पत्थरों की कथाएं

कथा (2)

‘तुम!’

‘तुम!’

‘देखता ही रहेगा कि गले मिलेगा!’

‘ऐसे माहौल में!’

‘ये तो रोज का ड्रामा है!’

‘तो आ जा!’

‘गले मिलकर अब दिल में ठंडक पहुंची.’

‘सोचा न था कभी ऐसे मिलेंगे!’

‘हां… और ऐसे माहौल में…’

‘अच्छा ये बता कहां था इतने दिनों तक!’

‘मैं… मैं एक मूर्ति में रह रहा था!’

‘अच्छा-अच्छा!’

‘और तू!’

‘मैं एक गुम्बद में था…’

कथा (3)

‘कहां तू कहां मैं!’

‘क्यों क्या हुआ!’

‘मैं शिवालय की शोभा बनूंगा! मुझ पर चंदन-रोली-बेलपत्र-दूध चढ़ाया जाएगा.’

‘हां तो!’

‘देख मेरा भाग्य!’

‘भाग्य! यह तो अवसर की बात है. तुझे अवसर मिला तो तू शिखर पर जा विराजा और मुझे अवसर नहीं दिया

गया तो मैं पद दलित रहा.’

‘मेरे मुंह मत लग म्लेछ!’

‘तू जितना इठला ले, मगर इस सच को झुठला नहीं पाएगा!’

‘कौन-सा सच!’

‘यही कि मूलत: हम दोनों पत्थर ही हैं.’

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