मायावती: मायामोह

0
173
फोटोः प्रमोद सिंह असिकारी
फोटोः प्रमोद सिंह अधिकारी

सात जुलाई, 2013. अपने ट्रेडमार्क दलित-ब्राह्मण सम्मेलनों के समापन के अवसर पर बसपा अध्यक्ष मायावती ने लखनऊ में एक बड़ी रैली आयोजित की थी. गर्मी और धूल-धक्कड़ से पस्त 50 हजार का जनसमूह इसी अवसर का साक्षी बनने के लिए उत्तर प्रदेश के कोने-कोने से लखनऊ पहुंचा था. मायावती मंच पर निर्धारित समय से थोड़ी देर से पहुंची थीं. उनके आने के साथ ही मंच से पंडितों का एक समूह वैदिक मंत्रोच्चार करने लगा. घंटे-घड़ियाल की गूंज और शंखनाद के चलते रैली स्थल पर किसी धार्मिक सीरियल का सा दृश्य उपस्थित हो गया था. इन सब औपचारिकताओं से निपटने के बाद जब माहौल थोड़ा शांत हुआ तब भीड़ से एकसुर नारा लगना शुरू हुआ- ‘औरों की मजबूरी है – मायावती जरूरी है’.

यह उन मायावती की चुनावी रैली में हो रहा था जिन्होंने एक समय मनुवाद और वैदिक परंपराओं की हर संभव शब्दों में निंदा की थी. जो नारा गूंज रहा था उसका संकेत यह था कि आज की तारीख में मायावती ब्राह्मणों की मजबूरी हैं. उसी सभा में मायावती ने लोकसभा के 38 उम्मीदवारों के नाम भी घोषित किए.

इनमें 21 ब्राह्मण और 17 दलित थे. इस सभा में मायावती ने जो भाषण दिया उसका सार यही था कि सब मिलकर यदि कोशिश करें तो इस बार वे केंद्र की सत्ता में जरूर पहुंचेंगी. दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी आकांक्षा सर्वसमाज के सहयोग से दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होने की है.

मायावती उन कुछेक नेताओं में से हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री पद की अपनी इच्छा को कभी दबाया-छिपाया नहीं. 2009 के लोकसभा चुनावों से पहले भी उन्होंने ऐसी ही इच्छा जाहिर की थी और अब 16वीं लोकसभा के लिए होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले उनकी यह इच्छा फिर से बलवती हो गई है. मायावती का प्रधानमंत्री बनना कई लिहाज से ऐतिहासिक होगा. वे महिला हैं, दलित हैं, क्षेत्रीय पार्टी की मुखिया हैं और इन सबसे ऊपर वे ‘सेल्फमेड’ हैं. फिलहाल उनके कद का दूसरा कोई भी दलित नेता भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में नजर नहीं आता. बाबू जगजीवन राम के बाद वे इकलौती दलित नेता हैं जो दिल्ली की शीर्ष सत्ता के इतने करीब आती दिखती हैं. उनके पास पीएम पद के सपने देखने की पर्याप्त वजहें भी हैं. पहली वजह है उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें. मायावती की रणनीति इनमें से कम से कम 40-45 सीटें जीतने की है. ऐसी स्थिति में बहुत संभव है कि केंद्र में बिखरा हुआ जनादेश आए. किसी एक पार्टी या गठबंधन का बहुमत न आने की सूरत में 40-45 सीटों वाली मायावती पीएम पद की रेस में खुद-ब-खुद शामिल हो जाएंगी. दरअसल मायावती समेत तमाम वे क्षेत्रीय नेता जो शीर्ष पद की इच्छा रखते हैं, उनकी उम्मीदों का आधार यही है-अपने लिए अधिक से अधिक सीटें और साथ में राष्ट्रीय स्तर पर एक क्षीण जनादेश.

मायावती के पास दलितों का एक समर्पित वोटबैंक है, लेकिन अकेले यह वोटबैंक उन्हें इतनी सीटों पर कामयाबी नहीं दिला सकता. जबकि अगर दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का फार्मूला कामयाब हो जाता है तो इतनी सीटें बहुत आसानी से जीती जा सकती हैं. स्थितियां कई लिहाज से मायावती के पक्ष में हैं. प्रदेश में सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी की दशा और आत्मविश्वास रसातल को छू रहा है. पिता-पुत्र की सरकार के प्रति एक बार फिर से उसी तरह के मोहभंग की स्थिति पैदा हो गई है जैसी 2007 में थी. तब विधानसभा के चुनावों में मायावती स्वाभाविक पसंद और विजेता बनकर उभरी थीं. इस बार मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के खिलाफ जो चीज जा रही है वह है मुसलमानों का उनसे पूरी तरह मोहभंग. अगर इस अलगाव का एक हिस्सा मायावती अपने साथ जोड़ पाती हैं तो वे दिल्ली की सत्ता के एक कदम और करीब पहुंच जाएंगी. मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों के दो स्वाभाविक लाभार्थी बसपा और भाजपा ही दिखाई पड़ते हैं. हालांकि यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थिति है, मध्य और पूरब के इलाकों में उन्हें मुसलमानों से जुड़ने के गंभीर प्रयत्न करने होंगे.

उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था वह मुद्दा है जिसकी सवारी मायावती आसानी से कर सकती हैं. इस मोर्चे पर देखा जाए तो उनका रिकॉर्ड ठीक-ठाक है. सपा के छुटभैये बेलगाम नेता और कार्यकर्ता फिर से सड़कों पर निकल चुके हैं. प्रदेश में उनके उपद्रव की घटनाएं सुर्खियां बन रही हैं. एक वरिष्ठ समाजवादी नेता का एक बयान यहां फिर से मौजूं हो गया है- ‘सपाई कार्यकर्ता को तब तक यह विश्वास नहीं होता कि सूबे में उसकी सरकार है जब तक वह किसी दरोगा को दो तमाचा न मार ले.’

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here