दर्द का दस्तावेज़ ‘गैस्ड’

चित्र: गैस्ड, चित्रकार: जॉन सिंगर सार्जेंट, सन:1918
चित्र: गैस्ड, चित्रकार: जॉन सिंगर सार्जेंट, सन:1918
चित्र: गैस्ड, चित्रकार: जॉन सिंगर सार्जेंट, सन:1918

विश्वकला के इतिहास में युद्ध चित्रों की एक लंबी परंपरा है. हजारों साल पहले बने गुफा चित्रों से लेकर पिछली सदी की कला में , हमें युद्ध को विषय बनाकर रचे गए असंख्य चित्र मिलते हैं. पश्चिमी देशों में युद्ध चित्रों की रचना के पीछे स्वदेश प्रेम , शौर्य , बलिदान आदि प्रेरक उद्देश्यों के साथ-साथ शत्रु राष्ट्र के प्रति घृणा भाव को लंबे समय तक जिंदा बनाए रखने का मकसद भी साफ दिखता है. इसलिए ऐसे अधिकांश युद्ध चित्र शासकों द्वारा प्रायोजित कहानी के साथ  उस राष्ट्र के गलत-सही इतिहास को कुछ हद तक प्रामाणिकता भी देते हैं. कपोल कल्पित किस्से-कहानियों और धार्मिक कथाओं के साथ जुड़े चित्रों की एक विशिष्ट परंपरा के जरिए ही विशाल अनपढ़ जन समूह को किसी धार्मिक-सामाजिक नियमों के साथ  बांधे रखना संभव रहा है. इस सच्चाई से शासक वर्ग सदियों से बखूबी परिचित रहा है, लिहाजा धार्मिक और सामंती विषयों के चित्रों को शासकों ने अपने संरक्षण में न केवल बनवाया बल्कि उनके सामूहिक प्रदर्शन का प्रबंध भी किया. दुनिया भर के संग्रहालयों और धर्मस्थानों की दीवारें इसके सबूत हैं. 

हमारे देश में युद्ध चित्रों का कुछ हद तक व्यवस्थित स्वरूप देवों-असुरों, राम-रावण या कौरव-पांडव के युद्धों के चित्रणों में दिखता है. जो बाद में अपने विकास क्रम में धार्मिक कथाओं के नायकों को विस्थापित कर विभिन्न शासकों को चित्रों के केंद्र में स्थापित करते रहे हैं. पर बावजूद इन सबके भारतीय चित्रकला और  साहित्य में स्वाभाविक कारणों से युद्धप्रसंगों का उल्लेख पाश्चात्य कला के ऐसे चित्रों की विशाल संख्या की तुलना में बहुत कम मिलता है. हालांकि, पिछली सदी के दो विश्व युद्धों की विभीषिका ने कई चित्रकारों को स्वतःस्फूर्त ढंग से चित्र रचने के लिए प्रेरित किया, पर लगभग हर युद्धरत राष्ट्र की ओर से बड़ी संख्या में कलाकारों को युद्धक्षेत्रों में युद्ध के चित्र बनाने भेजा गया.  यहां गौरतलब है कि प्रथम विश्व युद्ध के पहले फोटोग्राफी का आविष्कार हो चुका था और युद्ध-पत्रकारिता में इसका खूब उपयोग भी किया जा रहा था. पर यहां यह मान लेने में जरा भी हिचक नहीं होती कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बनाए गए युद्ध चित्र अपने प्रभाव में युद्धों के फोटोग्राफों से कहीं ज्यादा प्रभावशाली थे. दरअसल , ये कैमरे से लिया गया यांत्रिक विवरण मात्र न होकर मनुष्य द्वारा दर्ज की गई मनुष्य के विनाश की गाथाएं थीं जहां असहाय इंसानियत की सिसक को सुना जा सकता था.  इसीलिए आज सौ साल बाद भी ये सभी चित्र अपने अंतिम अर्थों में सार्थक युद्ध विरोधी चित्र बनकर हमें अमन का एक संदेश देते है , जो इन चित्रों के बनवाने वालों की मंशा के बिल्कुल विपरीत है.

ऐसा ही एक मार्मिक चित्र है ‘ गैस्ड’!

