पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए…

anil
हिंदी हिनेमा के संगीत के शुरुआती दौर के सबसे प्रयोगधर्मी संगीतकारों की सूची तैयार की जाए
तो अनिल विश्वास का नाम शीर्ष पर होगा.

अनिल विश्वास हिंदी फिल्म संगीत के पुरोधा के रूप में जाने जाते हैं. बोलती फिल्मों का दौर जब से आरंभ हुआ और उसमें गीत-संगीत के आगमन का रोचक इतिहास बस बनना शुरू ही हुआ था, उस समय अनिल विश्वास जैसे संगीतकार को बेहद प्रमुखता से संगीत के आधुनिक प्रणेता के रूप में आदर मिला.

शुरुआती दिनों में, जो कि उन्नीसवीं शताब्दी का चौथा दशक था, उस समय संगीत के बिल्कुल आरंभिक संगीतकारों में जिन लोगों को जाना जाता है, उनमें प्रमुख रूप से हम फिरोजशाह मिस्त्री, मास्टर अली बक्श, जद्दनबाई, लल्लूभाई नायक, प्राणसुख नायक, बृजलाल वर्मा, वजीर खां, सुंदर दास भाटिया, गाविंद राव टेंबे, केशवराव भोले, झंडे खां, बन्ने खां, राम गोपाल पांडे, सुरेश बाबू माणे आदि को याद कर सकते हैं.

इन आरंभिक संगीतकारों के योगदान पर विकसित होने वाले हिंदी फिल्म संगीत को बाद में एक से बढ़कर एक मूर्धन्य कलाकार सुलभ हुए. इन संगीतकारों का बहुत हद तक ऐतिहासिक महत्व भी है क्योंकि इनमें से बहुतेरे ऐसे लोग थे, जिन्होंने सिनेमा की दुनिया में पहली बार कोई नई चीज रची थी जैसे फिरोज शाह मिस्त्री को पहली बोलती फिल्म आलमआरा (1931) के संगीतकार के रूप में जाना जाता है या फिर जद्दनबाई (प्रसिद्ध अभिनेत्री नरगिस की मां) को पहली महिला संगीतकार होने का गौरव प्राप्त हुआ, जब उन्होंने अपनी ही निर्मित फिल्म तलाश-ए-हक (1935) में संगीत दिया. इसी तरह वजीर खां और नागर दास नायक ने सैय्यद आगा हसन अमानत द्वारा लखनऊ के आखिरी कलाप्रिय नवाब वाजिदअली शाह के लिए लिखे इंद्र सभा पर बनी इसी नाम की फिल्म (1932) के लिए संगीत दिया. पूना के मशहूर प्रभात स्टूडियों न कुछ बड़े संगीतकारों को पैदा किया, जिसमें गोविंद राव टेंबे का नाम प्रमुख है. टेंबे ने अयोध्या का राजा, जलती निशानी, माया मछिंद्र (1932), सैरंध्री (1933), मंजरी (1934), उषा, राजमुकुट (1935) जैसी मशहूर ऐतिहासिक, वेशभूषा प्रधान फिल्मों के लिए संगीत दिया. ऐसे बहुतेरे संगीतकार हैं, जिनके माध्यम से 1931 से लेकर 1940 तक लगभग एक दशक का चित्रपट संगीत अपने जन्म से विकसित होने का एक रोचक सफर तय करता है. इन संगीतकारों की चर्चा भी इस अर्थ में प्रासंगिक है कि हम अनिल विश्वास के सांगीतिक योगदान का जो विश्लेषण करने जा रहे हैं, उनका समय भी इसी दशक के मध्य में आरंभ होता है. वैसे तो अनिल विश्वास सबसे पहले बंबई 1934 में आए, जब वे कुमार मूवीटोन के साथ जुड़े, मगर एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उनकी पहली फिल्म ईस्टर्न आर्ट्स की हीरेन बोस निर्देशित धर्म की देवी (1935) से माना जाता है.

