मजबूर मजदूर!

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

फरवरी की एक सुबह. गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायालय में सामान्य दिनों की तरह ही कामकाज चल रहा है. अलग-अलग मामलों में आरोपित लोगों को पेशी के लिए लाया जा रहा है. इस सब के बीच हिमाचल से आईं 22 वर्षीय पूनम और उनके पिता विनोद कुमार शर्मा बड़ी ही बेताबी से किसी की तलाश कर रहे हैं. दोनों उन लोगों के चेहरों को बड़े ही गौर से देख रहे हैं जिन्हें पुलिस कोर्ट में पेशी के लिए ले जा रही है. एकाएक पूनम किसी को देखती है और हाथ हिलाकर इशारा करती है. इसके जवाब में सामने से 24-25 साल का एक नौजवान जिसे पुलिस के दो लोग कोर्ट में ले जा रहे हैं, हाथ हिलाता है और मुस्कुराता है. इस दौरान पूनम के चेहरे पर एक साथ दो विपरीत भाव उभरते हैं. वे गीली आंखों के साथ मुस्कुराती हैं. जिसे देखकर पूनम के चेहरे पर ये भाव आते हैं वह उनका बड़ा भाई राहुल रत्न है.

राहुल उन 147 मजदूरों में शामिल है जो जुलाई 2012 को मारुति के मानेसर इकाई में मजदूरों और प्रबंधन के बीच हुई झड़प के बाद से जेल में बंद हैं. इसी घटना में कंपनी के महाप्रबंधक (एचआर) अवनीश कुमार देव की जलने से मौत हो गई थी.

जुलाई 2012 की इस घटना से कोई चार महीने पहले तहलका ने मारुति के मानेसर इकाई में काम करने वाले मजदूरों में फैले गहरे असंतोष पर एक रिपोर्ट की थी – ‘क्या अब भी देश मारुति में सफर करना चाहता है?’  इस रिपोर्ट में तहलका की कई मजदूरों से बातचीत हुई थी. इनमें से एक गजेंद्र सिंह ने मारुति में काम करने वाले मजदूरों की हालत को कुछ इस तरह बयान किया था, ‘हमें नौ घंटे की शिफ्ट में साढ़े सात मिनट के दो ब्रेक मिलते हैं. इसी में आपको पेशाब भी करना है और चाय-बिस्कुट भी खाना है. ज्यादातर मौकों पर तो ऐसा होता है कि हमारे एक हाथ में चाय होती है और एक हाथ में बिस्कुट और हम शौचालय में खड़े होते हैं.’

छुट्टियों और मेडिकल सुविधाओं को लेकर भी मारुति के मानेसर इकाई में काम करने वाले मजदूरों में असंतोष था. उस समय मारुति प्रबंधन के खिलाफ चल रहे अभियान में मजदूरों के बीच समन्वय का काम करने वाले सुनील कुमार ने बताया था, ‘कागजी तौर पर तो हमें कई छुट्टियां दिए जाने का प्रावधान है लेकिन हकीकत यह है कि यहां छुट्टी पर जाने पर काफी पैसे कट जाते हैं. एक कैजुअल लीव लेने पर कंपनी प्रबंधन 1,750 रुपये पगार में से काट लेती है. यह प्रबंधन पर निर्भर करता है कि वह कितना पैसा काटेगा. महीने में आठ हजार रुपये तक छुट्टी करने के काट लिए जाते हैं. आपने चार दिन की छुट्टी ली और यह इस महीने की 29 तारीख से अगले महीने की दो तारीख तक की है तो आपके दो महीने के पैसे यानी 16,000 रुपये तक कट जाएंगे.’

उस वक्त मजदूर, कंपनी प्रबंधन की वादाखिलाफी से भी बहुत नाराज थे. प्रबंधन और मजदूरों के बीच हुए समझौते के कई महीने बाद तक भी प्रबंधन ने शिकायत निवारण और मजदूर कल्याण समिति का गठन नहीं किया था. वर्ष 2011 में मानेसर संयंत्र में हुई हड़ताल के बाद कंपनी ने मजदूरों के सामने काम पर आने से पहले ‘गुड कंडक्ट बॉंड’ साइन करने की शर्त रख दी थी . इसके जरिये मजदूरों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए थे. तत्कालीन श्रममंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने संसद में ही इस बॉंड की आलोचना की थी. इसी तरह के माहौल में कंपनी में जुलाई 2012 की घटना घट गई.

