प्रियंका गांधी: देश में लिंगभेद का सबसे बड़ा प्रतीक?

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बात तकरीबन 27 साल पुरानी है. नाइजीरिया के एक स्कूल ने क्लास मॉनीटर बनाने के लिए यह नियम बनाया कि क्लास में फर्स्ट आने वाले बच्चे को ही मॉनीटर चुना जाएगा. खड़े होकर अपने सहपाठियों की निगरानी करना और शोर मचाने वालों के नाम ब्लैक बोर्ड पर लिखना नौ साल की एक बच्ची को भी खूब रोमांचित करता था. उसने जमकर मेहनत की और क्लास में फर्स्ट आ गई. इसके बावजूद कक्षा में दूसरे स्थान पर आने वाले एक लड़के को मॉनीटर बना दिया गया. इस फैसले को लेकर टीचर की दलील थी कि क्लास की मॉनीटर लड़की नहीं बल्कि लड़का होना चाहिए. इस तरह उस बच्ची का सपना परवान चढ़ने से पहले ही टूट गया. लेकिन चीमामंदा गोजी अदिची नाम की यह बच्ची अब एक मशहूर लेखिका बन चुकी है और अपने लेखन से अफ्रीकी साहित्य के पाठकों पर गहरी छाप भी छोड़ चुकी है. दर्जन भर से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी अदिची को प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने पिछले साल दुनिया की सौ प्रभावशाली महिलाओं में भी शामिल किया. किंतु मॉनीटर न बन पाने की वह टीस आज भी अदिची के मन में जिंदा है.

लड़की और लड़के में भेदभाव करने वाली तमाम जमातों के लिए अदिची की ये उपलब्धियां एक बड़ा सबक हो सकती हैं. बहुत संभव है कि इससे सीख लेकर बहुत सारे लोग भेदभाव से परे काम भी कर रहे हों. लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवार को शायद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. कई लोगों के मुताबिक एक लंबे समय से यह परिवार दूसरे दर्जे वाले लड़के को पहले दर्जे की हकदार लड़की के आगे तवज्जो देने पर तुला हुआ है. पिछले एक दशक से राहुल गांधी को आगे लाने की जैसी कोशिशों में कांग्रेस पार्टी और उसकी सर्वेसर्वा सोनिया गांधी लगी हुई हैं, उसे देखते हुए अगर एक निष्पक्ष नजर प्रियंका गांधी की तरफ डाली जाए तो कुछ लोगों को वे नाइजीरियाई लेखिका की कहानी चरितार्थ करती भी लग सकती हैं.

हालांकि प्रियंका गांधी ने अब तक ऐसी कोई परीक्षा पास नहीं की है जिसमें उन्हें राहुल गांधी से आगे आंका गया हो लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ऐसी किसी परीक्षा में उन्हें अब तक बैठने भी तो नहीं दिया गया है. इसके बावजूद उन्होंने जो कुछ अब तक किया है उसमें तमाम लोग इस बात के संकेत तलाशते हैं कि यदि मौका मिला होता तो वे राजनीति में राहुल से  बीस साबित हुई होतीं. आज की सच्चाई यह है कि एक राजनीतिक शख्सियत के रूप में उनके और राहुल गांधी के बीच एक बहुत बड़ी लकीर है जबकि उम्र के मामले में उनमें सिर्फ दो साल का मामूली अंतर ही है. पार्टी में नंबर दो बनाए जाने और मनमोहन सिंह के इनकार के बाद जहां राहुल आगामी लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस का चेहरा घोषित हो चुके हैं, वहीं प्रियंका के हिस्से इस बार भी अमेठी और रायबरेली ही हैं. उस पर भी विडंबना यह कि यहां भी वे खुद के बजाय राहुल और मां सोनिया की राजनीतिक जमीन को ही सींचेंगी.

