पांव की नस

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Panv-ke-nasपांव की कोई नस अचानक चढ़ जाती है
इतना तेज दर्द कि पांव की मामूली सी जुम्बिश भी
इस नामुराद को बर्दाश्त नहीं

सोचता हूं और भी तो तमाम नसें हैं शरीर में
सलीके से जो रही आती हैं हमेशा अपनी अपनी जगह
एक यही कमज़र्फ़ क्यों वक्त बेवक्त ऐंठ कर
मेरा सुख चैन छीन लेती है

पैरों के साथ बरती गई न जाने कौन-सी लापरवाही का
बदला ले रही थी वह नस
मुझे लगा अपनी अकड़ती आवाज़ में कह रही हो जैसे
कि दिनभर बेरहम जल्लादों की तरह थकाया तुमने पैरों को
और बदले में क्या दिया?
दिनभर हम्मालों की तरह भार ढोया पैरों ने तुम्हारे शरीर का
कितनी सड़कें नापीं,
खाक झानी कितनी आड़ी टेढ़ी गलियों की
कितनी भटकनों की स्मृतियां दर्ज इनके खाते में

1 COMMENT

  1. राजेश जोशी जी की कविता आम जीवन को टटोलकर मन को छू लेती है पाव की नस से जीवन के पूरे अवस्स्द समस्या और तकलीफो का लेखा जोखा दिया है अच्छी कविता के लिये साधुवाद

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