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रासायनिक हथियार के रूप में जर्मनी ने एक गैस का प्रयोग किया था जिसे आम भाषा में ‘ मस्टर्ड गैस ‘ कहा जाता था. इस गैस के गोले जब फूटते थे तो गैस एक भारी धुएं की तरह जमीन पर रेंगती हुई फैलने लगती थी. गैस में तेज सरसों की महक के कारण ही इसका नाम मस्टर्ड गैस पड़ा था. यह गैस शरीर के जिस भी हिस्से के संस्पर्श में आती थी, उस हिस्से की कोशिकाओं को नष्ट कर देती. शरीर पर तुरंत फफोले पड़ जाने के साथ-साथ इस गैस का असर आंखों पर पड़ता था और पीड़ित तुरंत अंधा हो जाता था. इस गैस का प्रभाव जल्द ही फेफड़ों तक पहुंचकर ऑक्सीजन तंत्र को नष्ट कर देता था. पीड़ित को खून की उल्टियां आती थीं और वह अंततः एक दर्दनाक मौत मरता था.  प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस अमानवीय रासायनिक गैस के बारे में सबसे मार्मिक विवरण हमें विख्यात जर्मन साहित्यकार एरिक मारेया रेमार्क (1898 -1970 ) की कृति ‘ऑल क्वायट ऑन द वेस्टर्न फ्रंट ‘ में  मिलता है. जॉन सिंगर सार्जेंट द्वारा बनाए गए चित्र ‘ गैस्ड ‘ को देखकर हम रासायनिक युद्ध शस्त्रों की भयावहता और मौत का इंतजार करते असहाय सैनिकों की स्थिति के बारे में समझ सकते है.

अमेरिकी चित्रकार जॉन सिंगर सार्जेंट (1856-1925 ) अपने समय के जाने-माने चित्रकारों में थे जो धनी और अभिजात परिवारों की महिलाओं के आकर्षक पोर्ट्रेट बनाने के लिए प्रसिद्ध थे. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इंग्लैंड-अमेरिका का एकजुट होकर जर्मनी के खिलाफ लड़ने की  ऐतिहासिकता को एक मूर्त रूप देने के उद्देश्य से जॉन सिंगर सार्जेंट को ब्रिटिश वार मेमोरियल कमेटी की ओर से विशेष रूप से नियुक्त किया गया था.  62 वर्षीय जॉन सिंगर सार्जेंट शौकीन मिजाज, आराम पसंद और खासे धनी चित्रकार थे पर उन्होंने इस दायित्व को एक चुनौती के रूप में  लिया.  उन्होंने इस चित्र को बनाने के लिए 1918 की जुलाई में अरास और येप्रेस के कठिन युद्ध क्षेत्रों का दौरा किया. जॉन सिंगर सार्जेंट को सूचना मंत्रालय की ओर से निर्देश दिया गया था कि चित्र का आकार बड़ा हो जिसमें अंग्रेजों और अमेरिकियों की मैत्री को भव्य महाकाव्य की तरह प्रस्तुत  किया जा सके. बिल्कुल भिन्न सामाजिक परिवेश से आए चित्रकार सार्जेंट के लिए यह बिल्कुल एक नया अनुभव था पर वे इतना तो समझ गए थे कि चित्र में महाकाव्य के गुणों को दिखाने के लिए एक बड़े जन समूह को दिखाना आवश्यक होगा.  इसी उद्देश्य से वे युद्ध क्षेत्रों के बीच जाकर चित्र के लिए मुकम्मल विषय तलाशते रहे. उन्हें तोपों को ढोते ट्रकों की कतार का दृश्य या फिर युद्ध  के दौरान सड़क पर फौजियों और आम लोगों की अफरातफरी जैसे दृश्य उन्हें आकर्षित तो करते रहे पर एक चित्र रचने के लिए प्रेरित नहीं कर सके.  संशय के ऐसे दौर में सार्जेंट यकायक उस भयावह हकीकत से रूबरू हुए जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी न की थी.  21 अगस्त, 1918 को अरास और डालिंस प्रांतों से सटी सैनिक छावनी पर जर्मन सेना ने मस्टर्ड गैस के गोलों से हमला किया था. इसकी खबर मिलते ही सार्जेंट घटना स्थल पर जा पहुंचे और उन्होंने वह ‘ खौफनाक दृश्य ‘ देखा जिसके चलते विश्व के युद्ध चित्रों के इतिहास की अन्यतम कृति ‘गैस्ड ‘ की रचना हो सकी.

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