मजबूर मजदूर!

हम आगे बढ़ते हैं. प्यारो देवी, पूनम और विनोद शर्मा जैसे और भी बहुत से लोग हैं जिनके पास अपनी-अपनी कहानी है. इनके भाई, बेटे और भतीजे मारुति संयंत्र में जुलाई 2012 में घटी घटना के सिलसिले में पिछले 19 महीनों से जेल में बंद हैं. इनमें से किसी को भी अभी तक जमानत नहीं मिल सकी है.

फोटोः गरिमा जैन
फोटोः गरिमा जैन

इस मामले में मजदूरों की तरफ से केस की पैरवी रघुवीर सिंह हुड्डा कर रहे हैं. ‘देेखिए पुलिस ने अपनी चार्जशीट में इन सब पर आईपीसी की धारा 302(हत्या), 307(हत्या करने का प्रयास करना), 147(दंगा करना), 353(सरकारी काम में बाधा पहुंचाना), 436(आग लगाना) और 120बी(साजिश करना) के तहत मामला बनाया है. ये सारी गैर जमानती धाराएं हैं. आमतौर पर ऐसे मामलों में निचली अदालतें जमानत नहीं देतीं. ऊपर से यह मामला थोड़ा ज्यादा ही चर्चित हो चुका है’ हुड्डा कहते हैं, ‘हमने नौ मजदूरों की जमानत के लिए हरियाणा उच्च न्यायालय में भी अपील की थी लेकिन न्यायालय ने जमानत देने से ये कहकर इनकार कर दिया कि इससे हरियाणा में हो रहे वैश्विक पूंजी निवेश पर विपरीत असर पड़ेगा. हमने हरियाणा उच्च न्यायालय के इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चैलेंज किया तो वहां से कहा गया कि पहले सभी गवाहों के बयान दर्ज हो जाएं फिर सोचा जा सकता है इस बारे में.’

इसी बातचीत के दौरान रघुवीर सिंह हमें पुलिस द्वारा इस मामले में जमा की गई चार्जशीट का एक हिस्सा दिखाते हैं. चार्जशीट के इस हिस्से में चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज हैं. गवाह नंबर नौ ने अपने बयान में कुल 25 मजदूरों के नाम लिए हैं जिनके नाम अंगेजी के अक्षर  ‘ए’ से ‘जी’ तक हैं. गवाह नं.10 ने भी अपने बयान में गिनकर 25 मजदूरों को ही देखने की बात स्वीकारी है. इनके नाम क्रम से अंग्रेजी के अक्षर ‘जी’ से ‘पी’ तक हैं. गवाह नंबर 11 ने जिन पच्चीस मजदूरों के नाम लिए हैं वे अंग्रेजी के ‘पी’ से ‘एस’ तक हैं.  गवाह नंबर 12 ने अपने बयान में 14 मजदूरों के नाम लिए हैं और ये नाम अंग्रेजी के ‘एस’ से ‘वाई’ तक हैं. इसके अलावा इन सभी चार गवाहों के बयान बिल्कुल एक जैसे ही हैं. जैसेकि इन सभी गवाहों ने अपने बयान के अंत में कहा है, ’इनके अलावे और तीन-चार सौ मजदूर थे जो अपने हाथ में डोरबीम लिए हुए थे और कंपनी के बाहर चले गए और मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई.’

पुलिस चार्जशीट का यह हिस्सा दिखाने के बाद रधुवीर सिंह कहते हैं. ‘पहली ही नजर में यह साफ जान पड़ता है कि ये सारे बयान किसी एक ही आदमी ने लिखे हैं और इनमें जो नाम लिए गए हैं वो कंपनी के किसी रजिस्टर से देखकर लिखे गए हैं. ऐसा कैसे संभव है कि सभी गवाह कुछ खास अक्षर से शुरू होने वाले 25 नामों को ही देखते है.’

वहीं जुलाई 2012 की उस घटना के बाद मारुति ने अपनी मानेसर इकाई से 546 स्थायी और 1800 अस्थाई मजदूरों को काम से हटा दिया था. गुड़गांव निवासी राम निवास मारुति की मानेसर इकाई में पिछले नौ साल से काम कर रहे थे. इन्हें भी नौकरी से निकाल दिया गया. कंपनी से निकाले जाने के बाद से वे बेरोजगार हैं. मारुति से निकाले जाने वाले लोगों को कहीं और काम मिलने में बेहद परेशानी पेश आ रही है.

‘हर तरफ घूम लिए जी. कोई काम नहीं दे रहा. सो अब इस लड़ाई में ही लग गए हैं. सोच रहे हैं कि जब कामधाम है नहीं तो क्यों न लड़ा ही जाए’ रामनिवास कहते हैं, ‘जुलाई वाली घटना से कंपनी को कोई नुकसान हुआ है क्या. कंपनी का केस हरियाणा सरकार लड़ रही है. प्लांट में फिर से काम शुरू हो चुका है. और उस घटना में जो थोड़ा बहुत नुकसान हुआ उसके पैसे बीमा से मिल ही गए होंगे.’ रामनिवास पूरे रौ में हैं वे आगे कहते हैं, ‘अब दूसरे पक्ष को देखिए. देखिए कि उस घटना से किसकी रीढ़ की हड्डी टूटी और कौन आज भी पिस रहा है. उस दिन जिस एचआर मैनेजर की मौत हुई वो मजदूरों के हिमायती थे. मजदूरों से उनकी अच्छी पटती थी. उनकी हत्या हो गई. इस हत्या का दोष लगाकर कंपनी के यूनियन के ज्यादातर साथियों को और दूसरे निर्दोष मजदूरॊं को जेल में ठूंस दिया गया. बाकियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.’

मारुति में काम करने वाले एक मजदूर हमें बताते हैं, ‘इस घटना के बाद पूरे गुड़गांव के मजदूरों में एक भय है. उन्हें प्लांट में यह कहा जाता है कि अगर किसी ने भी ज्यादा यूनियनबाजी की तो उसका भी वही हश्र होगा जो मारुति वाले मजदूरों का हो रहा है. यह सब केवल मजदूरों की आवाज को दबाने का एक तरीका है.’

इन तर्कों में दम लगता है और तथ्यों के उभार के संकेत भी मिलते हैं. हम इसकी पड़ताल के लिए मारुति प्रबंधन से संपर्क करने की कोशिश करते हैं. कई अधिकारियों से बात भी होती है लेकिन वे आधिकारिक तौर पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं होते. हां, कुछ यह जरूर कहते हैं कि मजदूरों द्वारा कही गई तमाम बातों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.

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