बाबा को बीस साल का कारावास | Tehelka Hindi

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बाबा को बीस साल का कारावास

September 5, 2017

सिरसा के डेरा प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को आखिर कार अपने गुनाहों की सजा मिल ही गई। दो साध्वियों का यौन शौषण करने के दो अलग-अलग मामलों में गुरमीत सिंह को सीबीआई की विशेष अदालत ने 10-10 साल की कैद और 15-15 लाख रुपए जुर्माने की सज़ा सुनाई है। इन 15-15 लाख में से 14-14 लाख रुपए उन साध्वियों को मिलेंगे जिनका यौन शोषण डेरा प्रमुख ने किया था। ये दोनों सजाएं अलग-अलग चलेंगी। एक पूरी होने के बाद दूसरी शुरू होगी। इस तरह उसे कुल 20 साल जेल में रहना होगा।

यह फैसला आने में 15 साल का समय लग गया। घटना के समय डेरा प्रमुख का इतना प्रभाव था कि साध्वियों को एक गुमनाम पत्र देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाज़पेयी को लिखना पड़ा। उनमें इतना साहस नहीं था कि वे उसमें अपनी पहचान लिख पाती। उनका यह भय सही भी साबित हुआ जब उस पत्र को अपने अखबार ‘पूरा सचÓ में छापने वाले सिरसा के साहसी पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या डेरे के लोगों ने कर दी। छत्रपति को उसके घर के बाहर गोली का निशाना बनाया गया। गोली लगने के लगभग 28-29 दिन तक छत्रपति जि़दा रहा लेकिन पुलिस ने उसका बयान तक दर्ज नहीं किया । पुलिस में दर्ज एफआईआर में छत्रपति के बेटे और खुद छत्रपति ने गुरमीत सिंह का नाम लिखवाया पर पुलिस ने नहीं लिखा। यह मामला आज भी अदालत में चल रहा है। बलात्कार की शिकार दो साध्वियों को तो 15 साल बाद इंसाफ मिल गया, पर आज 16 साल बाद भी छत्रपति के परिवार को न्याय का इंतजार है। छत्रपति हत्या मामले की अगली सुनवाई अब 16 सितंबर को होनी है।

इस बीच गुरमीत सिंह की माता नसीब कौर ने अपने पौत्र जसमीत सिंह को डेरे का प्रमुख मनोनीत कर दिया है। रामरहीम के सभी बच्चों में से जसमीत सबसे बड़ा है। उसका विवाह कांग्रेस के पूर्व विधायक हरमिंदर जस्सी की बेटी हुस्नप्रीत इंसा से हुआ है। जसमीत के अलावा गुरमीत सिंह की दो बेटियां चरणप्रीत और अमनप्रीत भी हैं। ये दोनों शादीशुदा हैं। हालांकि नसीब कौर ने जसमीत को मनोनीत किया है पर आशंका यह है कि गुरमीत के बाकी बच्चे और दामाद भी इस गद्दी पद अपना दावा पेश कर सकते हैं।

गुरमीत सिंह को अब सज़ा हो चुकी है पर जिस दिन उसे दोषी करार दिया गया उस दिन हरियाणा और पंजाब में जो कुछ हुआ वह निंदनीय है । ऐसे समय में भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने जिस तरह का बयान दिया वह भी निंदनीय है। उस दिन गुरमीत की पेशी पंचकूला की अदालत में थी। किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए धारा-144 लगा दी गई थी। पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान चप्पे-चप्पे पर नजऱ रखे थे। शिमला की ओर से आने वाली गडिय़ों को चंडीगढ़ में प्रवेश नहीं दिया जा रहा था। उन्हें जीरकपुर या फिर पंचकूला के बीच से हो कर आने को मजबूर किया जा रहा था। लेकिन डेरे के लोग तीन दिन पहले से ही सड़कों के किनारे जमा हो रहे थे।

पहले यह कहा कि किसी तरह की संभावित अराजकता को रोकने के लिए लगाई गयी धारा -144 इन अनुयाइयों पर लागू नहीं होगी और जब यौन शोषक बाबा को साध्वियों से दुष्कर्म का दोषी करार दिया तो उसके अराजक अनुयायियों ने सड़कों पर तांडव मचा दिया।

