धन और बल के दलदल में!

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दूसरी तरफ, 2013 के विधानसभा चुनाव में करोड़पति उम्मीदवारों की तादाद भी बीते चुनाव के मुकाबले करीब दुगनी हो गई है. इस बार तीनों प्रमुख दलों के कुल 683 उम्मीदवारों में से 350 यानी आधे से अधिक उम्मीदवार करोड़पति हैं. जबकि 2008 में तीनों दलों के 639 उम्मीदवारों में से 184 उम्मीदवार करोड़पति थे. तब इन प्रत्याशियों की औसत संपत्ति 1.07 करोड़ रुपये प्रति उम्मीदवार थी. दिलचस्प है कि अब इनकी औसत संपत्ति बढ़कर 3.38 करोड़ रुपये प्रति उम्मीदवार हो चुकी है और इस बार इसका असर भी चुनाव में देखा गया. मध्य प्रदेश में दर्जनों जगह खुलेआम मतदाताओं को नोट बांटने की बात सामने आई. भाजपा सरकार में उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा अपने चुनावक्षेत्र महू में नोट बांटने की बात तो राष्ट्रीय स्तर तक सुर्खियों में रही है.

वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर मप्र की राजनीति के बलपिशाच और धनपिशाच की गिरफ्त में आने की वजह बताते हुए कहते हैं कि बीते कई सालों के दौरान राजनीति अब लाभ का धंधा बन चुकी है. चुनाव जीतकर अब कई कारोबारी उत्खनन, निर्माण और परिवहन में काली कमाई कर रहे हैं. श्रीधर के मुताबिक, ‘मप्र की राजनीति में चंदे का धंधा इस हद तक हावी हो गया है कि कभी स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं का रास्ता अब बंद हो गया है.’ दूसरी तरफ, कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष रामेश्वर नीखरा का मानना है कि उनकी पार्टी ने नेक लोगों को ही प्रत्याशी बनाया है. उनके मुताबिक, ‘अपराध सिद्ध हुए बिना किसी को साफ-सुथरा न कहना ठीक नहीं है.’ वहीं भाजपा इस बात पर खुश है कि कांग्रेस के मुकाबले उसने दागी नेताओं का कम तवज्जो दी है. भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा के मुताबिक, ‘अपराधियों को शरण देने के मामले में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है.’ लेकिन आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह सवाल अहम है कि धनबल और बाहुबल की बैसाखियों के सहारे आगे बढ़ने वाले दल कहीं मप्र के राजनीतिक हितों पर डाका न डाल दें.

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