भारतीय राजनीति में मौजूद परिवारवाद पर ब्रिटिश लेखक पैट्रिक फ्रेंच ने अपनी किताब ‘इंडिया अ पोट्रेट’ में गजब की तहकीकात की है. उनका शोध बताता है कि 2009 में चुने गए 40 साल तक की उम्र वाले 66 सांसदों में से दो तिहाई का ताल्लुक किसी न किसी राजनीतिक परिवार से है. अकेले कांग्रेस सांसदों को लेकर वे लिखते हैं कि पार्टी का हर ग्यारहवां सदस्य परिवारवाद की जमीन पर ही उगा है. अपनी किताब में महिलाओं के बारे में उनका लिखना है कि 70 फीसदी महिलाएं परिवारवाद की सीढ़ी चढ़कर ही संसद तक पहुंची हैं. वंशवाद की इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करते हुए कुछ प्रमुख राजनीतिक कुनबों की बात की जाए तो मुलायम सिंह यादव से लेकर वर्षों से व्हील-चेयर पर बैठे करुणानिधि तक ने अपनी राजनीतिक जागीर में बेटियों और यहां तक कि बहुओं और पोतियों तक का हिस्सा तय किया है. इसके अलावा पंजाब के बादल खानदान से लेकर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले मणिपुरी संगमा भी महिला सदस्यों को राजनीति में पूरे तामझाम के साथ उतार चुके हैं. लेकिन गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी में सिर्फ बेटे राहुल गांधी को ही इस आरक्षण का सुपात्र समझा गया है.

आज से तकरीबन दो दशक पहले ही पत्रकारों ने प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने को लेकर सवाल पूछने की शुरुआत कर दी थी. तब सोनिया खुद भी सक्रिय राजनीति में नहीं आई थीं. बताया जाता है कि इस तरह के सवालों पर वे हर बार यही कहती थीं कि ‘राहुल और प्रियंका जब खुद चाहेंगे राजनीति में आ जाएंगे.’ फौरी तौर पर देखा जाए तो यह एक रस्मी जवाब लग सकता है, लेकिन गौर से देखने पर इसमें छिपे अर्थ को समझा जा सकता है. एक लंबे समय तक कांग्रेस को कवर करने वाले और कांग्रेस व सोनिया गांधी पर दो किताबें लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई इस बारे में बताते हैं, ‘सिर्फ और सिर्फ प्रियंका गांधी पर केंद्रित सवालों के जवाब में भी सोनिया अक्सर राहुल गांधी का नाम जोड़ देती थीं. इस तरह साफ मालूम पड़ता है कि तब से ही सोनिया की दिलचस्पी प्रियंका के बजाय राहुल में ज्यादा रही है.’ इसके अलावा राशिद एक और वाकया सुनाते हैं, ‘प्रियंका के राजनीति में आने को लेकर गंभीर अंदाज में पूछे गए सवालों पर एक बार तो सोनिया ने लगभग नाराज होते हुए यह तक कह दिया था कि, ‘क्या आपको नहीं मालूम कि उनके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं.’

हालांकि किदवई को सोनिया के इस जवाब में प्रियंका के साथ भेदभाव जैसा कुछ नहीं लगता, लेकिन राहुल के प्रति उनके झुकाव को वे नकारते भी नहीं हैं. अगर हाल के समय की कुछ खास घटनाओं पर बारीक नजर डाली जाए तो तस्वीर थोड़ी और साफ हो सकती है.

पिछले दिनों प्रियंका गांधी ने पार्टी के बहुत ही खास और बड़े नेताओं के साथ दिल्ली में एक बैठक की. राहुल गांधी की गैरमौजूदगी में हुई इस मुलाकात की भनक जैसे ही खबरनबीसों को लगी, तमाम समाचार चैनलों पर उनके सक्रिय राजनीति में उतरने की खबरें फ्लैश होने लगीं. इस खबर का प्रवाह इतना था कि अमेठी से लेकर रायबरेली और इलाहाबाद तक के कांग्रेसियों का रक्त हिलोरें मारने लगा. प्रियंका को राजनीति में लाने के दबे-ढके हामी रहे कुछ बड़े कांग्रेसी नेता इसके बाद टीवी पर आकर उनके पक्ष में बोलने-बतियाने भी लगे. ये प्रियंका के सक्रिय राजनीति में उतरने को पार्टी के लिए शुभ संकेत बता रहे थे. समाचार चैनल इस खबर को प्राइम टाइम के लिए पकाने में जुटे ही थे कि इसका जोरदार खंडन हो गया. कांग्रेस के मीडिया प्रभारी और राहुल गांधी की टीम के अहम सदस्य अजय माकन ने फौरन प्रेस के सामने साफ कर दिया कि प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में उतरने को लेकर उठी खबरें कोरी अफवाह थीं. उन्होंने यह भी कहा कि वे सक्रिय राजनीति में नहीं उतरेंगी.

