जानवरों के अस्तित्व को मान्यता एक ऐतिहासिक फैसला

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Indian tourists ride horses in rented fur coats at Snow Point on Rohtang Pass, Manali, India

नैनीताल में स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नेपाल और भारत के बीच घोड़ों की गतिविधियों को सीमित करने वाली एक याचिका पर सभी जानवरों जिनमें पक्षी और मछलियां तक भी शामिल हैं, के कानूनी अस्तित्व को मान्यता दी है। जानवर कल्याण और जानवरों के अधिकारों की वकालत करने वालों ने इस फैसले पर जश्न मनाया है।

जानवरों के अधिकारों को पहचान देना एक महत्वपूर्ण बात है। इससे भी ज्य़ादा ज़रूरी है मानव को जानवरों की देखभाल के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना। सुप्रीमकोर्ट ने ‘परवेंशन ऑफ क्र्रूऐलिटी टू एनीमलस एक्ट 1960 की धारा के तहत जानवरों की देखभाल को अनिवार्य बताया है। जानवर कल्याण बोर्ड बनाम-ए-नागराज और दूसरे मामले की सुनवाई करते हुए देश की सर्वाेच्च अदालत ने कहा है कि जानवरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मानव की है। अदालत ने कहा कि जानवरों के अधिकारों और मानव जिम्मेदारी को एक सामजस्य में समझना चाहिए।

यह घोषणा जानवरों के साथ हमारे संबंधों पर आत्मनिरीक्षण करने का अवसर है जिसे हम दुनिया के साथ सांझा कर सकते हैं। ज्य़ादातर संबंध उनके शोषण का माध्यम हैं। हम लोग जानवरों के साथ बातचीत के संबंध भी तब बनाते हैं जब हम उनको मारने के लिए ले जाते हैं या जब हम उन्हें वैज्ञानिक प्रयोग के लिए इस्तेमाल करते हैं। हम व्यापार के लिए उनकी संख्या बढ़ाते हैं और उनकी प्रकृति में भी दखल देते हैं।

जानवरों को वस्तुओं के रूप में माना जाता है जिसकी हमारे पास उपयोग करने के अलावा और कोई उपयोगता नहीं। यह निर्णय जानवरों को जीवित और संवेदनशील प्राणियों के रूप में पहचानने के लिए शुरूअत की है। शिक्षा प्रणाली में ऐसी साम्रगी शामिल होनी चाहिए जो सभी जीवित प्राणियों के लिए रु चि और सम्मान पैदा करे। इन उद्देश्यों को ज्ञान प्रदान करके सबसे अच्छा उद्देश्य है कि जानवरों को जीवित, संवेदनशील जीवों के रूप में

मानता है कि ये मनुष्यों के साथ पर्यावरण सांझा करते हैं।

इस ऐतिहासिक फैसले को साकार करने के लिए मानव की सोच में एक स्थायी और व्यापक बदलाव ज़रूरी है। इसमें जानवरों का शोषण और उपेक्षा को रोकने और प्राकृतिक रहन सहन की रक्षा के लिए मानव चेतना और व्यवहार में एक परिवर्तन आना चाहिए।

भारत सरकार को गैर-मानव जानवरों के प्रति अपने मौलिक कर्तव्यों को पहचानना चाहिए, जैसा कि धारा 48ए और 51ए(जी) में निहित है और इस देश के न्यायालयों द्वारा दोहराया गया है और पत्र और भावना में पशु कल्याण कानूनों को लागू किया गया है। केवल तभी हम राष्ट्र के रूप में जीवन के पूरे समुदाय की रक्षा और संरक्षण कर सकते हैं।