देश के इतिहास में हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार को वैसी ही कमजोर सरकार मानी जाएगी जैसी 1984 में इंदिरा गांधी के हत्या के बाद हजारों सिखों की हत्या के दौरान राजीव गांधी सरकार कमजोर दिखी थी। राजीव सरकार और कांग्रेस के लोगों पर उन दंगों को शह देने का गंभीर आरोप लगा था और मनोहर लाल खट्टर सरकार पर भी दरियादिली दिखाने का आरोप लगा है। दोनों ही मौकों पर सत्ता में विराजमान लोगों ने उस जनता को आराजकता से बचाने के लिए, जिसके प्रति वह जिम्मेवार और जवाबदेह थी, तब कदम उठाये जब बहुत कुछ तबाह हो चुका था। यदि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने सख्ती नहीं दिखाई होती तो हालात क्या रहे होते, समझा जा सकता है। यह खट्टर सरकार की नाकामी का ही सबूत है कि न्यायालय को दखल देकर जनता और सम्पति की सुरक्षा के लिए सख्त निर्देश जारी करने पड़े।

पूरे देश में चर्चा थी कि गुरमीत राम रहीम को सजा मिलने की स्थिति में उस के लाखों की संख्या में पंचकूला में जमा हो रहे डेरा समर्थक अराजकता फैला सकते हैं। धारा 144 लगे होने के बावजूद ये समर्थक हाथों में लाठियां, पत्थर लेकर आ रहे थे। हैरानी की बात यह कि सरकार ने धारा 144 लगाने के लिए जो अधिसूचना जारी की उसमें कहीं भी यह जिक्र नहीं किया कि एक जगह पांच लोग इक्कठे नहीं हो सकते। कोर्ट में खट्टर सरकार की इस कोताही का जब खुलासा हुआ तो सरकार को फटकार सुननी पडी लेकिन तब तक तबाही हो चुकी थी।

इस मामले में तो खट्टर सरकार की पुलिस रक्षात्मक दिखी। उपद्रवियों ने बार बार उसे पीछे खदेड़ा और कई बार तो पुलिस के लोग जान बचाते दिखे। पंचकूला की उपायुक्त को भी जान बचाने किए लिए लोहे की कांटेदार बाड़ फलांगनी पड़ी। मीडिया के लोगों पर भी हमले हुए। तीन टीवी चैनलों की ओबी वैन और पत्रकारों की दो मोटरसाइकिल सड़क पर पलटा कर जला दी गईं और करीब 150 सरकारी-निजी कारों और मोटर साइकिल को आग के हवाले कर दिया गया। कम से काम आध दर्जन पत्रकार इन हमलों में घायल हुए। इसके अलावा कुछ सरकारी और अर्धसरकारी भवन भी आग की भेंट चढ़ा दिए गए।

पंचकूला का आसमान काले धुएं के बादलों से भर चुका था और आसपास के सेक्टरों में घरों में रह रहे लोग खौफ में थे। घटना स्थल पर इस बबंडर को कवर कर रहे निजी टीवी चैनल एबीपी के संवाददाता जगविंदर पटियाल ने बताया कि उन्होंने साफ देखा कि पुलिस और सुरक्षा बलों का आतताइयों के सामने बस नहीं चल रहा था। उपद्रवी उन्हें बार बार पीछे धकेल दे रहे थे। दरअसल उपद्रवियों की तादाद पुलिस से तीस गुना से भी ज्यादा थी। आखिर जब पुलिस नाकाम रही तो सेना को मोर्चा संभालना पड़ा। सेना ने मोर्चा सँभालते ही लाऊड स्पीकर पर चेतावनी दी कि जो कोइ भी उपद्रव करता दिखेगा उसे गोली मार दी जाएगी। इसके बाद जाकर कहीं तांडव पर लगाम लग सकी। हालांकि तब तक बहुत नुक्सान हो चुका था। कुल 38 लोगों की जान चली गयी और 204 के करीब अस्पताल पहुँच गए। इनमें से कई अभी भी इलाज करवा रहे हैं।

इस बलात्कार केस में फैसला आने के बाद हुई हिंसा को लेकर नई जानकारियां सामने आ रही हैं। चैंकाने वाला खुलासा सीआईडी की रिपोर्ट कर रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक इतनी बड़ी तादाद में बाबा के समर्थक इसलिए जुटे क्योंकि उन्हें बताया गया था कि बाबा की फिल्म की शूटिंग हो रही है। मिली जानकारी के मुताबिक पंचकूला में पूरी स्ट्रैटजी के तहत बाबा ने अपनी टीम तैयार कर रखी थी। टीम में पांच लोग थे। आदित्य इंसा, धीमान इंसा, दिलावर इंसा, पवन इंसा और मोहिंदर इंसा। इन पांच लोगों को तय करना था कि बाबा बरी हुए तो क्या करना है, दोषी पाए गए तो क्या हंगामा करना है। इस संवाददाता के पास एक ऑडियो रेकार्डिंग है जिसमें डेरा के दो समर्थक बातचीत कर रहे हैं कैसे उपद्रव फैलाना है। यह भी कहा जा रहा कि कोइ डेरा अनुयाई पुलिस या पत्रकारों से यह नहीं कहेगा कि उसे यहाँ आने के लिए ऊपर से कोइ आदेश है। यही कहना है कि अपनी मर्जी से आये हैं।