अनगिनत आरंभिक संगीतकारों की जमात में अनिल विश्वास के साथ जिन संगीतकारों का नाम उल्लेखनीय रूप से चालीस के दशक में उभरा, उनमें हम आर.सी. बोराल, पंकज मलिक, तिमिर बरन, के.सी. डे, रफीक गजनवी, एच.सी. बाली, शांतिकुमार देसाई, मास्टर कृष्णराव, अशोक घोष, सरस्वती देवी, ज्ञान दत्त एवं रामचंद्र पाल का नाम ले सकते हैं. इनमें से अधिकांश न सिर्फ लोकप्रिय और सफल संगीत निर्देशक रहे हैं, बल्कि इस अर्थ में भी आज नए सिरे से विश्लेषण के लिए जरूरी नाम हैं कि इनके हिस्से में कुछ ऐसी ऐतिहासिक फिल्मों के साथ जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त है, जिनमें कुंदन लाल सहगल जैसे महान गायक और अभिनेता की तमाम फिल्मों के अलावा सोहराब मोदी, पृथ्वीराज कपूर, सआदत हसन मंटो, शांता हुबलीकर, देविका रानी, अख्तरीबाई फैजाबादी, पी.सी बरुआ, जिया सरहदी, चंद्र मोहन, दुर्गा खोटे, जोहरा सहगल, उदय शंकर, शांता आप्टे, कवि प्रदीप, उस्ताद अलाउद्दीन खां, नसीम बानो एवं वहीदन बाई जैसे फनकार किसी न किसी भूमिका में मौजूद थे. कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी फिल्मों का यह बिल्कुल आरंभिक बनने-बनने वाला वह दौर है, जब उपर्युक्त उल्लिखित ढेरों ऐसे ऐतिहासिक किरदार सक्रिय नजर आते हैं, जिन्होंने विभिन्न विधाओं में अपनी कला का परचम फहराया हुआ है. इनमें सभी शीर्ष स्तर के कलाकार रहे हैं, जो अभिनय, गायन, पटकथा, गीत व संवाद लेखन के साथ-साथ निर्माण व निर्देशन के स्तर पर भी समादृत रहे.

अनिल विश्वास के करियर में किस्मत मील का पत्थर मानी जाती है. इस फिल्म की अपार सफलता तक पहुंचने से पूर्व अनिल विश्वास ने आरंभिक सफलता का स्वाद जिन फिल्मों के माध्यम से चखा था, उन्हें व्यापक तौर पर वैसी स्वीकृति नहीं मिल पाई थी, जिस तरह वह किस्मत के सभी गीतों को हासिल हुई. इस फिल्म से पूर्व उनके द्वारा संगीतबद्ध कुछ महत्वपूर्ण गाने ही आज याद किए जाते हैं, जो कि उन फिल्मों की थोड़ी-बहुत लोकप्रियता का भी आधार बन सके. इनमें प्रमुख रूप से भारत की बेटी (1935) का ‘तेरे पूजन को भगवान बना मन मंदिर आलीशान’, मनमोहन (1936) का ‘तुम्ही ने मुझको प्रेम सिखाया’, ग्रामोफोन सिंगर (1938) का ‘मैं तेरे गले की माला’, हमारी बात (1943) का ‘बादल सा निकल चला यह दल मतवाला रे’, ‘मैं उनकी बन जाऊं रे’, बसंत (1942) का ‘कांटा लागा रे साजनवा मोसे राह चली न जाए’ एवं नैया (1947) का ‘सावन भादों नैन हमारे बरस रहे दिन रात’ जैसे गीत सुनने में उतने ही ताजे और कर्णप्रिय लगते हैं.

किस्मत इस अर्थ में भी संगीत की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण फिल्म है कि इसमें पहली बार अनिल विश्वास ने अपनी चिर-परिचित शैली में कुछ नवीनता पैदा करते हुए सारे ही गानों को अलग-अलग शैली में संगीतबद्ध किया था. हालांकि किस्मत से पहले उन्होंने बॉम्बे टॉकीज के लिए देविका रानी के अत्यधिक इसरार पर बसंत के गानों की भी सारी धुनें  तैयार की थीं, जो बाद में बेहद लोकप्रिय हुईं, परंतु नेशनल स्टूडियो के साथ अनिल विश्वास के अनुबंध के चलते फिल्म के क्रेडिट्स एवं पब्लिसिटी में कहीं भी उनका नाम बतौर संगीतकार नहीं गया. इस फिल्म के क्रेडिट्स में उनके बहनोई और प्रसिद्ध बांसुरी वादक पन्नालाल घोष का नाम दिया गया, जिन्होंने फिल्म में ऑर्केस्ट्रेशन का काम संभाला और पार्श्व-संगीत भी तैयार किया था.

किस्मत के संगीत-निर्माण की कथा भी अत्यंत दिलचस्प है, जो संगीत-प्रेमियों के बीच प्रसिद्ध भी रही है तथा जिसे फिल्म अध्येता शरद दत्त ने अनिल विश्वास की जीवन-यात्रा पर अपनी पुस्तक में विस्तार से चर्चा की है. किस्मत के निर्माता शशधर मुखर्जी को बॉम्बे टॉकीज में जितनी तनख्वाह मिलती थी, उसकी दोगुनी राशि पर देविका रानी ने अनिल विश्वास को अपने बैनर के लिए संगीत निर्देशक के बतौर अनुबंधित कर लिया था. बस यही एक ऐसा कारण था, जिसने भीतर ही भीतर बॉम्बे टॉकीज में असंतोष का स्वर उभार दिया था. इसमें एक गुट ऐसा था, जो शशधर मुखर्जी के प्रति संवेदनशील रुख रखते हुए अनिल विश्वास को हर हाल में तंग करके नीचा दिखाने पर तुला हुआ था. इसी कारण किस्मत के संगीत निर्माण में बहुतेरी दिक्कतें भी आईं, जिन्हें अनिल विश्वास ने पूरे धैर्य के साथ झेलते हुए न सिर्फ अपना काम पूरा किया वरन उस गुट के कवि प्रदीप को भी जीवन भर के लिए मित्र बना डाला. शरद दत्त की पुस्तक में इस बात की चर्चा स्वयं अनिल विश्वास ने की है, जो यहां ज्यों की ज्यों प्रस्तुत हैः