इसी तरह की एक और घटना पिछले साल अक्टूबर में भी हुई थी. तब इलाहाबाद के फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में लगे कुछ पोस्टरों और होर्डिगों ने मीडिया का ध्यान बिल्कुल ऊपर वाली घटना की तरह अपनी ओर खींचा था. इन होर्डिंगों में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की परंपरागत सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रियंका गांधी का आवाहन किया गया था. सोनिया गांधी की बीमारी और राहुल के कंधों पर बढ़ती जिम्मेदारी का तर्क देकर प्रियंका को आगे लाए जाने की मांग इन होर्डिंगों में की गई थी. खबर फैलते ही आनन-फानन में न केवल सारे होर्डिंग उतार दिए गए बल्कि इन्हें लगाने वाले कार्यकर्ताओं को भी अनुशासनहीनता के जुर्म में टांग दिया गया.

लेकिन राहुल गांधी के समर्थन में होने वाली इस तरह की गतिविधियों की पड़ताल की जाए तो मामला एकदम सर के बल खड़ा दिखता है. चाहे 2006 के हैदराबाद अधिवेशन में उन्हें पार्टी का महासचिव चुने जाने की मांग हो या फिर हाल ही में मिशन 2014 का मुख्य चेहरा बनाने की कवायद, उनके पक्ष में उठने वाली लगभग सभी मांगों को उनकी इच्छानुसार लगातार पूरा किया जाता रहा है. हाल ही में दागी नेताओं पर अध्यादेश लाने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद जब राहुल ने इसे कूड़ेदान में जाने लायक बताया तो पार्टी के नेता भी उनकी हां में हां मिलाते दिखे. इससे पहले यही नेता इस अध्यादेश की जोरदार हिमायत कर चुके थे. इस मुद्दे पर सरकार और प्रधानमंत्री की खूब फजीहत हुई मगर अध्यादेश को पारित नहीं किया गया. इस तरह देखा जाए तो प्रियंका के मामले में पैरवी करने वाले कार्यकर्ताओं को जहां पार्टी द्वारा निष्कासित किया गया वहीं खुल कर सरकार की खिलाफत करने के बावजूद न तो राहुल को और न ही राहुल-राग गाने वाले कांग्रेसियों को कभी भी कुछ भी कहा गया. बल्कि इस तरह की घटनाओं को राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता बता कर इनका ढोल ही पीटा गया.

priyanka_gandiप्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने की कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की मांग तथा इन पर पार्टी की प्रतिक्रियाएं दो अहम सवालों को जन्म देती हैं. पहला यह कि आखिर प्रियंका गांधी के राजनीति में आने की मांग समय-समय पर क्यों उठती रही है? और दूसरा यह कि इसके बावजूद प्रियंका को खुल कर राजनीति के मैदान में न उतारने की वजह क्या है?

वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई की मानें तो इस बात से शायद ही किसी को एतराज होगा कि कांग्रेस के अंदर प्रियंका को चाहने वाली एक अच्छी-खासी जमात मौजूद है. वे कहते हैं, ‘राहुल के मुकाबले प्रियंका को बेहतर मानने वाली यह जमात मन ही मन इस बात को भी स्वीकार कर चुकी है कि उनकी अगुआई में पार्टी को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला. लिहाजा प्रियंका को आगे लाया जाना चाहिए. लेकिन राहुल गांधी के प्रति सोनिया के लाड़ और अन्य कांग्रेसियों की ‘यस मैडम’ वाली संस्कृति को देखते हुए यह जमात खुल कर अपनी बात रखने का साहस नहीं कर पाई है.’ किदवई की बातों को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस कहते हैं, ‘प्रियंका के पक्ष में कुछ कांग्रेसियों का झुकाव पहले से ही रहा है और राहुल गांधी के नाकाम दिखने के बाद से यह झुकाव खुल कर बाहर निकलना चाहता है. यही वजह रही कि राहुल को 2014 का टीम लीडर बनाए जाने के बावजूद प्रियंका को आगे लाए जाने की बातें सामने आईं. लेकिन यह भी सच है कि इस खबर का खंडन होते ही कांग्रेसी फिर से राहुल-राग गाने लगे हैं.’

अजय बोस की बातें बहुत हद तक सही मालूम पड़ती हैं क्योंकि इस प्रकरण पर बात करने के लिए तहलका ने जब कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी से बात करनी चाही तो उन्होंने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि ‘प्रियंका को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग उनके समर्थकों की निजी भावना है.’ वरिष्ठ कांग्रेसी सत्यव्रत चतुर्वेदी भी इस मसले पर बच कर निकलने वाली मुद्रा में जबाव देते हैं, ‘प्रियंका पहले ही राजनीति में आने से इनकार कर चुकी हैं, इसलिए इन मांगों को उतनी गंभारता से नहीं लिया जाना चाहिए.’ बकौल सत्यव्रत अगर प्रियंका के पक्ष में उठी मांगों को गंभीरता से लिए जाने की जरूरत नहीं है तो फिर इन मांगों का इतनी तेजी के साथ खंडन क्यों किया गया?

