दुराग्रह के दुश्चक्र में?

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इन दिनों उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद स्थित एक सीबीआई अदालत में जो हो रहा है वह हो सकता है कि भारत के कानूनी इतिहास की सबसे शर्मनाक घटनाओं में से एक के रूप में याद किया जाए. यह एक ऐसी कहानी है जिससे हर एक को डर लगना चाहिए. एक ऐसी कहानी जिसमें भयानक अक्षमता और पूर्वाग्रह दिखता है. जिसमें जान-बूझकर न्याय की धज्जियां उड़ाई जाती नजर आती हैं. यह एक ऐसी कहानी है जिसका केंद्रीय पात्र इस देश में कोई भी हो सकता है.

15 जून, 2008 की रात तक राजेश और नूपुर तलवार एक आम मध्यवर्गीय दंपत्ति थे. वे दोनों ही दांतों के डॉक्टर थे और 13 साल की अपनी बेटी आरुषि के साथ नोएडा में रहते थे. दिल्ली पब्लिक स्कूल, नोएडा में नवीं क्लास में पढ़ने वाली आरुषि अपनी उम्र की बाकी लड़कियों की तरह ही थी. प्यारी और नटखट. रिश्तों में मजबूती से गुंथा यह परिवार हर तरह से खुशहाल था. 15 मई को डॉ राजेश तलवार ने अपनी बेटी के लिए एक कैमरा खरीदा था. 24 तारीख को उसका जन्मदिन आने वाला था. दोस्तों के साथ इसका जश्न मनाने के लिए एक आयोजन स्थल भी बुक कर लिया गया था. तोहफे के रूप में मिले कैमरे से खुश आरुषि ने इससे अपनी और मम्मी-पापा की ढेर सारी तस्वीरें खींचीं.

अगली सुबह, यानी 16 मई तक खुशहाली की यह तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी थी. आरुषि की खून से लथपथ लाश उसके बिस्तर पर मिली. उसके सिर पर भयानक वार किया गया था और उसका गला रेत दिया गया था. पहले-पहल शक तलवार के घरेलू नौकर हेमराज की तरफ गया जो घर से गायब था. लेकिन एक दिन बाद ही 17 मई को हेमराज की लाश छत पर मिली. उसके सिर पर भी वार हुआ था और गला रेत दिया गया था.

तब से लेकर आरुषि-हेमराज डबल मर्डर केस की कई बातें सबको जुबानी याद हो चुकी हैं. सभी को इसके बारे में मालूम है और सभी का इसके बारे में कोई-न-कोई मत है. स्थिति कुछ ऐसी है कि जो धारणाएं बन गई हैं उन पर तथ्यों से अब कोई फर्क नहीं पड़ता.

हेमराज की लाश मिलने का इस मामले पर एक और असर पड़ा.  जल्द ही नोएडा पुलिस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इसमें एक कहानी पेश की. गौर करें कि तब तक पड़ताल खत्म नहीं हुई थी. यह कहानी विस्तार पाती गई. इतना कि आज इसे खारिज करना नामुमकिन लगता है. अखबारों और टीवी पर यह कहानी छा गई और ऐसा करने में पत्रकारीय मर्यादा और तथ्यों की पड़ताल जैसी चीजें किनारे कर दी गईं.

[box]नई सीबीआई टीम के आने के बाद जहां एक पक्ष के खिलाफ जांच ठंडे बस्ते में चली गई वहीं तलवार दंपति के खिलाफ इसने तेज रफ्तार अख्तियार कर ली हेमराज की लाश मिलने के बाद तलवार दंपति स्वाभाविक रूप से शक के घेरे में आ गया क्योंकि घर में जबरन घुसने का कोई संकेत नहीं था[/box]