रेप केस के आरोपी बाबा को सजा के बाद मचे बबाल में जमकर उत्पात मचा । उस के 6 सुरक्षा गार्ड और 2 डेरा समर्थकों के खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज किया गया । इन सभी पर कोर्ट में सुनवाई के दौरान आईजी को थप्पड़ मारने का आरोप है। यह भी आरोप है कि जैमर कोर्ट के परिसर में ले जाया गया जिसमें हरियाणा पुलिस के बाबा की सुरक्षा में लगे गार्ड थे। उनके पास ए के 47 थी जबकि यह हथियार पुलिस के पास नहीं होता। कृष्णा नगर में मौजूद डेरे की भी पुलिस ने तलाशी ली। दिल्ली के डेरे में भी कई महंगी बाइकें, गाडिय़ां खड़ी हैं। हरियाणा में राम रहीम के 36 आश्रमों के सील किया गया है, जिनमें करनाल, अंबाला, कैथल और कुरुक्षेत्र के आश्रम शामिल हैं।

कोर्ट की फटकार

हरियाणा पंजाब हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगते हुए कहा कि सरकार ने राजनीतिक फायदे के लिए शहर को जलने दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लग रहा है कि सरकार ने सरेंडर कर दिया है। इससे पहले कोर्ट ने पूछा था कि पुलिस आखिर क्या कर रही है, जब धारा 144 लागू है तो कैसे लाखों की तादाद में समर्थक डेरा सच्चा सौदा आश्रम पर जुट रहे हैं?

आरएसएस ने बचाया खट्टर को?

राम रहीम मामले में पूरी तरह फेल रही हरियाणा में भाजपा की सरकार के मुखिया मनोहर लाल खट्टर की कुर्सी इतने सामाजिक और मीडिया के दवाब के बावजूद नहीं गयी तो इसलिए कि आरएसएस ने उन्हें हटाने के खिलाफ सख्त स्टैंड ले लिया। भाजपा सूत्रों ने बताया कि पार्टी में कुछ नेता चाहते थे कि खट्टर की छट्टी कर दी जाए पर आरएसएस ने प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को साफ सन्देश भेज दिया कि खट्टर को छूने की भी कोशिश न की जाये। ऐसा ही हुआ और खट्टर अभी भी शान से अपनी कुर्सी पर जमे हैं।

200 साध्वियां गायब

पता चला है कि जैसे ही पंचकूला में बाबा को दोषी करार दिया गया, उनके सिरसा डेरे से अगले 30 घंटे में करीब 200 साध्वियां गायब हो गईं। आरोप है कि बाबा ने इन्हें अपने प्रयोग के लिए रखा था। इस तरह के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। उसके खिलाफ कोर्ट में गए एक पूर्व डेरा साधु ने तो यह भी दावा किया था कि बाबा अपना जन्म स्थान राजस्थान बताता है लेकिन वो वास्तव में पंजाब के अबोहर में पैदा हुआ है।

 

 

 

हाईकोर्ट ने कहा आप हैं जिम्मेवार

क्या डीसीपी ही जिम्मेदार है?

प्ंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा, आप (राज्य सरकार) हमें गुमराह कर रहे हंै। प्रशासन और राजनीतिक फैसलों में भारी अंतर है। प्रशासनिक फैसले इसलिए अमल में नहीं आते क्योंकि उन पर राजनीतिक फैसलों का दबाव रहता है। आपने एक डीसीपी को सस्पेंड कर दिया। क्या यह अकेला इस बात के लिए जिम्मेदार था? क्या यही आप हमें बताना चाहते हैं?

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश सुरिंदर सिंह सरांव ने बहुत सही सवाल किया है। हालांकि कुछ ही दिन बाद सरांव सेवामुक्त हो जाएंगे। हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार पर डेरा सच्चा सौदा को संरक्षण देने का आरोप लगाया है। साथ ही पंचकूला में हुई हिंसा के लिए भी जिम्मेदार ठहराया है।

हाईकोर्ट ने राज्य के एड़वोकेट जनरल बलदेव राज महाजन की दलीलें खारिज करते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री को ही डेरा सच्चा सौदा को संरक्षण देने की बात कही। मुख्यमंत्री ही गृहमंत्री हैं। क्यों आपने सात दिनों से लोगों को इक_ा होने दिया। सीबीआई कोर्ट नेे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बलात्कार के आरोप में दोषी पाया। इसके बाद हजारों की तादाद में डेरा समर्थकों ने जो पंचकूला में इक_े हुए थे, आगजनी और लूट की। पुलिस की गाडिय़ां, मीडिया की ओबी वैन सरकारी इमारतें, रेलवे स्टेशन फूंके। 30 लोग पंचकूला, सिरसा में मारे गए। कई घायल हुए।

 

 

सेना ने ही सब कुछ करना है तो पुलिस किस लिए है?

