद दिलाने के लिए बस जलाना, ट्रेन रोकना, भारत बंद जैसे पावन कृत्य करने पड़ते हैं. तब जाकर सरकार हरकत में आती है.

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