अचानक ही राजेश और नूपुर तलवार इंसान नहीं रह गए. वे ऐसे माता-पिता नहीं रह गए जिन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा झेला था. तथ्यों की पड़ताल के बिना ही वे अपनी बेटी के कातिल हो गए. पिछले पांच साल में उनके बारे में मीडिया में हर तरह की खबरें आई हैं. अब उनकी हालत यह है कि उन पर कोई भी खबर चलाई जा सकती है. इसके लिए किसी तथ्य, तर्क और पड़ताल की जरूरत नहीं: वे अपनी ही बेटी के हत्यारे हैं. वे बीवियों की अदला-बदली वाले नेटवर्क का हिस्सा हैं. बेटी की मौत का गम उनके चेहरे पर नहीं दिखा. उन्होंने अपराध स्थल को साफ कर दिया था. आवेश में आकर उन्होंने अपनी बेटी को मारा. उनकी 13 साल की बेटी 45 साल के नौकर के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पाई गई थी. गर्दन पर चोट के निशान सर्जरी में काम आने वाले चाकू के हैं और बहुत नफासत से गला रेता गया है. राजेश तलवार ने अपनी बेटी और नौकर के सिर पर गोल्फ क्लब से वार किया. उस रात घर में और कोई नहीं था. घर में किसी के जबरन घुसने के प्रमाण नहीं मिले हैं. पुलिस आई तो राजेश तलवार छत का दरवाजा नहीं खोलना चाह रहे थे. उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गड़बड़ी करवाई है.

समाचार चैनलों पर चीखती हेडलाइनें, नाटकीय रूपांतरण और पुलिस व सीबीआई के हवाले से आई तरह-तरह की खबरों ने अपना काम कर दिया. राजेश और नूपुर तलवार अदालत में दोषी साबित होने से पहले ही लोगों की निगाह में दोषी हो गए.

इस मामले में परिजनों और मित्रों में से कई बताते हैं कि कैसे इस हादसे के बाद दुख के मारे राजेश अपना सिर दीवारों पर पटकते थे और नूपुर फोन पर बात करते हुए पागलों की तरह रोने लगती थीं. उन्हें जानने वाले यह भी बताते हैं कि उन अभागे दिनों में कैसे उनके चारों तरफ रहने वाले लोग ही उनसे जुड़े सारे फैसले कर रहे थे. लेकिन मीडिया की शिकायत थी कि उनका यह रोना और सिर पटकना कैमरों के आगे और बयान देते हुए क्यों नहीं हुआ. वे हमेशा इतने शांत कैसे दिखते हैं?

फिर भी यह सार्वजनिक मुकदमा अप्रासंगिक होता अगर न्यायिक प्रक्रिया पटरी पर चलती रहती. लेकिन इससे पहले कि आप यह जानें कि गाजियाबाद स्थित ट्रायल कोर्ट में क्या हो रहा है, और यह जानें कि तलवार दंपति के खिलाफ या समर्थन में क्या सबूत हैं, कुछ और बातें जानना जरूरी है.

हेमराज की लाश मिलने के बाद थोड़े समय के लिए शक की सुई हेमराज के दोस्तों की तरफ घूमी. कृष्णा, जो राजेश तलवार के क्लीनिक में हेल्पर था. राजकुमार, जो तलवार दंपति के मित्रों डॉ प्रफुल्ल और अनीता दुर्रानी के यहां नौकर था और एक पड़ोसी के घर में काम करने वाला विजय मंडल. इस दौरान तलवार दंपति और इन तीनों लोगों के पॉलीग्राफ, ब्रेन मैपिंग और लाई डिटेक्टर टेस्ट हुए. एक नहीं दो-दो बार.