प्रशासन अपनी जीत के भरोसे था जबकि आम आदमी समझ रहा था कि हालात भयंकर हो सकते हैं। पंजाब और हरियाणा की हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की खिंचाई की कि वे डेरा पे्रमियों की बढ़ती भीड़ को रोक नहीं पाए जबकि धारा 144 लगी हुई थी। बाकायदा बैरीकेड लगे हुए थे जिससे लोग अदालत परिसर की ओर न जा सकें। लेकिन हथियार भी ले जाए गए और डीजल-पेट्रोल भी। जिससे आगजनी जमकर हुई।

प्रशासन का पूरा ध्यान अदालत परिसर को सील रखने का था। जिससे आरोपी को बिना किसी डर के सुरक्षित लाया जा सके। प्रेमियों पर लगभग कोई ध्यान नहीं था और उनकी तादाद बढ़ती जा रहीं थी। उन्हें रोकने का कोई प्रयास पुलिस लगभग नहीं कर रही थी।

अलग-अलग शहरों और प्रदेशों से आए भक्तों ने पंचकूला को अपना बड़ा अड्डा बना लिया। पुलिस की लापरवाही के चलते इनके पास माचिस, लाठी,और दूसरे हथियार भी इक_े होते रहे। अदालती फैसले के बाद ही भीड़ के संयोजकों के इशारों पर व्यापक हिंसा फैलाई गई। सब ने पाया पुलिस कतई चाक-चैबंद नहीं थी।

उधर हरियाणा सरकार के मंत्रियों में गुरमीत सिंह के सच्चा डेरे मे इस कदर आस्था रही कि वे भक्तो के जमावड़े की हिंसा की बजाए उसमें श्रद्धा और शांति देख रहे थे। इन्होने उस हिंसा की जिम्मेदारी भीड़ में घुस आए असामाजिक तत्वों के जिम्मे मढ़ दी और चुप हो गए। बाबा के भक्तों ने मीडिया से जुड़े तमाम लोगों की गाडियों, निजी गाडिय़ों और सरकारी इमारतों , आयकर विभाग और लाइफ इश्योरेंस कारपोरेशन की इमारतों में आग लगा दी।

यह सब हो रहा था । पुलिस फोर्स में बढ़ावा नहीं हुआ। आरोपी को हेलिकॉप्टर से रोहतक ले जाया गया। फिर कहीं पुलिस की कार्रवाई कुछ तेज हुई।

सवाल यह है कि क्या न्यायालय ने 23 अगस्त को पुलिस – प्रशासन की खिंचाई नहीं की होती तो क्या और हिंसा होती, संपत्ति नष्ट होती, और लोगों की जि़ंदगी और संपत्ति के साथ खिलवाड़ होता। पंजाब और हरियाणा की हाईकोर्ट के जजों ने समय पर कार्रवाई की। अन्यथा वोट की राजनीति की आड़ में हरियाणा के मंत्रियों और राजनीतिक नेताओं ने तो पुलिस को यह इशारा ही कर दिया था कि वे इसे गंभीरता से न लें।

दूसरी बात है कि उच्चतम न्यायालय ने तीन तलाक और निजता के मौलिक अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसले लिए। तब कहीं कोई हिंसक प्रतिक्रिया नहीं दिखी।

सबसे बड़ा सवाल है कि क्या सेना को बिना बुलाए पुलिस प्रशासन हालात पर काबू नहीं पा सकता। केंद्रीय हथियारबंद पुलिस दल भी तो पूरी तौर पर प्रशिक्षित किए जाते हैं पर उसे ऐसे हालात पर काबू क्यों पाने नहीं दिया जाता। सेना को ही क्यों बुलाया जाता है। जबकि इन्हें भी लगातार वेतन बढ़ोतरी दी जाती है।

पुलिस प्रशासन अब अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपने लग गया है। यह रवैया राजनीतिक नेताओं के चलते हुआ जिनकी नाकामी के चलते जाट आंदोलन भी कभी हिंसक हुआ।

पूर्व लेफ्टी0 जनरल विजय ओबराय

साभार: फेसबुक

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