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘जिस तरह तैराकी का मुकाबला जीतने के लिए तरणताल में उतरना जरूरी होता है उसी तरह राजनीति में सफल होने के लिए आपको लगातार हलचल बनाए रखने की जरूरत होती है. हाल की कुछ घटनाओं को छोड़ दें तो राहुल गांधी सक्रियता के उस जरूरी पैमाने को सिर्फ छूते भर दिखे हैं. उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो वे अचानक ही लंबे समय के लिए यहां से गायब हो जाते हैं. इसके अलावा एक और गौर करने वाली बात यह है कि भले ही उनका आगाज 2004 में हो गया था लेकिन पार्टी उपाध्यक्ष का पद उन्होंने अब जाकर लिया है. देखा जाए तो नौ साल की यह समयावधि एक तरह से शून्य ही पैदा करती है. इसके अलावा संसद में भी उनकी भूमिका न के बराबर ही रही है. यह भी एक बहुत बड़ा कारण हो सकता है जिसके चलते कांग्रेस के अंदर कई मौकों पर प्रियंका-प्रसंग छिड़ता रहा है क्योंकि इस बात में कोई दो राय नहीं कि पहली नजर में ही देखने पर प्रियंका गांधी को लेकर स्वाभाविक नेत्री का भाव  पैदा होता है.’

ऐसे में यह सवाल की काफी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जरूरत होने के बावजूद प्रियंका को खुल कर राजनीति के मैदान में न लाने की वजह क्या है. ‘साफ है कि कांग्रेस की प्राथमिकता राहुल गांधी को ही मुख्य मुकाबले में बनाए रखने की है.’  अजय बोस कहते हैं, ‘राहुल को लेकर कांग्रेस की आसक्ति का आलम यह है कि पार्टी पहले ही उन्हें भाजपा के पीएम कैंडीडेट नरेंद्र मोदी के मुकाबले लाने से बचती रही है. इसके अलावा अरविंद केजरीवाल के आने से भी पार्टी के लिए खासी दिक्कतें पैदा हो चुकी हैं. इसलिए इन हालात में अगर प्रियंका खुल कर मैदान में आती हैं तो उन्हें राहुल गांधी के विकल्प के तौर पर ही देखा जाएगा.’ नीरजा चौधरी भी इन बातों से सहमति जताते हुए कहती हैं, ‘ऐसे समय में जबकि कांग्रेस बहुत ही मुश्किल दौर में है प्रियंका के आते ही ऐसा होना अवश्यंभावी हो जाएगा.’

अब सवाल यह उठता है कि प्रियंका का कांग्रेस की राजनीति में समांतर केंद्र बनना क्या राहुल के लिए पार्टी और सरकार में परम पद की संभावनाएं पहले धुंधली और फिर ध्वस्त भी कर सकता है. और क्या इसी वजह से प्रियंका को राजनीति में न लाने का निर्णय इतनी मजबूती से लिया गया है? इन सवालों का आशय ठीक से समझने के लिए इन दोनों भाई-बहनों के राजनीतिक दमखम की तुलना जरूरी हो जाती है.

5 COMMENTS

  1. चाहे सोनिया हो, राहुल हो या प्रियंका. हादसों का शिकार रहे इस परिवार के जिंदा बचे लोगों की आँखों में सत्ता की उस किस्म की भूख नज़र नज़र नहीं आती जो नफरत की राजनीति करने वाली पार्टी के पीएम इन वेटिंग की आँखों में हैं. पिछली बार के पीएम इन वेटिंग तो बाकायदा विद्रोह पर ही उतारू थे.. बड़ी मुश्किल से उनको शांत किया जा सका.

  2. भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री के परिवार को लिंगभेद का प्रतीक कहना जमता नहीं है. मुझे नहीं लगता कि नेहरु परिवार के वर्तमान वंशजों के लिए इस किस्म की संकीर्णताओं के मायने बचे भी होंगे. प्रियंका ने अपनी मर्ज़ी से शादी की है. अगर प्रियंका सक्रिय राजनीति में उतरना चाहें तो उन्हें कोई कैसे रोक सकता है? कमज़ोर होती कांग्रेस के कार्यकर्त्ता तो चमत्कार की उम्मीद में पलक-पांवड़े बिछाकर उनका इंतजार कर ही रहे हैं.

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