हालांकि इस घटना के बाद तहलका से बात करते हुए मारुति के मुख्य परिचालन अधिकारी (एडमिनिस्ट्रेशन) एसवाई सिद्दीकी ने मजदूरों के सभी आरोपों को खारिज कर दिया था. समितियों के गठन न करने के बारे में सिद्दीकी का कहना था कि मजदूरों ने ही अपने प्रतिनिधियों को नामित नहीं किया इसलिए समितियों का गठन नहीं हो सका.

जब हम पूनम से बात करते हैं तो जानकारी मिलती है कि उसकी शादी पिछले साल नवंबर में हुई है और उसका भाई तब शादी में शामिल नहीं हो पाया था सो इस दफा वे अपने पापा के साथ उससे मिलने गुड़गांव आई हैं. पूनम कहती हैं, ‘पापा ने तब भईया की छुट्टी के लिए कोर्ट में अर्जी लगाई थी. लेकिन कोर्ट से एक ही दिन की छुट्टी मंजूर हुई थी सो वो नहीं आ सका. अब जज साहब को कौन समझाए कि हिमाचल जाकर कोई एक दिन में नहीं लौट सकता है.’

अभी पूनम ने अपनी बात खत्म ही की थी कि पास ही खड़े राहुल के पिता जो अब तक हमारी बातचीत सुन रहे थे बोल पड़े, ‘इससे तो अच्छा यही होता कि बेटा पहाड़ में ही रहता. आज तो स्थिति यह है कि हर दस-पंद्रह दिन में हिमाचल से गुड़गांव आना पड़ता है. रात स्टेशन पर गुजारनी पड़ती है. और कोर्ट-कचहरी के चक्कर अलग से.”

राहुल के पिता और बहन अकेले नहीं हैं जो पिछले डेढ़ साल से गुड़गांव में कोर्ट और वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं. इनके जैसे और भी लोग हैं. 55 वर्षीय प्यारो देवी भी हिमाचल से ही आईं हैं. इनका 25 वर्षीय बेटा सुरेश भी इन्हीं  147 मजदूरों में शामिल है. प्यारो देवी हर सुनवाई पर आती हैं ताकि सुरेश को देख सकें. सुरेश इनका इकलौता बेटा है. जब हम प्यारो से सुरेश के बारे में पूछते हैं तो वे कहती हैं, ‘मेरा बेटा तो कमाने के लिए घर से आया था. पता नहीं कंपनी वाले कैसे यह कह रहे हैं कि उसने कंपनी में आग लगा दी. वो तो कभी गांव में भी किसी से नहीं उलझा.’ इतना कहकर प्यारो देवी फफक-फफक कर रोने लगती हैं.

हम आगे बढ़ते हैं. प्यारो देवी, पूनम और विनोद शर्मा जैसे और भी बहुत से लोग हैं जिनके पास अपनी-अपनी कहानी है. इनके भाई, बेटे और भतीजे मारुति संयंत्र में जुलाई 2012 में घटी घटना के सिलसिले में पिछले 19 महीनों से जेल में बंद हैं. इनमें से किसी को भी अभी तक जमानत नहीं मिल सकी है.

फोटोः गरिमा जैन
फोटोः गरिमा जैन

इस मामले में मजदूरों की तरफ से केस की पैरवी रघुवीर सिंह हुड्डा कर रहे हैं. ‘देेखिए पुलिस ने अपनी चार्जशीट में इन सब पर आईपीसी की धारा 302(हत्या), 307(हत्या करने का प्रयास करना), 147(दंगा करना), 353(सरकारी काम में बाधा पहुंचाना), 436(आग लगाना) और 120बी(साजिश करना) के तहत मामला बनाया है. ये सारी गैर जमानती धाराएं हैं. आमतौर पर ऐसे मामलों में निचली अदालतें जमानत नहीं देतीं. ऊपर से यह मामला थोड़ा ज्यादा ही चर्चित हो चुका है’ हुड्डा कहते हैं, ‘हमने नौ मजदूरों की जमानत के लिए हरियाणा उच्च न्यायालय में भी अपील की थी लेकिन न्यायालय ने जमानत देने से ये कहकर इनकार कर दिया कि इससे हरियाणा में हो रहे वैश्विक पूंजी निवेश पर विपरीत असर पड़ेगा. हमने हरियाणा उच्च न्यायालय के इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चैलेंज किया तो वहां से कहा गया कि पहले सभी गवाहों के बयान दर्ज हो जाएं फिर सोचा जा सकता है इस बारे में.’