और सच यह है कि राजेश और नूपुर तलवार, दोनों ही इन जांचों में साफ पाए गए. बाकी तीनों लोग, खासकर कृष्णा और राजकुमार, लाई डिटेक्टर टेस्ट में झूठ बोलते पाए गए. इससे भी अहम यह है कि नार्को टेस्ट से ये संकेत मिले कि अपराध में उनकी भागीदारी थी. इसमें उन्होंने माना कि वे उस रात घर में थे, उन्होंने अपराध कैसे हुआ, यह भी बताया. हत्या किस हथियार से की गई, इसके बारे में भी जानकारी दी और यह भी कि कैसे आरुषि और हेमराज के फोन ठिकाने लगाए गए. इस मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम के तत्कालीन मुखिया अरुण कुमार ने 11 जुलाई, 2008 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और मीडिया के साथ इन परीक्षणों की जानकारी साझा की. हालांकि ये परीक्षण अदालत में सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं हैं, लेकिन उस ओर इशारा तो करते ही हैं जिधर जांच को जाना चाहिए. भारतीय साक्ष्य कानून की धारा 27 के मुताबिक अगर नार्को टेस्ट के आधार पर कोई खोज होती है तो वह कानूनन-सम्मत साक्ष्य है. जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, कृष्णा के नार्को टेस्ट से दो बड़ी अहम जानकारियां मिलीं. इनमें से एक तो विस्फोटक थी. लेकिन इनकी चर्चा बाद में.

इसके बावजूद आरुषि मर्डर केस की जांच किसी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सकी. सितंबर, 2009 में जांच अधिकारी अरुण कुमार को इस मामले से हटा दिया गया. अब जिम्मा सीबीआई की एक नई टीम ने संभाला. इसकी कमान एजीएल कौल के हाथ में थी. इस बदलाव के साथ ही मामले ने अचानक एक नया और दुर्भावनापूर्ण मोड़ ले लिया. निष्पक्ष जांच का तरीका यह होना चाहिए था कि शक के दायरे में आए दोनों पक्षों, तलवार दंपति और घरेलू नौकरों, के खिलाफ जांच जारी रखी जाती. नई टीम के आने के बाद जहां एक पक्ष के खिलाफ जांच ठंडे बस्ते में चली गई वहीं तलवार दंपत्ति के खिलाफ इसने तेज रफ्तार अख्तियार कर ली.

इसके बावजूद दिसंबर, 2010 में सीबीआई को मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी पड़ी. इसमें उसका कहना था कि तलवार दंपति के खिलाफ सबूतों में कई अहम और पर्याप्त झोल हैं. उसका यह भी कहना था कि उसे आरुषि की हत्या का कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं मिला और यह भी कि घटनाएं जिस क्रम में घटीं उसे वह पूरी तरह से नहीं समझ सकी है.

कोई साधारण आदमी भी सोच सकता है कि पर्याप्त सबूतों और उद्देश्य—जो हत्या के मामले के दो अहम पहलू होते हैं—का अभाव राजेश और नूपुर तलवार को अपनी ही बेटी की हत्या के आरोप से मुक्ति देने के लिए पर्याप्त होता. इसके बावजूद नौकरों को क्लीन चिट देते हुए सीबीआई का कहना था कि उसे शक मुख्य तौर पर तलवार दंपति पर ही है. क्लोजर रिपोर्ट में हेमराज और आरुषि के अनैतिक संबंध की बात भी थी. राजेश और नूपुर तलवार इससे भौचक्के थे. यह उनकी बेटी की स्मृति के खिलाफ शब्दों से की गई हिंसा थी. उन्हें लग रहा था कि दोषी अब कभी पकड़े नहीं जाएंगे. वे इससे भी हैरान थे कि उन पर अपनी बेटी के संभावित हत्यारे जैसा लेबल चिपका दिया गया था. उन्होंने क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करते हुए इस मामले की जांच फिर से करने की मांग की.  जिसने अपराध किया हो, वह स्वाभाविक रूप से ऐसा नहीं करता. लेकिन हैरानी की बात है कि जिला मजिस्ट्रेट प्रीति सिंह ने उनकी याचिका खारिज करते हुए आदेश दिया कि सीबीआई द्वारा दाखिल की गई क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर ही सुनवाई शुरू की जाए. वही रिपोर्ट जो कहती थी कि तलवार दंपति के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिल पाए. अब तलवार दंपति संदिग्ध से मुख्य आरोपित बन गए. दूसरे संदिग्ध मामले के दायरे से ही बाहर हो गए. सीबीआई अदालत में क्या हो रहा है यह जानने से पहले जरा इस तथ्य पर गौर करें और फिर खुद फैसला करें कि क्या यह सुनवाई निष्पक्ष तरीके से हो रही है.

