न्यूटन सरीखा एक भारतीय बाबू

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रामानुजन किसी दैवीय शक्ति की प्रेरणा बताते थे. लेकिन दूसरी ओर कई बार वह भटक भी जाते थे और किसी साधारण इंसान की तरह गलतियां भी करते थे.’

दैवीय शक्ति वाली बात आज भी भारतीय तर्कवादियों को हजम नहीं होती. रामानुजन का दावा था कि देवी नामिगरी उनसे बात करती हैं और वे उनके माध्यम मात्र हैं. हो सकता है कि अगर रामानुजन यह न कहते तो तर्कवादी उन्हें गले लगा लेते. दूसरी तरफ दर्शनशास्त्र के दोहरेपन के उलट संख्याओं की निश्चितता में उनका विश्वास उन्हें उन लोगों से दूर कर देता था जो धार्मिक कारणों से उनको सही कह सकते थे. इसलिए मौत के नौ दशक बाद भी रामानुजन एक रहस्य बने हुए हैं. उनकी दैवीय प्रेरणा की व्याख्या करना अनंत को समझाने जैसा ही मुश्किल है.

व्यावहारिक रूप से कहा जाए तो नंबरों को कई तरह से विभाजित करने का सिद्धांत उनकी गणित थी जिसका इस्तेमाल आज एटीएम मशीनों में भी हो रहा है

तर्क और आस्था के बीच की खाई बहुत पुरानी है. जयसिंह कहती हैं कि रामानुजन के लिए संख्याएं रहस्यमय और काफी हद तक दैवीय प्रतीक थीं जो सत्य की तरफ ले जाती थीं. नृत्य नाटिका बनाने के लिए इसी बात ने उन्हें खास तौर से प्रेरित किया. इसके उलट कैंब्रिज की गणितीय धरोहर तर्क से संचालित होती थी. वे कहती हैं, ‘एक तरह के गणितीय जगत से दूसरी प्रकृति वाली गणितीय दुनिया तक की रामानुजन की इसी सांस्कृतिक यात्रा ने मुझे सबसे ज्यादा रोमांचित किया.’’

हार्डी और रामानुजन के रिश्ते के बारे में यह भी अनोखी बात थी कि सोच में बुनियादी फर्क के बावजूद भी यह जिंदा रहा. रामानुजन को यह

जानने में ज्यादा वक्त नहीं लगा कि उनकी शैली हार्डी से बिल्कुल अलग थी. हार्डी के लिए तर्क की महत्ता थी जबकि रामानुजन का विश्वास

दैवी प्रेरणा में था. हार्डी हर तरह से पक्की पड़ताल के बाद ही अगला कदम उठाते थे जबकि रामानुजन की प्रेरणा उन्हें बाधाओं के ऊपर से छलांग लगाने के लिए प्रेरित करती थी.

दरअसल रामानुजन को किसी ने गणित का व्याकरण तो पढ़ाया था नहीं, इसीलिए उन्हें अपनी बातों को तर्क से सिद्ध करना नहीं आता था. ‘द इंडियन क्लर्क’ में इसका सजीव वर्णन किया गया है कि कैसे हार्डी इस बात से क्षुब्ध और निराश थे. उन्हें समझ में ही नहीं आता था कि क्यों रामानुजन जैसा प्रतिभाशाली गणितज्ञ एक साधारण प्रूफ नहीं लिख सकता.

इस तरह से देखें तो सिर्फ 32 साल जिए रामानुजन की कहानी किसी परीकथा की तरह लगती है. एक ऐसी कहानी जिसमें एक प्रतिभा पर सात समंदर पार रह रहे ऐसे व्यक्ति की नजर जाती है जो उस प्रतिभा को अनुकूल जमीन में रोपना चाहता है. लेकिन राजनीतिक परिदृश्य इसके लिए माकूल नहीं है क्योंकि ब्रिटेन निर्विवादित विश्वशक्ति है और भारत उसका एक उपनिवेश. सांस्कृतिक अभिमान अपने चरम पर है और कहा जाता है कि यूरोप की किसी लाइब्रेरी के एक कोने में रखी किताबों का महत्व एशिया के कुल जमा साहित्य से कहीं ज्यादा है.

परीकथा की तरह रामानुजन की कहानी में भी अच्छे लोग हैं. रामानुजन की ब्रिटेन यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कैंब्रिज के गणितज्ञ ईएच नेविल के मुताबिक रामानुजन ऐसे पहले व्यक्ति हैं जो गणित के क्षेत्र में उनकी महान विभूतियों के समकक्ष हैं. यह धारणा कि श्वेत जाति हर मामले में अश्वेतों से बेहतर है, रामानुजन ने तोड़ी.

‘द इंडियन क्लर्क’ में इस बात का सजीव वर्णन है कि हार्डी और रामानुजन गणित की दुनिया में सबसे ज्यादा खुश रहते थे. वह दुनिया जो धर्म, युद्ध, साहित्य, सेक्स और यहां तक कि दर्शन से भी दूर थी. दरअसल सच्चे गणितज्ञ को न पियानो की जरूरत होती है न बर्तन की और बाइबिल की तो बिल्कुल नहीं. उसे चाहिए तो बस एक स्लेट और चॉक.

(नजरिया, 31 दिसंबर 2008)

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