ब्रेकिंग न्यूज : ऑपरेशन ओसामा

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लेकिन इससे हमारे कल्पनाशील न्यूज चैनलों को कहां फर्क पड़ता है? एयर टाइम भरने के लिए ‘खबर’ को फैलाने और तानने की उनकी क्षमता असंदिग्ध है. जाहिर है कि लादेन के मारे जाने की खबर के मामले में भी उन्होंने सूचनाओं, तथ्यों और ताजा फुटेज की कमी की भरपाई अपनी कल्पनाशीलता, कच्ची-पक्की कहानियों, ओसामा के पुराने फाइल फुटेज और स्टूडियो में एंकर और न्यूज रूम में रिपोर्टर की सांस फुलाने वाली उत्साह और उत्तेजना से भरी कमेंट्री के साथ की. उत्साह और उत्तेजना का आलम यह था कि एंकर-रिपोर्टर ओबामा को ओसामा और ओसामा को ओबामा बनाने से नहीं चूके. कारण, चैनलों में हमेशा की तरह एक-दूसरे से आगे रहने की होड़ लगी हुई थी. इसी हड़बड़ी और उत्साह में कई चैनलों ने मृत ओसामा की (फर्जी) तसवीर भी दिखानी शुरू कर दी, यह चेतावनी देते हुए कि ‘ये तसवीरें आपको विचलित कर सकती हैं.’ कहना मुश्किल है कि चैनलों के संपादकों को इस तसवीर ने विचलित किया या नहीं. लेकिन इस ‘तसवीर’ की सच्चाई यह थी कि यह इंटरनेट पर 2009 से मौजूद थी और हुआ यह होगा कि चैनलों के उत्साही रिसर्चरों ने जैसे ही गूगल के इमेज सर्च में यह तसवीर देखी होगी, बिना जांच-पड़ताल के लपक लिया होगा.
चलिए मान लिया कि ‘बड़ी-बड़ी खबरों के साथ-साथ छोटी-छोटी गलतियां’ होती रहती हैं. लेकिन यहां तो पूरी कहानी ही फिल्मी थी. हालांकि इसमें अपने देसी चैनलों की गलती (अगर मानें तो) सिर्फ इतनी थी कि वे इस अमेरिकी फिल्मी कहानी को बिना सोचे-समझे ज्यों का त्यों रिले कर रहे थे. अमेरिका ने ओसामा के मारे जाने की जो कहानी गढ़ी उसमें शुरू से इतने झोल थे कि खुद उसे कई बार कहानी बदलनी पड़ी.

imagesCAVQZ0ACनतीजा, कमांडो ऑपरेशन के एक सप्ताह बाद भी हर दिन अमेरिकी प्रशासन से कभी ऑन द रिकॉर्ड और कभी ऑफ द रिकॉर्ड आधी सच्ची-आधी झूठी खबरें प्लांट की जा रही हैं. अमेरिकी मीडिया इसे एक धारावाहिक सीरियल की तरह से छाप और दिखा रहा है. देसी चैनल भी पूरी स्वामिभक्ति के साथ इस जूठन को परोसने में जुटे हुए हैं. इस तरह हर दिन परस्पर विरोधी खबरें एक नये एंगल, कुछ नये मिर्च-मसाले के साथ बतौर ‘एक्सक्लूसिव’ छापी और दिखाई जा रही हैं. रही-सही कसर अपने देसी न्यूज चैनलों के अत्यंत सृजनशील आउटपुट डेस्क पर पूरी हो जाती है जो तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाने के उस्ताद हैं.  इस तरह चैनलों पर ऑपरेशन ओसामा के नाम पर अभी भी उल्टी-पुल्टी ‘खबरें’ जारी हैं. लगता है कि चैनल खुद भी यह नहीं देखते कि उन्होंने कल क्या दिखाया था.

कहने की जरूरत नहीं है कि एबटाबाद ऑपरेशन के बारे में ऐसा बहुत कुछ है जिसे अमेरिका और पाकिस्तान दोनों छिपा रहे हैं. संभव है कि कुछ महीनों या सालों (जैसे ओबामा के दोबारा चुनाव) के बाद विकीलिक्स की कृपा से सच्चाई सामने आए क्योंकि अभी तो अमेरिकी मीडिया ओसामा के मारे जाने की ‘राष्ट्रीय उपलब्धि’ से उछल रहा है और भारतीय चैनल भी ‘अमेरिकी बहादुरी’ से पूरी तरह से अभिभूत हैं. नतीजा, देशी चैनलों का राष्ट्रवाद भी जोर मार रहा है और हमेशा की तरह बहस शुरू हो गई है कि हम भी पाकिस्तान के अंदर घुसकर ऐसी ही कमांडो कार्रवाई क्यों नहीं करते.

चैनलों पर एंकरों के नथुने फड़क रहे हैं, सुरक्षा विशेषज्ञ, डिप्लोमैट और सेना के पूर्व जनरल ललकार रहे हैं और राजनेता चेतावनियां दे रहे हैं. लेकिन कोई नहीं बता रहा कि ऐसी कार्रवाई के क्या नतीजे हो सकते हैं. ऐसे मौकों पर अगर किसी ने तर्क और विवेकपूर्ण बात कहने की कोशिश की तो स्टार एंकरों की खिसियाहट, चिढ़ और गुस्सा देखते ही बनता है. किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘युद्ध इतना गंभीर मामला है कि इसे जनरलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.’ अब इसमें यह जोड़ लेना चाहिए कि खबरें इतना गंभीर मुद्दा हैं कि उन्हें न्यूज चैनलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.

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