अब तक सीबीआई 39 गवाह पेश कर चुकी है. उनमें से कुछ तलवार दंपति के हिसाब से बेहद लचर और गलत थे, इसलिए वे चाहते थे कि अभियोजन पक्ष 14 अन्य गवाह भी पेश करे जिनसे वे भी सवाल-जवाब (क्रॉस इग्जामिन) कर सकें और घटना का सही सिलसिला स्थापित करने के अलावा सीबीआई की दूसरी टीम की दुर्भावना भी साबित कर सकें. इन 14 संभावित गवाहों में से अधिकतर गवाह सीबीआई की पहली टीम में शामिल अरुण कुमार जैसे अहम अधिकारी थे. नोएडा पुलिस के भी कुछ अधिकारी. अदालत ने इसकी इजाजत नहीं दी. तलवार दंपति इलाहाबाद उच्च न्यायालय गया. वहां भी उन्हें यह इजाजत नहीं मिली. इसके बाद वे सर्वोच्च न्यायालय गए. यहां भी नतीजा वही रहा.

इसके बाद तलवार दंपति ने अपने यानी बचाव पक्ष के 13 गवाहों को पेश करने की इजाजत मांगी. उन्होंने यह भी अनुरोध किया कि इस मामले से जुड़े अहम दस्तावेजों तक उनकी भी पहुंच हो. इनमें उनके और घरेलू नौकरों के नार्को टेस्ट, कॉल रिकॉर्ड, पोस्टमॉर्टम रिपोर्टें आदि शामिल थे जिनकी वे भी पड़ताल कर सकें. इसके खिलाफ दलील देते हुए अभियोजन पक्ष के वकील आरके सैनी ने कहा कि उन्हें किसी भी गवाह को पेश करने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए. सैनी का कहना था तलवार दंपति सिर्फ अदालत का वक्त बर्बाद करने की कोशिश कर रहे है.

इस तरह दो व्यक्तियों को – जिनका गुस्से में पागल होकर किसी तरह का अपराध करने का कोई इतिहास नहीं है -अपनी इकलौती संतान की गुस्से में बर्बर हत्या का आरोपि बना दिया गया. उनके खिलाफ कोई मजबूत साक्ष्य नहीं है. फिर भी अभियोजन पक्ष को 39 गवाह बुलाने की इजाजत मिलती है. तलवार दंपति को एक भी गवाह बुलाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए.

क्या यह सुनवाई निष्पक्ष लगती है? ये वही आरके सैनी हैं जिन्होंने जुलाई, 2008 में यह दलील देते हुए राजेश तलवार को जमानत पर छोड़ने की गुजारिश की थी कि अपराध में उनकी भूमिका की पूरी तरह जांच कर ली गई है और उनके टेस्ट में कुछ भी असामान्य नहीं पाया गया है. यह भी कि अपराध स्थल पर जो भी संकेत मिले हैं वे उनकी तरफ इशारा नहीं करते और न्याय के हित में उन्हें हिरासत में रखना जरूरी नहीं है.

पिछले महीने इस स्टोरी के लिखे जाने के वक्त अदालत का एक फैसला आया था जिसमें तलवार दंपति को मामले से संबंधित और कागजात देने से मना किया गया था और 13 के बजाय केवल सात लोगों को गवाह बनाने की इजाजत दी गई थी. इनमें परिवार के सदस्य और मित्र थे, केस से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं. तलवार दंपति कितने भयानक पूर्वाग्रह का सामना कर रहा है यह जानना तब तक संभव नहीं जब तक आप इस मामले के विस्तार में न जाएं. प्राकृतिक न्याय का बुनियादी तकाजा होता है कि आरोपित को ठीक से अपना बचाव करने की इजाजत मिलनी चाहिए. लेकिन यहां वह तक नहीं हो रहा. और यह तो इस पूर्वाग्रह का एक छोटा-सा हिस्सा भर है.