इसी बातचीत के दौरान रघुवीर सिंह हमें पुलिस द्वारा इस मामले में जमा की गई चार्जशीट का एक हिस्सा दिखाते हैं. चार्जशीट के इस हिस्से में चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज हैं. गवाह नंबर नौ ने अपने बयान में कुल 25 मजदूरों के नाम लिए हैं जिनके नाम अंगेजी के अक्षर  ‘ए’ से ‘जी’ तक हैं. गवाह नं.10 ने भी अपने बयान में गिनकर 25 मजदूरों को ही देखने की बात स्वीकारी है. इनके नाम क्रम से अंग्रेजी के अक्षर ‘जी’ से ‘पी’ तक हैं. गवाह नंबर 11 ने जिन पच्चीस मजदूरों के नाम लिए हैं वे अंग्रेजी के ‘पी’ से ‘एस’ तक हैं.  गवाह नंबर 12 ने अपने बयान में 14 मजदूरों के नाम लिए हैं और ये नाम अंग्रेजी के ‘एस’ से ‘वाई’ तक हैं. इसके अलावा इन सभी चार गवाहों के बयान बिल्कुल एक जैसे ही हैं. जैसेकि इन सभी गवाहों ने अपने बयान के अंत में कहा है, ’इनके अलावे और तीन-चार सौ मजदूर थे जो अपने हाथ में डोरबीम लिए हुए थे और कंपनी के बाहर चले गए और मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई.’

पुलिस चार्जशीट का यह हिस्सा दिखाने के बाद रधुवीर सिंह कहते हैं. ‘पहली ही नजर में यह साफ जान पड़ता है कि ये सारे बयान किसी एक ही आदमी ने लिखे हैं और इनमें जो नाम लिए गए हैं वो कंपनी के किसी रजिस्टर से देखकर लिखे गए हैं. ऐसा कैसे संभव है कि सभी गवाह कुछ खास अक्षर से शुरू होने वाले 25 नामों को ही देखते है.’

वहीं जुलाई 2012 की उस घटना के बाद मारुति ने अपनी मानेसर इकाई से 546 स्थायी और 1800 अस्थाई मजदूरों को काम से हटा दिया था. गुड़गांव निवासी राम निवास मारुति की मानेसर इकाई में पिछले नौ साल से काम कर रहे थे. इन्हें भी नौकरी से निकाल दिया गया. कंपनी से निकाले जाने के बाद से वे बेरोजगार हैं. मारुति से निकाले जाने वाले लोगों को कहीं और काम मिलने में बेहद परेशानी पेश आ रही है.

‘हर तरफ घूम लिए जी. कोई काम नहीं दे रहा. सो अब इस लड़ाई में ही लग गए हैं. सोच रहे हैं कि जब कामधाम है नहीं तो क्यों न लड़ा ही जाए’ रामनिवास कहते हैं, ‘जुलाई वाली घटना से कंपनी को कोई नुकसान हुआ है क्या. कंपनी का केस हरियाणा सरकार लड़ रही है. प्लांट में फिर से काम शुरू हो चुका है. और उस घटना में जो थोड़ा बहुत नुकसान हुआ उसके पैसे बीमा से मिल ही गए होंगे.’ रामनिवास पूरे रौ में हैं वे आगे कहते हैं, ‘अब दूसरे पक्ष को देखिए. देखिए कि उस घटना से किसकी रीढ़ की हड्डी टूटी और कौन आज भी पिस रहा है. उस दिन जिस एचआर मैनेजर की मौत हुई वो मजदूरों के हिमायती थे. मजदूरों से उनकी अच्छी पटती थी. उनकी हत्या हो गई. इस हत्या का दोष लगाकर कंपनी के यूनियन के ज्यादातर साथियों को और दूसरे निर्दोष मजदूरॊं को जेल में ठूंस दिया गया. बाकियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.’

मारुति में काम करने वाले एक मजदूर हमें बताते हैं, ‘इस घटना के बाद पूरे गुड़गांव के मजदूरों में एक भय है. उन्हें प्लांट में यह कहा जाता है कि अगर किसी ने भी ज्यादा यूनियनबाजी की तो उसका भी वही हश्र होगा जो मारुति वाले मजदूरों का हो रहा है. यह सब केवल मजदूरों की आवाज को दबाने का एक तरीका है.’

इन तर्कों में दम लगता है और तथ्यों के उभार के संकेत भी मिलते हैं. हम इसकी पड़ताल के लिए मारुति प्रबंधन से संपर्क करने की कोशिश करते हैं. कई अधिकारियों से बात भी होती है लेकिन वे आधिकारिक तौर पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं होते. हां, कुछ यह जरूर कहते हैं कि मजदूरों द्वारा कही गई तमाम बातों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.

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