जनता का जायका | Tehelka Hindi

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जनता का जायका

August 9, 2013
मनीषा यादव

मनीषा यादव

इस बार भी वही हुआ! देखा गया, उठाया गया, छुआ गया, फिर रख दिया गया. अब उसका धैर्य जवाब दे चुका था. वह बोला, ‘हे ईश्वर, और कितना अपमानित करवाएगा!’ सुनकर आलू कसमसाया. अभी-अभी जिसने ऊपर वाले से फरियाद की वह टमाटर है. आलू शांत था, जबकि ऐसा ही व्यवहार उसके साथ भी हो रहा था. कारण यह कि वह अनुभवी है. उसे लोगों के व्यवहार का भलीभांति ज्ञान हो चुका है. पहले-पहल उसे भी अखरा था लेकिन अब यह सब सामान्य-सी बात है.

लेकिन ऐसा हो क्यों रहा है, भाई साहब? सारा किया-धरा निगोड़े मौसम का है. उसने जरा-सी करवट क्या ली, दोनों की नींदें उड़ गईं. चलिए, सब्जीमंडी चल कर देखते हैं कि आगे क्या हुआ!

टमाटर के बार-बार अपमानित होने का एक कारण और भी है. जब-जब लाल टमाटर की अवहेलना होती, लाल टमाटर गुस्से से लाल हो जाता. लिहाजा लोग उसके प्रति और आकर्षित होते. मगर पास जाकर जब देखते कि वह दागी है, तो उनका आकर्षण उंहू… कहते हुए तिरस्कार में बदल जाता.

मगर आलू का क्या हाल है, भाई साहब! अनुभवी आलू! मस्त, मंलग है. उसने तो खुद को समझा-बहला लिया था मगर टमाटर को कैसे समझाया जाए. वह मन ही मन टमाटर की तबीयत हरी करने की युक्ति सोचने लगा. कुछ देर बाद वह बोला, ‘मेरे प्यारे टमाटर, ताजी-ताजी एक गजल सुन- दियासलाई और पानी साथ-साथ रखते हैं/ सियासत में वे ऊंचा मुकाम रखते हैं. कैसा लगा!’ ‘सुनकर मतली आ रही है.’ टमाटर मुंह बनाकर बोला. आलू जारी रहा, ‘लंबी होती ही जा रही है यहां पतझड़ों की मियाद/ हमारी खाली सुबहों में वे अपनी रंगीन शाम रखते हैं.’ अब बोल!’, आलू बोला. ‘यह शेर नहीं चूहा है.’ टमाटर ने कहा. ‘अबे! सब्जीधर्म निभाते हुए कम से कम सियार कह देता, निर्दयी.’ यह कहकर आलू एक सांस में अपनी तथाकथित अधूरी गजल को पूरी सुनाने लगा, ‘फासला हो गया कितना अमीरी और गरीबी में/ अपने काम से वे बस अपना काम रखते हैं/सूखे में उजड़ गए गांव कई सारे/ तकिये के पास वे छलकता जाम रखते हैं/ बिलबिला कर भूख से मर गया किसान कोई/ मरने वाले का वे अन्नदाता नाम रखते हैं.’ लेकिन टमाटर पर कोई असर नहीं.

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