इस सबके केंद्र में एक सवाल है जिसका जवाब देने में सबको मुश्किल हो रही है. आखिर क्यों सीबीआई तलवार दंपति को फंसाने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है?  न तो उन्हें और न ही दूसरे पक्ष यानी घरेलू नौकरों को ‘बड़े लोग’ कहा जा सकता है. तो ऐसा क्यों है कि एक के पीछे वह हाथ धोकर पड़ी है जबकि दूसरे की तरफ देख तक नहीं रही. आखिर न्याय की तलाश में वह निष्पक्ष दिखने वाले रास्ते पर क्यों नहीं बढ़ रही?

इसके जवाब में बस कुछ अनुमान ही लगाए जा सकते हैं. अभी तक जो कुछ भी हुआ है उससे दो चीजें साफ होती हैं. पहली तो यह कि पुलिस और सीबीआई दोनों की ही जांच शुरुआत से ही भयावह रूप से घटिया रही है. दूसरा यह कि ऐसा लगता है जैसे सीबीआई की दूसरी टीम के मुखिया एजीएल कौल तलवार दंपति के खिलाफ लगने वाले आरोपों पर बहुत गहराई और उत्साह से यकीन कर चुके हैं. यही मानकर यह बात समझी जा सकती है कि क्यों उनकी क्लोजर रिपोर्ट खामियों से भरी पड़ी है.

और मजिस्ट्रेट प्रीति सिंह ने जब इसी रिपोर्ट के आधार पर सुनवाई का आदेश दिया तो चीजें और भी जटिल हो गईं. इस सुनवाई में नियमित रूप से जाने वाले और मुंबई मिरर से जुड़े पत्रकार अविरुक सेन कहते हैं, ‘सीबीआई नहीं चाहती थी कि मामला सुनवाई तक जाए. लेकिन जब इसी रिपोर्ट के आधार पर सुनवाई का आदेश हो गया तो उन पर उसी तरह के सबूत जुटाने का दबाव बढ़ गया. अब कोर्ट में हर सुनवाई के बाद उन्हें अपनी ही कहानी में और गहरे जाना पड़ रहा है.’

[box]कृष्णा के कमरे से बरामद इस कवर पर हेमराज का खून होने का एक ही मतलब था और वह यह कि कृष्णा उस रात हेमराज के कमरे में मौजूद था[/box]

जावेद अहमद सीबीआई में संयुक्त निदेशक हैं और कौल व उनकी टीम अहमद के तहत ही अपना काम कर रही है. जब हम उनसे पूछते हैं कि आखिर तलवार दंपति द्वारा अपने बचाव के लिए गवाह पेश करने का सीबीआई क्यों विरोध कर रही है तो वे कहते हैं, ‘ऐसा हम अपने अधिकारों के तहत ही कर रहे हैं. इसमें कुछ भी गैरकानूनी नहीं है.’

वे आगे कहते हैं, ‘यह आरोप गलत है कि हम उनके खिलाफ जान बूझकर निष्पक्षता से हट रहे हैं. वे जितने चाहें उतने गवाहों को बुलाने की इजाजत मांग सकते हैं. हम इस पर अपना एतराज जता सकते हैं. इसके बाद तो फैसला कोर्ट को करना है. हमारा फर्ज यह है कि सुनवाई तेजी से हो और कोई भी इसे लंबा खींचने की कोशिश न करे.’ इसके बाद अहमद हैरानी में डालने वाली एक बात कहते हैं, ‘अगर तलवार दंपति ने अपने बचाव में 2,432 गवाह पेश करने की इजाजत मांगी होती तो आप क्या कहतीं?’ हम उन्हें याद दिलाते हैं कि उन्होंने दो हजार नहीं 13 गवाह पेश करने की इजाजत मांगी थी. उनका जवाब आता है, ‘मैं तो बस उदाहरण दे रहा था.’