imgप्रदीप जी एक गाना लिखकर लाए, ‘धीरे-धीरे आ रे बादल, धीरे-धीरे जा/ मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल न मचा.’ यह सात मात्रा का गाना था और कहानी की जो सिचुएशन थी उसमें सात मात्रा का गाना अनुकूल नहीं बैठता था. वहां तो एक तरह की लोरी चाहिए थी, साथ ही प्रेम का भाव चाहिए था- यानी दोनों का मिला-जुला रूप और वह तभी हो सकता था, जब गाना आठ मात्रा का हो. मैंने सोचा कि इसमें क्या! किसी एक नोट पर खड़ा हो जाऊंगा, किसी एक सुर पर, तो एक मात्रा मिल जाएगी. इस तरह मैंने सात मात्रा के गाने को आठ मात्रा का बना दिया. प्रदीप जी सुनकर खुद हैरान रह गए थे. प्रदीप जी आखिर कवि थे और साथ ही एक अच्छे गायक भी. इस गाने की कंपोजीशन सुनकर वह मेरे दोस्त बन गए. उनका कहना था कि इस गाने में ऐसा चमत्कार अनिल विश्वास के अलावा और कोई  पैदा नहीं कर सकता था. कुछ साल पहले महाराष्ट्र सरकार द्वारा मुझे सम्मानित किया गया, तो वहां उन्होंने स्वीकार किया था, सार्वजनिक रूप से यह बात कही थी कि अनिल विश्वास को नीचा दिखाने में मैंने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी. मैंने इन्हें सात मात्रा का गाना बनाकर दिया, लेकिन इन्होंने उसे आठ मात्रा का बना दिया. बस, तभी से मैं इनका मुरीद हो गया.

इस घटना के जरिए हम देखते हैं कि कला की उदात्तता में अहं और  ईर्ष्या जैसे भाव तिरोहित हो जाते हैं तथा दूसरे के प्रति अविश्वास का व्यवहार रखने वाला व्यक्ति भी गहरी दोस्ती के बंधन में बंध जाता है. यहीं इस गीत की सांगीतिक चर्चा करना भी समीचीन होगा, जो शायद फिल्म के सबसे मधुरतम गानों में से एक रहा है. पूरा गीत सुनने में जिस तरह सहज ढंग से शांति का भाव रचते हुए भी उसमें गजब ढंग से रूमानियत की सृष्टि करता है, वह देखना विस्मयकारी है. फिल्म में यह गीत अमीरबाई कर्नाटकी और अरुण कुमार ने गाया है. इस गीत के इंटरल्यूड्स (मध्यवर्ती-संगीत) को संगीतकार ने इतनी दक्षता के साथ अंडरटोन में विकसित होने दिया है कि अरुण कुमार और अमीरबाई कर्नाटकी की आवाज की कशिश को लोरी की सी भावभूमि में बेहद सुंदर ढंग का प्रवाह मिला है. सीटी (ह्विस्लिंग) का भी पहला प्रयोग शायद इसी गीत के माध्यम से सामने आता है. इसका इस्तेमाल गाने की कंपोजीशन में मस्ती के भाव को व्यक्त करने के लिए किया गया था. पर्दे पर इसका इस्तेमाल नायक अशोक कुमार द्वारा दर्शाया गया है, जबकि मूल रूप से गीत की रिकॉर्डिंग में उसे एक म्यूजीशियन ने अंजाम दिया था. यह गीत रागों के सरताज भैरवी एवं एक ताल में बेहद उत्कृष्टता के साथ निबद्ध किया गया था. आज भी, इस गीत की खूबसूरती सुनते ही बनती है. इस गीत के निर्माण के लगभग पचास वर्ष बाद, अमीरबाई कर्नाटकी के प्रति अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त करते समय लता मंगेशकर ने भी इसे अपने एल्बम श्रद्धांजलि भाग-दो में ठीक उसी धुन पर गाया था, जो कि इस गीत की अमरता और लोकप्रियता क समकालीन अर्थों में भी उजागर करता है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here