थप्पड़ों ने लौटाया आत्मविश्वास

खैर, उस दिन भी जब गुरु जी कक्षा में आए तो बच्चों का सारा शोरगुल सन्नाटे में बदल गया. लेकिन मेरे अंदर हद से ज्यादा उथल-पुथल थी. मैं अमित नामक परेशानी से निजात चाहता था. गुरु जी कुर्सी बैठे ही थे कि मैंने कहा, ‘गुरु जी, यह अमित मुझे परेशान कर रहा है.’

उन्होंने पूछा कि अमित ने क्या किया. मैंने उन्हें बता दिया कि वह पीछे बैठ कर बार-बार मेरे बाल खींच रहा है. उन्होंने हम दोनों को आगे बुलाया और एक-दूसरे के सामने खड़ा करके कहा कि हम एक-दूसरे को थप्पड़ मारें. वह तगड़ा था. उसका हाथ जोर से पड़ता ही था. मैं दिखने में बहुत ही पतला था. जब हम एक-दूसरे को करीब दस थप्पड़ मार चुके तो गुरु जी ने मुझे अपने पास बुलाया. गुरु जी ने मुझे एक जोर का थप्पड़ जड़ा, यह अमित के दसों थप्पड़ों से कहीं ज्यादा जोर का था. उन्होंने कहा कि मैं अमित को अब जो थप्पड़ मारूं वह कम से कम इतनी जोर का होना चाहिए- गाल के बीचो-बीच पूरी ताकत से लगाया गया थप्पड़. मैंने उनकी बात का पालन किया. लेकिन इस बीच एक बात हुई. मैंने थप्पड़ मारने के अलावा पहली बार अमित की आंखों में आंखें डालकर देखा. आश्चर्य वहां गुस्से या आक्रामकता का कोइ चिह्न नहीं था. शायद गुरु जी की दी सलाह के बाद मैंने जो सख्ती दिखाई थी थप्पड़ मारने में, उससे अमित को यह संदेश मिला था कि मैं उतना भी कमजोर नहीं हूं जितना दिखता हूं. मुझे भी पहली बार लगा कि हिम्मत और ताकत का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारे शरीर में नहीं हमारे मन में बसता है.

आज मैं और अमित एक ही शहर में रहते हैं. हमारी अच्छी दोस्ती है. दीवाली पर हम साथ-साथ घर गए थे और टिकट भी उसी ने बुक करवाए थे. गुरु जी आज भी उसी विद्यालय में हैं. कक्षा छह की उस घटना के बाद जाने क्या हुआ कि धीरे-धीरे मैं उनके प्रिय छात्रों में शुमार हो गया. पता नहीं आज गुरु जी और अमित को वह थप्पड़ वाली घटना याद भी है या नहीं लेकिन मैं तो उसे कभी नहीं भूल सकता. वह एक ऐसी घटना है जिसने मुझे हीनभावना से उबारा. मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास लौटाया. उसे भूलूं भी तो कैसे?

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