हम सीबीआई के संयुक्त निदेशक से पूछते हैं कि क्या यह अजीब नहीं कि सीबीआई अपनी आखिरी रिपोर्ट में यह कहे कि उसके पास किसी के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं, फिर सुझाव दे कि केस बंद कर दिया जाना चाहिए और फिर उसे उसी रिपोर्ट के आधार पर किसी के खिलाफ मुकदमा लड़ना पड़ेे.

अहमद कहते हैं, ‘आपकी बात बिल्कुल सही है. यह तो रिकॉर्ड में है कि हमारे पास पूरे सबूत नहीं थे. लेकिन जब एक बार जज ने सुनवाई का आदेश दे दिया तो इस फैसले का विरोध करने वाला मैं कौन होता हूं? इसके बाद तो हमारा कर्तव्य है कि हम अदालत की मदद करें और हमें जिस तरह से भी हो सके अपना काम करना होता है.’

दुर्भाग्य से, आगे हम देखेंगे कि ‘अदालत की इस मदद’ में सबूतों के साथ छेड़छाड़ और फर्जी सबूत गढ़ना भी शामिल है.

जज का विरोध करने वाला मैं कौन होता हूं, सुनकर भी निराशा होती है. आप खुद को देश की शीर्ष जांच एजेंसी बताते हैं और आप जानते हैं कि आपके पास सबूत नहीं हैं. न्याय के हित में क्या यह ठीक नहीं होता कि आप कम से कम जज से क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर सुनवाई के बजाय आगे और जांच की मांग करते?

अब राजेश और नूपुर तलवार की स्थिति देखिए. वे एक ऐसे मामले में अकेले आरोपित हैं जिसमें उनके खिलाफ कोई वास्तविक सबूत नहीं है. इसके बावजूद जब वे यह अपील करते हुए उच्च और सर्वोच्च न्यायालय गए कि इस मामले की गहराई से पड़ताल हो जो किसी बाहरी व्यक्ति की संभावित भूमिका का पता लगा सके और साथ ही टच डीएनए (जिसमें उनका खुद का दोष भी साबित हो सकता है) जैसी आधुनिक फॉरेंसिक जांचों का आदेश दिया जाए तो दोनों ही जगह उनकी याचिका ठुकरा दी गई. सर्वोच्च न्यायालय ने तो उनकी इस कोशिश को अपने बचने की आखिरी कोशिश करार दिया और नूपुर तलवार से कहा कि अगर वे ट्रायल कोर्ट के हर आदेश से असहमति जताते हुए शीर्ष अदालत आएंगी तो उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी.

कानून कहता है कि जब तक दोष साबित नहीं होता, तब तक व्यक्ति निर्दोष माना जाए. इस मामले में तो तलवार दंपति के लिए ऊंची अदालतों में जाने का संवैधानिक अधिकार तक खत्म कर दिया गया है. जावेद अहमद और आरके सैनी इस मामले से सीधे जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार करते हैं. अहमद कहते हैं, ‘आप मेरी स्थिति समझेंगी.’ आरुषि-हेमराज की हत्या के इस मामले की पड़ताल दो दिशाओं की तरफ जाती है. एक, यह माना जाए कि इसके तार हेमराज के दोस्तों और घरेलू नौकरों से जुड़ते हैं. दूसरा, यह माना जाए कि इसमें राजेश और नूपुर तलवार की भूमिका थी. अब एक-एक कर इस मामले की पड़ताल की दोनों दिशाओं और सीबीआई ने इनमें क्या किया और क्या नहीं, के बारे में जानने की कोशिश करते हैं.

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